✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

अर्हंत बनाम बोधिसत्व

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १३ मिनट
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(⚠️ कभी-कभी तेज़ गति से सुनने पर समझ नहीं आता।
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)


कल्पना कीजिए कि आप एक जलती हुई इमारत (संसार) में फँसे हैं। अग्निशमन दल का एक व्यक्ति (बुद्ध) आता है और कहता है, “जल्दी करो! यह रहा रास्ता, बाहर निकलो और सुरक्षित हो जाओ!”

यह प्रारंभिक बौद्ध धर्म (EBT) था। सीधा, सटीक और आपातकालीन।

लेकिन फिर, कुछ सदियों बाद, कुछ नए “गाइड” आए। उन्होंने कहा, “रुको! अकेले बाहर निकलना स्वार्थ है। क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? तुम्हें तब तक इसी जलती हुई इमारत में रुकना चाहिए जब तक कि तुम इमारत के आखिरी चूहे और कीड़े को भी बचाकर बाहर न निकाल लो।”

सुनने में यह बहुत ही महान, रोमांटिक और वीरतापूर्ण लगता है। इसे नाम दिया गया—महायान (बड़ा वाहन)। और जो लोग आग से बचने की जल्दी में थे, उन्हें ताना मारा गया—हीनयान (तुच्छ या छोटा वाहन)।

महायान का तर्क बड़ा ही भावुक है: “मैं निर्वाण के दरवाजे पर खड़ा रहूँगा, लेकिन प्रवेश नहीं करूँगा। जब तक कि दुनिया का आखिरी जीव अंदर नहीं चला जाता, मैं बाहर ही रुकूँगा।”

मेरे एक मित्र ने इसका बड़ा ही सटीक मज़ाक बनाया था। उसने कहा— “भाई, अगर हर कोई यही शपथ ले ले कि ‘मैं तेरे बाद ही जाऊंगा’, तो निर्वाण के दरवाजे पर ऐसा ट्रैफिक जाम लगेगा कि अंदर कोई भी नहीं जा पाएगा! सब दरवाजे पर खड़े होकर एक-दूसरे को ‘पहले आप, पहले आप’ कह रहे होंगे, और पीछे संसार जलता रहेगा।”

आज दुनिया के ८०% से ज्यादा बौद्ध इसी ‘रोमांटिक जाम’ में फँसे हैं। (क्योंकि अब तो थेरवादी भी बोधिसत्व बनने की शपथ लेने लगे हैं)। आइए, इतिहास के पन्ने पलटें और देखें कि बुद्ध की “तुरंत मुक्ति” की शिक्षा “अनंत प्रतीक्षा” में कैसे बदल गई।


इतिहास का यू-टर्न

भगवान बुद्ध के समय और उनके महापरिनिर्वाण के बाद के कुछ सौ सालों तक, लक्ष्य स्पष्ट था—अर्हंत बनना। यानी, इसी जीवन में काम-क्रोध-लोभ को नष्ट करना और जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो जाना।

भगवान ने भविष्यवाणी की थी कि उनका शासन (शुद्ध धर्म) ५०० वर्षों तक अपने मूल रूप में रहेगा। उसके बाद, उसमें “प्रतिरूपक” (नकली) सोना मिल जाएगा। और ठीक ५०० वर्ष बाद, यह भविष्यवाणी सच साबित हुई।

हीनयान नहीं, ‘श्रावकयान’ कहिये

सबसे पहले एक गलतफहमी दूर करते हैं। आज जिसे अपमानजनक रूप से “हीनयान” कहा जाता है, वह वास्तव में ‘श्रावकयान’ (शिष्यों का मार्ग) है। यह वह मार्ग है जो सीधे बुद्ध को सुनकर मुक्ति पाता है।

जब बौद्ध संघ में विभाजन शुरू हुआ, तो १८ अलग-अलग संप्रदाय बने (जैसे सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तक, थेरवाद आदि)। ये सभी ‘श्रावकयान’ थे। इनमें मतभेद थे, लेकिन लक्ष्य सबका एक था—इसी जीवन में निर्वाण

लेकिन ईसा की पहली शताब्दी के आसपास, उत्तर भारत में कुछ भिक्षुओं को यह पुराना मार्ग “रूखा और सूखा” लगने लगा। उस समय भारत में भक्ति आंदोलन की आहट शुरू हो चुकी थी। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की भक्ति जोर पकड़ रही थी। आम जनता को आकर्षित करने के लिए, बौद्ध धर्म को भी “ग्लैमरस” बनाने की जरूरत महसूस हुई।

यहीं से महायान का जन्म हुआ।


नागों की दुनिया से किताबें

महायानियों के सामने एक बड़ी समस्या थी। बुद्ध तो ५०० साल पहले परिनिर्वाण पा चुके थे। उन्होंने अपने ४५ वर्षों के उपदेश में कभी “महायान” की बात नहीं की थी। उन्होंने कभी नहीं कहा कि “अर्हंत मत बनो, बोधिसत्व बनो”।

तो अब नए विचारों को “बुद्ध-वचन” कैसे साबित किया जाए?

यहाँ एक गजब की कहानी रची गई। महायानि आचार्यों (जैसे नागार्जुन) ने दावा किया कि बुद्ध ने महायान के “उच्चतर” सूत्र भी सिखाए थे, लेकिन उस समय के लोग “मंदबुद्धि” थे, इसलिए वे उन्हें समझ नहीं पाए। इसलिए, बुद्ध ने उन सूत्रों को नागलोक (साँपों की दुनिया) में छिपा दिया था। अब ५०० साल बाद, नागों ने वे सूत्र वापस लौटा दिए हैं।

जाहिर है, इतिहासकार इसे नहीं मानते। वे साफ देख सकते हैं कि ‘प्रज्ञापारमिता सूत्र’, ‘सद्धर्म पुण्डरीक सूत्र’ आदि ग्रंथों की भाषा बुद्धकालीन ‘मागधी/प्राकृत’ नहीं, बल्कि बाद की ‘संस्कृत’ है। इन ग्रंथों में बुद्ध एक मानव नहीं, बल्कि एक देवता ही बन गए हैं।

महानता का नशा: अर्हंत बनाम बोधिसत्व

यही वह मोड़ था जहाँ धर्म पूरी तरह पलट गया।

  • पुराना मॉडल (EBT/थेरवाद): खुद तैराक बनो, नदी पार करो, और फिर किनारे पर खड़े होकर दूसरों को रास्ता बताओ। (जैसे बुद्ध और उनके अर्हंत शिष्यों ने किया)।
  • नया मॉडल (महायान): नदी पार मत करो। नदी के बीच में ही तैरते रहो और डूबते लोगों को बचाते रहो, चाहे इसमें अनंत कल्प लग जाएं।

महायान ने ‘बोधिसत्व’ शब्द का अर्थ ही बदल दिया।

  • EBT में: ‘बोधिसत्व’ का अर्थ था—वह व्यक्ति जो अभी बुद्ध नहीं बना है (बुद्ध बनने से पहले के सिद्धार्थ गौतम)। यह एक ‘अवस्था’ थी, कोई ‘आदर्श’ नहीं।
  • महायान में: बोधिसत्व एक ‘कैरियर’ बन गया। उन्होंने कहा कि अर्हंत बनना तो स्वार्थ है (“छोटी गाड़ी”), हमें बोधिसत्व बनकर सबको साथ ले जाना है (“बड़ी गाड़ी”)।

इस नए विचार ने पारमिताओं की अवधारणा को जन्म दिया। अब ध्यान-साधना से ज्यादा महत्व पूजा, स्तुति और दान को दिया जाने लगा। अमिताभ बुद्ध, अवलोकितेश्वर 1, और मंजुश्री जैसे नए “सुपरहीरो” बोधिसत्व बनाए गए जो केवल नाम पुकारने से मदद के लिए दौड़ पड़ते थे।

यह आम आदमी को बहुत पसंद आया। मेहनत करके ध्यान करने की जगह, “नमो अमिताभ” बोलना ज्यादा आसान था।


असली और नकली की पहचान

आज १५०० साल बाद, हमारे पास “बुद्ध” के नाम पर खिचड़ी पक चुकी है। थेरवाद, महायान, वज्रयान—सब दावा करते हैं कि वे सही हैं। एक आम साधक कैसे पहचाने कि शुद्ध घी कौन सा है और डालडा कौन सा?

सौभाग्य से, भगवान बुद्ध ने अपनी ‘माँ-सी’ भिक्षुणी महापजापति गोतमी को एक ‘लिटमस टेस्ट’ दिया था। इसे ‘धम्म-विनय चेकलिस्ट’ कहा जा सकता है। यदि आप किसी भी गुरु, किताब या संप्रदाय की शिक्षा को परखना चाहते हैं, तो उसे इस कसौटी पर कसें:

गोतमी, जिस शिक्षा के बारे में तुम्हें पता चले कि यह—

  • राग (जुनून, दिलचस्पी) बढ़ाती है, विराग नहीं।
  • संयोग (जुड़ाव, बंधन) बढ़ाती है, विसंयोग (मुक्ति, पृथकता) नहीं।
  • संग्रह (जमा करना) बढ़ाती है, क्षय (घटाना) नहीं।
  • महत्वाकांक्षा (महेच्छता) बढ़ाती है, अल्पेच्छता नहीं।
  • असंतुष्टि बढ़ाती है, संतुष्टि नहीं।
  • मेल-मिलाप बढ़ाती है, अलगाव नहीं।
  • आलस्य (कर्तव्य को भविष्य में धकेलना) बढ़ाती है, वीर्यारंभ (तुरंत जुटना) नहीं।
  • बोझ/ज़िम्मेदारी (दुब्भरता) बढ़ाती है, सुब्भरता (भार गिराना) नहीं।

—तो तुम निश्चित होकर जान लेना: ‘यह धम्म नहीं है, यह विनय नहीं है, यह शास्ता (बुद्ध) की शिक्षा नहीं है।’

—गोतमी सूत्र (अंगुत्तरनिकाय ८:५३)

अब जरा छाती पर हाथ रखकर ‘बोधिसत्व आदर्श’ और बाकी यानों की टेस्ट करिए। क्या ‘बोधिसत्व की शपथ लेना’

  • राग या जुनून बढ़ाता है, या विराग?
  • जुड़ाव बढ़ाता है, या पृथकता?
  • जमा करने की प्रवृति बढ़ाता है, या क्षय करने की?
  • महत्वाकांक्षा बढ़ाता है, या अल्पेच्छता?
  • संतुष्टि बढ़ाता है, या असंतुष्टि?
  • मेल-मिलाप बढ़ाता है, या निर्लिप्त-एकांतवास?
  • भविष्य की ओर धकेलना बढ़ाता है, या तुरंत जुटना?
  • बोझ और ज़िम्मेदारी बढ़ाता है, या भार गिराना?

जवाब आपकी आँखों के सामने है। किसी हिंट की जरूरत नहीं है।

तस्वीर को और साफ़ करने के लिए, एक सीधी तुलना देखिये—

विषय प्रारंभिक बुद्ध वचन (EBT) महायान
बुद्ध कौन हैं? एक जागृत मानव, एक शिक्षक। एक दिव्य देवता, तारने वाला।
लक्ष्य अर्हंत
दुखों का अंत (निर्वाण) इसी वर्तमान जीवन में।
बोधिसत्व
बुद्ध बनने के लिए कल्पों तक जन्म-मरण।
उपमा बेड़ा या नाँव

नदी पार करो और बेड़े को वहीं छोड़ दो। सिर पर ढोना मूर्खता है।
बड़ा यान या लग्जरी क्रूज़

नदी के बीच में ही बेड़े को सजाते रहना और पिकनिक मनाना, ताकि और लोग चढ़ सकें।
इलाज डॉक्टर बनना
“पहले खुद स्वस्थ हो जाओ (अर्हंत), फिर दूसरों का इलाज करो।”
साथी मरीज बनना
“मैं अस्पताल से डिस्चार्ज नहीं लूँगा, ताकि बाकी मरीजों का मन बहला सकूँ।” (सदा रोगी बने रहना)
साधना अष्टांगिक मार्ग, ३७ बोधिपक्खिय धम्म, समथ-विपस्सना पारमिताएं बढ़ाना, लोक-सेवा, मूर्ति-पूजा, मंत्र-जाप।
मुक्ति का आधार “तुम्हें अपना द्वीप/दीपक स्वयं बनना है।” (अत्तदीपो भव) “बोधिसत्व की कृपा से मुक्ति।” (भक्ति)
आदर्श सारिपुत्त, मोग्गल्लान (आस्रवमुक्त शिष्य)। अवलोकितेश्वर, क्षितिगर्भ (काल्पनिक पात्र जो कभी मुक्त नहीं होते)।

गाड़ी नहीं, मंजिल महत्वपूर्ण है

अंत में, यह समझना जरूरी है कि “यान” का उद्देश्य केवल सवारी करना नहीं, बल्कि उतरना है।

बुद्ध का धर्म बेड़ा जैसा है—नदी पार करने के लिए। महायान ने उस बेड़े को इतना सजा दिया, उसमें सोफे और एयर-कंडीशनर लगा दिए कि लोग उस पर बैठकर पिकनिक मनाने लगे और नदी पार करना ही भूल गए।

यदि आप भारतीय बौद्ध हैं, चाहे जन्म से या पसंद से, तो आपको यह तय करना होगा:

  • क्या आपको बुद्ध के “मूल नक्शे” पर चलना है जो सीधा मुक्ति की ओर जाता है?
  • या आप उन “गाइड बुक्स” (बाद के ग्रंथों) में उलझना चाहते हैं जो आपको एक सुंदर, जादुई, लेकिन अंतहीन गोल-गोल रास्ते पर ले जाती हैं?

सच तो यही है कि बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि “बड़ा बनो”। उन्होंने कहा— “मुक्त हो।” और मुक्ति के लिए किसी ‘महायान’ की जरूरत नहीं, बस अपनी आँखें खोलकर बेड़ियाँ तोड़ने की जरूरत है।

तत्परता से काम तुम्हें ही करना है,
तथागत तो बस मार्ग बताते हैं।”

—धम्मपद (२७६)


  1. अवलोकितेश्वर : यह महायान परंपरा के सबसे लोकप्रिय और पूजनीय बोधिसत्व हैं। इनके नाम का शाब्दिक अर्थ है—“वह प्रभु जो नीचे (संसार पर) करुणा-दृष्टि रखता है।” इन्हें साक्षात् ‘महाकरुणा’ का अवतार माना जाता है। इनकी एक विशिष्ट प्रतिमा अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें इनके ११ सिर और १,००० हाथ दर्शाए गए हैं।

    हजार हाथों वाला यह रूप, एक साथ असंख्य लोगों की सहायता करने की उनकी असीम क्षमता का प्रतीक है। प्रसिद्ध तिब्बती/महायानि मंत्र “ॐ मणि पद्मे हूँ” इन्हीं को समर्पित है। ↩︎