✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— आनापान : श्वास साधना —
शीघ्र (१० मिनिट) | लघु (३० मिनिट) | दीर्घ (६० मिनिट+)

आनापान

आनापान लघु

( ४ चरण — ३० मिनट )
✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १० मिनट


एकांत में जाकर, पालथी मारकर, काया सीधी रखते हुए आराम से बैठ जाएँ। कमर, गर्दन, सिर और आँखें सीधी रखें, और आँखें मूँद लें। स्मरणशील होकर साँस लें और स्मरणशील होकर साँस छोड़ें।

पहले साँस की लंबाई पर गौर करें।


(१)

लंबी श्वास लेते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास ले रहा हूँ।’
लंबी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास छोड़ रहा हूँ।’


यदि साँस लंबी हो, तो स्पष्ट रूप से पता चलना चाहिए कि साँस ‘इस तरह और इतनी’ लंबी आ रही है। उसी तरह, साँस छूटते हुए भी पता चलना चाहिए भी ‘इस तरह और इतनी’ लंबी साँस छुट रही है। प्रत्येक साँस की लंबाई को ध्यानपूर्वक पहचानते रहें।

यदि संभव हो, तो साँस की गहराई और उसका भार भी अनुभव करें। जब साँस गहरी या भारी हो, तो यह पता चलें कि साँस ‘इस तरह और इतनी’ गहरी/भारी आ रही है। साँस छोड़ते समय भी यह महसूस करें कि साँस ‘इस तरह और इतनी’ गहरी/भारी छूट रही है। अगर ध्यान भटकने लगे, तो एक गहरी साँस लें और फिर से साँस पर अपना ध्यान केंद्रित करें।


(२)

छोटी श्वास लेते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास ले रहा हूँ।’
छोटी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास छोड़ रहा हूँ।’


यदि साँस छोटी हो, तो पता चलना चाहिए कि साँस ‘इस तरह और इतनी’ छोटी आने लगी है। उसी तरह, साँस छूटते हुए भी पता चलना चाहिए कि ‘इस तरह और इतनी’ छोटी साँस छुट रही है।

यदि संभव हो, तो फ़िर साँस की गहराई और उसका भार अनुभव करने का प्रयास करें। यदि साँस छिछली/हल्की/धीमे आने लगी हो, तो पता चलना चाहिए कि साँस ‘इस तरह और इतनी’ छिछली/हल्की/धीमे आ रही है। उसी तरह, साँस छूटते हुए भी पता चलना चाहिए भी ‘इस तरह और इतनी’ छिछली/हल्की/जल्दी साँस छुट रही है।

हो सकता है कि साँस फ़िर से लंबी, भारी, या जल्दी-जल्दी आने लगे, और कुछ समय बाद फ़िर हल्की, छोटी, या धीमी हो जाएँ। प्रत्येक साँस पर ध्यान लगाकर जानते रहें। इन बीच यदि विचार या नींद आने लगे, तो फ़िर एक गहरी साँस लेकर दुबारा साँस पर ध्यान टिकाएँ।


(३)

पूरी काया महसूस करते हुए 1 श्वास लेना सीखता है।
पूरी काया महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।

अब हमें इस अभ्यास को और गहराई से करना है, ताकि हम पूरे शरीर को महसूस करते हुए साँस लेना और छोड़ना सीख सकें। इसके कई तरीकों में से एक तरीका यह है कि साँस लेते और छोड़ते समय यह पहचानें कि शरीर का कौन-सा हिस्सा आपको सबसे अधिक स्पष्ट रूप से महसूस हो रहा है। धीरे-धीरे अपने चित्त को और शांत करें, और साँस के हर क्षण को गहराई से अनुभव करने का प्रयास करें।

किसी को साँस के साथ पेट और छाती का हल्का फूलना और सिकुड़ना महसूस हो सकता है। किसी को कंधों और बाहों की हल्की हरकत का अनुभव हो सकता है। कुछ लोगों को भीतर, नाक, गले या फेफड़ों में साँस का भरना और गुजरना महसूस होता है। किसी को साँस के साथ शरीर में तनाव या खिंचाव का एहसास हो सकता है।

पहचानें कि आपको साँस कहाँ सबसे अधिक महसूस हो रही है। शरीर का कौन-सा हिस्सा सबसे अधिक संवेदनशील और जागरूक प्रतीत हो रहा है। अगर ध्यान भटकने लगे, तो फिर से एक गहरी साँस लेकर, ध्यान को साँस पर टिकाएँ। जब आपको साँस के साथ एक हिस्सा स्पष्ट रूप से महसूस होने लगे, तो उसके नज़दीक का हिस्सा भी ध्यान में लेने का प्रयास करें। धीरे-धीरे इसे विस्तार दें और पूरे शरीर को इस अनुभूति में शामिल करें।

उदाहरण के लिए, यदि आपको साँस के साथ छाती का फूलना स्पष्ट रूप से महसूस हो रहा हो, तो ध्यान दें कि पेट का फूलना भी इसी अनुभव में शामिल हो। थोड़ी देर में गले से साँस गुजरने की जानकारी भी इस क्रम में जोड़ें। फिर कंधों, सिर, बाहों और शरीर के निचले हिस्सों को भी एक-एक करके इस अनुभव में शामिल करते जाएँ। धीरे-धीरे पूरे शरीर को साँस के साथ संवेदनशील और जागरूक बनाते चले जाएँ।

समय के साथ, जब साँस के साथ अधिकांश शरीर स्पष्ट रूप से महसूस होने लगे, तो उन हिस्सों पर ध्यान दें जिन्हें अभी तक महसूस नहीं कर पाए हैं। उन्हें भी ध्यानपूर्वक इस अनुभूति में शामिल करें। एक ऐसा समय आएगा जब आपको साँस लेते हुए भी पूरा शरीर महसूस होगा और साँस छोड़ते हुए भी पूरा शरीर जागरूक और संवेदनशील लगेगा।


(४)

काया के संस्कार को शान्त करते हुए 2 श्वास लेना सीखता है।
काया के संस्कार को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।


अब हमें अपनी शारीरिक ऊर्जा को शांत करते हुए साँस लेना और छोड़ना सीखना है। इसका अर्थ यह है कि जब आपको लंबी और गहरी साँस के साथ पूरा शरीर महसूस होने लगे, तब आप शरीर को और अधिक शांत करते हुए साँस लें और छोड़ें।

हर साँस के साथ धीरे-धीरे शांति बढ़ाते जाएँ, बिना जल्दबाजी किए। ध्यान रहे, शरीर को शांत करने से उसकी संवेदनशीलता कम नहीं होनी चाहिए, बल्कि और बढ़नी चाहिए। इसका मतलब है कि अब आप अपने शरीर में छिपी बेचैनी, उद्वेग और चंचलता को भीतर से शांत करने का प्रयास कर रहे हैं, और यह कार्य शरीर की बढ़ती संवेदनशीलता के साथ किया जा रहा है। धीरे-धीरे, कदम दर कदम, शारीरिक ऊर्जा को शांत करते जाएँ।

जैसे-जैसे आप इस प्रक्रिया में आगे बढ़ेंगे, शरीर की स्थूल संवेदनाएँ सूक्ष्म होने लगेंगी। भारीपन, दबाव, गर्माहट, या चंचलता धीरे-धीरे हल्कापन, खुलापन, या स्थिरता में बदलने लगेंगी। शरीर की तनावपूर्ण ऊर्जा धीरे-धीरे शांत हो जाएगी, जिससे तनावमुक्ति और विश्रांति का अनुभव होगा।

यदि इस दौरान नींद या आलस आने लगे, तो गहरी और लंबी साँसें जल्दी-जल्दी लेने लगें। जैसे एक फुटबॉल से हवा निकालने पर वह उछलता नहीं है, लेकिन उसमें हवा भरने पर वह फिर से उछलने लगता है। इसी तरह, अगर नींद या आलस अधिक महसूस हो रहा हो, तो शरीर की ऊर्जा बढ़ाने के लिए जल्दी-जल्दी लंबी और गहरी साँस लें। जब आपको लगे कि ऊर्जा पर्याप्त हो गई है, तो स्वाभाविक साँस पर लौट आएँ और साधना को आगे बढ़ाएँ।

दूसरी ओर, अगर बेचैनी या चंचलता अधिक महसूस हो, तो छिछली साँस लें और उसे लंबे समय तक धीरे-धीरे छोड़ें। जैसे कि एक फुटबॉल में अधिक हवा भरने पर वह जरूरत से ज्यादा उछलने लगता है, तब उसकी थोड़ी हवा निकालनी पड़ती है ताकि वह संतुलित रहे। उसी तरह, बेचैनी और चंचलता की स्थिति में शरीर की ऊर्जा घटाने के लिए साँस को धीरे-धीरे और लंबी अवधि तक छोड़ते रहें। उदाहरण के तौर पर, २ पल तक छिछली साँस लें और उसे ६ पल तक धीरे-धीरे छोड़ते रहें। जब बेचैनी कम हो जाए, तो फिर स्वाभाविक साँस पर लौट आएँ और साधना को आगे बढ़ाएँ।


उठने से पूर्व:

ध्यान से उठने से पहले तय करें कि आप काफी देर तक साँस के साथ जुड़े रहेंगे और शरीर की संवेदनशीलता को बनाए रखेंगे। जो शांति, स्थिरता, स्पष्टता और एकाग्रता आपको महसूस हो रही है, उसे लंबे समय तक स्थिर रखने का प्रयास करें।

जब आप तैयार हों, तो धीरे-धीरे साँस के साथ आँखें खोलें। थोड़ी देर तक शांति का अनुभव करते रहें। आप चाहें तो इस साधना से प्राप्त शांति और सकारात्मक ऊर्जा को किसी विशेष व्यक्ति या पूरी दुनिया को समर्पित कर सकते हैं।

ध्यान से उठने के बाद भी, जब भी आपकी ऊर्जा असंतुलित हो, तब साँस के सहारे उसे संतुलित करने का अभ्यास करें। इस कदम के ज़रिए आप अपनी शारीरिक ऊर्जा को संतुलित करना सीखते हैं। नियमित ध्यान अभ्यास से आपको इसके और भी उपाय स्वतः समझ में आने लगेंगे। इसे अपनी दिनचर्या में भी अक्सर प्रयोग करते रहें।


आनापान की लघु और दीर्घ साधना भी देखें
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  1. अट्ठकथा यहाँ “काया” का अर्थ “पूरी श्वास की लंबाई” बताती हैं, लेकिन इस संदर्भ में यह बात ठीक नहीं बैठती—इसके तीन साफ़ कारण हैं:

    पहला, आनापानस्मृति के शुरुआती दो चरणों में ही साधक को श्वास की पूरी लंबाई का बोध होना ज़रूरी है। अगर पूरी श्वास का पता ही न हो, तो यह कैसे समझ आएगा कि श्वास लंबी है या छोटी?

    दूसरा, चौथे कदम पर, बिना किसी नई परिभाषा के, श्वास को “काय-संस्कार” कहा गया है। अगर भगवान एक ही जगह श्वास के लिए दो अलग शब्द (“काया” और “काय-संस्कार”) अलग-अलग अर्थों में इस्तेमाल कर रहे होते, तो वे यह साफ़ बताते कि यहाँ शब्द का अर्थ बदला जा रहा है। वे ऐसा करते भी हैं, जैसे आगे समझाते हैं कि श्वास-ध्यान के पहले चार चरण काया पर ही ध्यान करने से जुड़े हैं। लेकिन यहाँ ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया।

    तीसरा, अन्य सूत्रों से पता चलता है कि चौथा कदम चित्त को चतुर्थ-ध्यान की ओर ले जाता है, जहाँ श्वास भीतर-बाहर लगभग शांत हो जाती है और शरीर शुद्ध, उजली जागरूकता से भर जाता है। लेकिन श्वास को शांत करने से पहले ज़रूरी है कि जागरूकता पूरे शरीर में फैले। इसलिए श्वास के शांत होने से पहले एक ऐसा कदम होना चाहिए, जिसमें ध्यान पूरे शरीर के कोने-कोने में सूक्ष्मता से भर जाए। और यही वह कदम है।

    इसलिए यहाँ “काया” का मतलब केवल श्वास की लंबाई नहीं, बल्कि पूरे शरीर में फैली हुई जागरूकता को समझना अधिक सुसंगत और अर्थपूर्ण लगता है।वह संपूर्ण काया को महसूस करते हुए साँस लेना सीखता है। वह संपूर्ण काया को महसूस करते हुए साँस छोड़ना सीखता है।" ↩︎

  2. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार काया के संस्कार आश्वास-प्रश्वास को ही कहा गया है। क्योंकि, साँस सीधे काया से जुड़ी हुई प्रक्रिया है, इसलिए वही काया-संस्कार कहलाती है। चाहें तो इसे “शारीरिक हलचल” कह लें, या फिर शरीर में चल रहे ऊर्जा-प्रवाह के रूप में समझ लें, जिसे ध्यान में धीरे-धीरे शांत किया जाता है। अंगुत्तरनिकाय १०.२० बताता है कि काया-संस्कार का शांत होना चतुर्थ-ध्यान में ही होता है। और संयुक्तनिकाय ३६.११ तथा अंगुत्तरनिकाय ९.३१ के अनुसार, चतुर्थ-ध्यान में पहुँचकर साँस भीतर-बाहर लगभग पूरी तरह रुक जाती है। उस अवस्था में मानस, यानी जागरूकता, पूरे शरीर में, और मानो शरीर के बाहर तक भी, गुब्बारे की तरह फैल जाती है। ↩︎