मेरा नाम अर्जुन है। मैं कोई महान ज्ञानी या संत नहीं, बस एक आम इंसान हूँ, जिसने जीवन में बहुत ठोकरें खाईं। कभी मैं भी धर्म, सच्चाई और अच्छाई को सिर्फ किताबों की बातें समझता था। सोचता था कि ये सब सिर्फ कमजोर लोगों के लिए है, जबकि असली दुनिया तो तेज़ चालाकियों से चलती है। पर ज़िंदगी ने मुझे ऐसा घुमाया कि आज मैं खुद तुमसे ये कहानी कह रहा हूँ।
बचपन में माँ-पिता ने सिखाया था कि हमेशा सच बोलो, किसी का बुरा मत करो। मैं यही मानकर बड़ा हुआ। लेकिन जब मैंने दुनिया देखनी शुरू की, तो कुछ और ही समझ आया।
जो लोग झूठ और चालाकी से काम निकालते थे, वे आगे बढ़ते जा रहे थे। और जो ईमानदार थे, वे संघर्ष ही करते रह गए। यह देखकर मेरा मन विचलित हो गया। मैंने सोचा, क्या सच में अच्छाई का कोई फायदा है
धीरे-धीरे, मैं भी वैसे ही सोचने लगा। मैंने धर्म से, भगवान से, सच्चाई से मुँह मोड़ लिया।
एक रात, मैं ऑफिस से लौट रहा था। रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति ठंड में ठिठुर रहा था। उसके पास न कपड़े थे, न कोई सहारा। मैंने देखा, लेकिन सोचा, मुझे क्या लेना-देना और आगे बढ़ गया।
पर पता नहीं क्यों, दिल में कुछ चुभा। कुछ देर बाद मैं वापस लौटा, अपनी जैकेट उतारी और उसे दे दी। बूढ़े ने काँपते हाथों से पकड़ लिया और बस एक बात कही—बेटा, भगवान तेरा भला करे।
उसकी आँखों में जो कृतज्ञता थी, उसने मेरे अंदर कुछ जगा दिया। वो रात मैंने चैन से नहीं सोई। पहली बार एहसास हुआ कि शायद अच्छाई सिर्फ दिखाने के लिए नहीं होती, वो हमें भीतर से बदल देती है।
इसके कुछ साल बाद, मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक बिज़नेस शुरू किया। मैं मेहनत करता रहा, ईमानदारी से सबकुछ चलाया। पर फिर वही दोस्त, जिन पर मैंने आँख बंद करके भरोसा किया था, उन्होंने मुझे धोखा दे दिया।
मेरा सबकुछ चला गया—पैसा, नाम, विश्वास। मैं अंदर तक टूट गया।
मैंने खुद से पूछा, मैंने क्या गलती की मैंने किसी का बुरा नहीं चाहा, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों
इस घटना ने मुझे फिर से उलझन में डाल दिया। क्या सच में अच्छाई कोई मायने रखती है क्या सच में धर्म और सच्चाई पर भरोसा किया जा सकता है
इस दर्द से बचने के लिए मैं कुछ दिन के लिए शहर से दूर चला गया। पहाड़ों के बीच, एक दिन, एक साधु से मुलाकात हुई।
उन्होंने मुझसे पूछा, बेटा, परेशान दिख रहे हो। क्या हुआ
मैंने गुस्से और दुःख में कहा, बाबा, क्या सच में धर्म का कोई मतलब है मैं तो हमेशा सही रास्ते पर चला, फिर भी मुझे धोखा ही मिला।
साधु मुस्कुराए। उन्होंने पास के झरने की ओर इशारा किया और बोले, देखो, पानी ऊँचाई से गिरकर नीचे आता है, पत्थरों से टकराता है, लेकिन अंत में शांत होकर नदी बन जाता है।
मैंने चकित होकर पूछा, इसका क्या मतलब
उन्होंने कहा, जीवन में मुश्किलें पत्थरों की तरह आती हैं, लेकिन जो धैर्य रखता है, वो अंत में शांत नदी की तरह बहता है।
उनकी ये बात मेरे दिल में गहरी उतर गई।
मैंने सोचा, क्या सच में धैर्य से सब ठीक हो सकता है मैंने खुद को संभालना शुरू किया। फिर से मेहनत की, फिर से अपने पैरों पर खड़ा हुआ।
अब भी परेशानियाँ आती थीं, लेकिन अब मैं जल्दी हिलता नहीं था।
पहले जहाँ मैं धर्म को सिर्फ एक रीत-रिवाज मानता था, अब समझ आया कि धर्म का असली मतलब मन की स्थिरता और सच्ची शांति है।
अब मैं वही अर्जुन हूँ, पर बदला हुआ। पहले धर्म से भागता था, अब उसे जीता हूँ। अब मैं दूसरों को उपदेश नहीं देता, बस अपने जीवन से दिखाता हूँ कि सच्चाई और धैर्य कभी बेकार नहीं जाते।
अगर तुम्हें भी कभी लगे कि अच्छाई और धर्म का कोई मतलब नहीं, तो धैर्य रखो। जब पानी भी गिरकर शांत हो सकता है, तो हम क्यों नहीं
धर्म कोई बाहर की चीज़ नहीं, वो हमारे मन की स्थिति है। अगर हम खुद सही रास्ते पर टिके रहें, तो धीरे-धीरे जीवन भी सही दिशा में मुड़ ही जाता है।