
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
आपने अक्सर सुना होगा कि बौद्ध धर्म एक ‘निराशावादी’ धर्म है।
यह गलतफहमी इतनी गहरी है कि हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और महान दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी इसे ‘दुःखवाद’ के चश्मे से देखने से नहीं बच सके। उन्होंने भी यही प्रचलित किया कि बुद्ध का पहला आर्यसत्य है— “जीवन दुःख है!”
लेकिन सच तो यह है कि यह एक गलत और अधूरी व्याख्या है। बुद्ध ने तो बस एक नंगा सच सामने रखा—
लेकिन ध्यान दें, क्योंकि फर्क बहुत बारीक है, पर गहरा है। बुद्ध ने कभी यह फैसला नहीं सुनाया कि ‘जीवन ही दुःख है’, जिसमें हताशापूर्ण निवृति का भाव है। उनके कहने का सरल अर्थ था— जीवन “में” दुःख है!
यह जीवन के पूरे अस्तित्व को ही नकारना नहीं है, बल्कि उसकी एक बीमारी को पहचानना है। एक शब्द में कहें तो—यह अस्तित्व की निंदा नहीं, निदान (Diagnosis) है।
और एक जिम्मेदार चिकित्सक की तरह उन्होंने बात यहीं अधूरी नहीं छोड़ी, बल्कि तुरंत तीन और समाधानकारी सत्य भी बताए—
जरा सोचिए, यदि आप अपनी खराब गाड़ी लेकर किसी मैकेनिक के पास जाएं, और वह जाँच-पड़ताल के बाद कहे—
तो क्या आप उस मैकेनिक को ‘निराशावादी’ कहेंगे? या उसे एक पेशेवर और कुशल उस्ताद कहेंगे? बुद्ध वही ‘महावैद्य’ हैं।
और, जो मरीज अपनी बीमारी का इलाज ही नहीं करना चाहता, केवल बिस्तर पर लेटकर रोना चाहता है, उसे हम ‘आशावादी’ नहीं, बल्कि ‘डरपोक’ या ‘पलायनवादी’ कहेंगे।
बुद्ध की शैली बहुत पेशेवर है। वे बुढ़ापा, रोग, मृत्यु और वियोग जैसे दुःखों से आँखें नहीं चुराते, बल्कि उनका सीना तानकर सामना करते हैं। उन्होंने कोई हवाई वादा नहीं किया कि “मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा।” नहीं! उन्होंने इसी जीवन में, इसी शरीर के साथ उस ‘अमृत’ (निर्वाण) को चखा है जो अकारण है, असीम है और जिस पर दुनिया का कोई खतरा नहीं मंडराता।
उस परम-राहत के अनुभव से बुद्ध ने हमें सलाह दी: “दुःख से भागो मत। उसे देखो, उसे समझो, उसका निदान करो और उसे खत्म कर दो।”
बुद्ध ने जीवन को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहने का कोई फैसला नहीं दिया। उन्होंने बस इतना सिखाया कि अगर छाती में तीर चुभा है, तो यह बहस मत करो कि तीर किसने मारा, तीर का रंग क्या है… बल्कि पहले तीर को निकालकर बाहर करों!
उनकी इस पेशेवर दृष्टि से हमें एक गहरा सत्य समझ आता है: जीवन में दुःख “अस्तित्व” से नहीं, “आसक्ति” से आते है। तकनीकी शब्दों में कहें तो—बुद्ध ने दुःख का कारण ‘पाँच स्कन्धों’ (काया, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) को नहीं, बल्कि ‘पाँच उपादान-स्कन्धों’ को बताया।
आसान शब्दों में कहें तो—शरीर, वेदना या सोच अपने आप में दुःख नहीं हैं। उनसे ‘चिपके रहना’ दुःख है। जैसे आग को दूर से देखना रोशनी देता है, पर उसे मुट्ठी में भींच लेना जला देता है। बुद्ध कहते हैं— “जीवन को जियो, उसे मुट्ठी में भींचो मत।”
यह बात सुनने में साधारण लगती है, लेकिन इसे जीना सरल नहीं है। हम अपनी बेड़ियों से इतना प्यार करते हैं कि जब कोई ‘मुक्ति’ की हथौड़ी चलाता है, तो हमें चोट लगती है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि ईश्वर या किस्मत ने आपको ये ‘कैसा’ जीवन दे दिया। सवाल यह है कि आप उस जीवन की गाड़ी चला कैसे रहे हैं? क्या आप उसे खाई (अँधेरे) की ओर ले जा रहे हैं या शिखर (उजाले) की ओर? क्या आप केवल रो रहे हैं, या इलाज कर रहे हैं?
यदि हम भाग्य को कोसना छोड़ दें, पलायन करना बंद करें और बुद्ध के चार आर्यसत्यों को एक ‘प्रोजेक्ट’ की तरह अपने जीवन में लागू करें, तो एक न एक दिन हम भी उस कुशल डॉक्टर की तरह मुस्कुराकर कहेंगे—
“समस्या पकड़ में आ गयी! यह रहा उसका हल! और लो… खेल ख़त्म!” 😇