दीर्घ निकाय ३४ विस्तृत उपदेशों का संग्रह है। अन्य निकाय जहाँ सीधे, सरल और संक्षिप्त शैली में प्रस्तुत किए गए हैं, वहीं दीर्घ निकाय को धर्म की व्यापक सौंदर्यता को प्रकट करने का विशेष अवसर मिला है। इसके कई सूत्र अधर्म की गहरी परतों को उजागर करते हैं, जबकि कुछ सद्धर्म को अविस्मरणीय बना देते हैं।
यह उस समय की बात है जब भगवान बुद्ध की यशकीर्ति चारों दिशाओं में फैल रही थी। अनेक विद्वान ब्राह्मण उन्हें परखने के लिए आए — कुछ मैत्रीपूर्ण जिज्ञासा से, तो कुछ ईर्ष्या और संशय से भरे हुए। इन रोचक चर्चाओं में भगवान के व्यक्तित्व की अनूठी झलक मिलती है — सांसारिक तथ्यों की अचूक समझ, वाद-विवाद में अनुपम प्रखरता, और परमार्थ ज्ञान पर अद्वितीय प्रभुत्व। स्पष्ट था कि जब ये ब्राह्मण बुद्ध से आमने-सामने होते, तो उनकी तथाकथित विद्वता धूमिल पड़ जाती। अंततः, वे विनम्र होकर भगवान की शरण में आते — कुछ उपासक बनकर, तो कई भिक्षुता ग्रहण कर अपने परम कल्याण की ओर अग्रसर होते।
इस वर्ग में भगवान ने ब्रह्मचर्य के आवश्यक शीलों को गहराई से समझाया। साथ ही, समाधि और प्रज्ञा के क्रमिक विकास को “अनुपुब्बसिक्खा” के रूप में प्रस्तुत किया। इस खंड में कुल तेरह उपदेश शामिल हैं:
सुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।
दूसरे सुत्त में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।
इस तीखी बहस में भगवान घमंडी ब्राह्मण युवक की जाति पुछकर उसकी स्वघोषित श्रेष्ठता को सीधी चुनौती देते है, और अहंकार चूर कर देते है।
क्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।
महायज्ञ की अभिलाषा लिए सैकड़ों ब्राह्मणों संग आए कूटदंत को भगवान सबसे प्राचीन और सबसे फलदायी यज्ञ-पद्धति उजागर कर बताते हैं — एक ऐसा यज्ञ, जिसमें हिंसा त्यागकर जरूरतमंदों की सहायता की जाए।
इसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।
यह सूत्र अधिकांशतः पिछले महालि सुत्त जैसा ही है।
एक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही दिलचस्पी है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।
एक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।
भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात, आनन्द भंते को भगवान की शिक्षाओं को स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया।
“क्या भिक्षुओं के द्वारा चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ?” भगवान का इस पर अविस्मरणीय उत्तर।
“क्या किसी की अध्यात्मिक सहायता नहीं करनी चाहिए?” एक ब्राह्मण की दृष्टि का भगवान निवारण करते हैं।
कुछ सच्चे त्रिवेदी ब्राह्मण युवक ब्रह्मा के साथ समागम करने के मार्ग पर उलझन में हैं। किन्तु वे भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान पास ही रहते हैं।
इस वर्ग में कुल दस उपदेश सम्मिलित हैं। कुछ सूत्रों में जातक कथाओं का वर्णन किया गया है, तो कुछ में प्रतित्य समुत्पाद जैसे गहरे और महत्वपूर्ण उपदेश हैं। कुछ सूत्रों में लोकप्रिय बोधकथाएँ मिलती हैं, जबकि कुछ में देवताओं के साथ हुए रोचक संवाद और प्रश्नोत्तरों का उल्लेख किया गया है। कुछ सूत्रों में बौद्ध इतिहास के महत्वपूर्ण प्रसंगों का भी उल्लेख है। संपूर्ण रूप से, इस महावर्ग में धर्म के मूल सिद्धांतों, कथाओं और ध्यान-विधियों का विस्तृत एवं सुसंगत वर्णन किया गया है।
दुर्लभ ही होता है कि जब भगवान भिक्षुसंघ को बैठकर कोई कथा सुनाए। यह कथा पिछले सात सम्यक-सम्बुद्धों की महाकथा हैं। किन्तु, प्रश्न उठता है कि भगवान को यह महाकथा भला कैसे पता है?
आयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होने पटिच्चसमुप्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।
यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।
भगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।
सुत्तपिटक में बहुत पश्चात मिलाया गया यह सूत्र तैतीस देवलोक में देवताओं की कार्यशैली पर नजर डालता है। किन्तु, अत्याधिक शब्द आडंबर से ओतप्रोत होकर अपनी सार्थकता साबित करने के लिए संघर्ष करता है।
भगवान बुद्ध की एक और प्रेरणादायी जातक कथा, जिसमें उन्होने अपनी कार्यक्षमता से भूतकाल के भारत को आकार दिया। और, फिर धर्म की ओर मुड़कर सनातन ब्रह्म-धर्म ढूँढ निकाला, और उसे पैगंबर या ईश्वर के दूत की तरह संपूर्ण जम्बूद्वीप में फैलाया।
भगवान बुद्ध का दर्शन लेने के लिए दूसरी दुनियाओं के अनेक देवतागण एकत्र हुए। तब, भगवान ने उनका वर्णन कर, भिक्षुओं का उनसे परिचय कराया।
देवताओं का राजा होने के कारण, इन्द्र सक्क, सद्धर्म सुनने से वंचित रहता था। जब भी वह ऋषियों ने धर्म पुछने जाता, ऋषि ही उनसे पुछने लगते। अंततः उसने भगवान से भेंट की और धर्म के उत्तर सुनकर श्रोतापन्न बना।
यह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।
राजा पायासि जिद्दी, भौतिकवादी और नास्तिक था। उसने ‘मरणोपरांत परलोक-वरलोक नहीं होता’ यह साबित करने के लिए बहुत अजीब प्रयोग किए थे। अंततः वह आकर अरहंत भिक्षु कुमार कश्यप से एक मनोरंजन-पूर्ण और यादगार बहस करता है।
इस वर्ग में कुल ११ सूत्र शामिल हैं, जो आपस में सहज रूप से नहीं जुड़ते। कुछ सूत्रों में भगवान बुद्ध साधकों को समझाने का प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं। कुछ में वे दुनिया के पतन, उसकी उत्पत्ति और भविष्य की झलक भी प्रस्तुत करते हैं।
अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुँचकर, भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को महत्वपूर्ण सूत्रों का संगायन करने के लिए प्रेरित किया। उनकी आज्ञा पाकर, सारिपुत्त भंते ने अंतिम दिनों में तीन प्रमुख सूत्र दिए, जिन्होंने भिक्षुओं को एक नई दिशा प्रदान की। इसके बाद, वे संगठित होकर भगवान द्वारा दिए गए हजारों सूत्रों का संगायन करने में जुट गए।
सुनक्खत भिक्षु को तमाशेबाज निर्वस्त्र तपस्वियों से आकर्षण है। किन्तु, तप का ऐसा तमाशा न भगवान करते है, न ही उनका भिक्षुसंघ। उसके भिक्षुत्व छोड़ने की बात पर, भगवान उसकी अक्ल ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश करते है।
यह सूत्र विभिन्न धर्मों के बीच होने वाले संवाद का एक बेहतरीन उदाहरण है। बुद्ध का आशय किसी को ‘बौद्ध’ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें दुःखों से मुक्त करना है।
दुनिया का पतन भी अनेक चरणों में होता है, और दुनिया का उद्धार भी। पतन और उद्धार के इस प्रक्रिया के बीच बुद्ध अवतरित होते हैं। आगे, मेत्तेय बुद्ध भी आएंगे।
दुनिया की शुरुवात कैसे हुई? अनेक पौराणिक कथाओं के बीच, बुद्ध एक भिन्न विवरण देते हैं, जिसमें मानव-कर्म और नैतिकता दुनिया के संतुलन से जुड़ा है।
परिनिर्वाण लेने से पूर्व, आयुष्मान सारिपुत्त आकर भगवान से मुलाक़ात करते है, और महान शास्ता के लिए भाव-विभोर बातें कहते है।
महावीर जैन के निधन होने पर उनके संघ में ‘कत्लेआम’ मचा। उसे सुनकर, बुद्ध अपने संघ में स्थिरता और प्रौढ़ता का भाव व्यक्त करते है। और, भिक्षुओं को संगीति के लिए प्रेरित भी करते है।
पहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।
एक युवा पुरुष अपने मृत पिता के आदेशानुसार व्यर्थ कर्मकांड करता है। किन्तु, बुद्ध उसे उसका गहरा महत्व समझाते हुए गृहस्थों के व्रत और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते है।
दुनिया में अनेक तरह के अदृश्य सत्व हैं, और हर कोई हमारा हितकांक्षी नहीं है। कई सत्व हिंसक भी हैं। यह सूत्र रक्षामंत्र के तौर पर उनसे बचने का मार्ग बताता है।
भगवान ने भिक्षुओं को महत्वपूर्ण सूत्रों का संगायन करने के लिए प्रेरित किया था। उसके उत्तर में सारिपुत्त भंते ने महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षाओं का अनुक्रम से संगायन किया।
यह पिछले सूत्र जैसा ही है, किन्तु इसे भिन्न तरीके से बताया गया है। शायद ये दो सूत्रों ने आगे चलकर अभिधम्म बनने को प्रेरित किया होगा।