
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
भारत में जब कोई धम्म की शरण में आता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक दुविधा भोजन को लेकर खड़ी होती है। एक तरफ हमारे मन में हज़ारों सालों का “शाकाहार ही पवित्रता है” वाला गहरा भारतीय संस्कार है, तो दूसरी तरफ बुद्ध का अहिंसा का सन्देश है।
दुविधा तब और बढ़ जाती है जब एक नया साधक विपश्यना शिविरों में जाता है। वहाँ उसे सात्विक और शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता है और आचार्य उसे बताते हैं कि यह ध्यान के लिए अनुकूल है। यह बात उसे तार्किक भी लगती है। लेकिन, जैसे ही वही साधक थेरवाद देशों (जैसे श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा) के भिक्षुओं की चर्या को देखता है, तो उसे एक भारी विरोधाभास का सामना करना पड़ता है—क्योंकि वहाँ भिक्षु मांसाहार करते हैं।
उसे सुनने को मिलता है कि स्वयं बुद्ध और उनके भिक्षु संघ ने गृहस्थों द्वारा दिया गया मांस स्वीकार किया। कभी-कभी वह यह भी सुन लेता है कि भगवान बुद्ध का अंतिम भोजन ‘सूकर-मद्दव’ (सूअर का मांस) 1 था। अब साधक का मन संशय से भर जाता है। क्या धर्म में मांसाहार की अनुमति है या नहीं? क्या आज के आचार्य सही हैं और भिक्षु गलत? या फिर धम्म में कहीं कोई ऐसी बात है जो हमारी पकड़ में नहीं आ रही?
चलिए, इस भ्रम को दूर करते हैं। हम यहाँ किसी प्रचलित सामाजिक नैतिकता की नहीं, बल्कि सीधे बुद्ध की देशना की बात करेंगे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि धम्म में भोजन का वास्तविक स्थान क्या है।
आज हमारे समाज ने शाकाहार को ही पवित्रता और अहिंसा का पर्याय बना दिया है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से यह धारणा अपेक्षाकृत आधुनिक है।
प्राचीन वैदिक संस्कृति में मांसाहार केवल स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न हिस्सा था। ऋग्वेद और यजुर्वेद में अश्वमेध, गोमेध जैसे यज्ञों में पशुबलि का उल्लेख है, और शतपथ ब्राह्मण में ब्राह्मणों द्वारा गाय और बैल की बलि दिए जाने के विवरण मिलते हैं। ब्राह्मण स्वयं मांसाहारी थे, पर बौद्ध और जैन प्रभाव के बाद, सामाजिक-राजनीतिक कारणों से शाकाहार को ‘पवित्रता’ से जोड़ दिया गया।
देवदत्त पटनायक जैसे समकालीन विद्वान भी यह रेखांकित करते हैं कि वैदिक काल में मांसाहार “देवताओं को तृप्त करने का माध्यम” था। उनके अनुसार, शाकाहार कोई “सनातन” अखंड परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ बदलती हुई एक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया थी।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में श्रमण परंपराओं का उदय ब्राह्मणवादी कर्मकांडों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। जैन मत (निर्ग्रन्थ संप्रदाय) ने सबसे कठोर अहिंसा का मार्ग अपनाया—जिसमें सूक्ष्म जीवों तक को हानि न पहुँचाना आदर्श था। इसी कारण, जैन साधुओं ने बौद्ध भिक्षुओं पर आरोप लगाया कि वे जानबूझकर मारे गए पशुओं का मांस खाते हैं, (जिसका उत्तर आगे मिलेगा।)
दिलचस्प रूप से, कई जैन ग्रंथों 2 में यह स्वीकार किया गया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में मांस का सेवन निषिद्ध नहीं है। इससे स्पष्ट है कि बौद्ध और जैन दृष्टिकोणों के बीच का विरोध जितना तीव्र दिखाया गया, वास्तविक स्तर पर उतना नहीं था।
इस प्रश्न की जड़ तक जाने के लिए हमें सबसे पहले वैदिक या श्रमण परंपराओं (जैसे जैन मत) और ‘बौद्ध धम्म’ के दृष्टिकोण में आकाश-पाताल के अंतर को समझना होगा। यहीं अक्सर भारतीय मानस चूक कर जाता है।
भारतीय दर्शन (विशेषकर सांख्य और योग) में भोजन को तीन गुणों में बांटा गया है—सात्विक, राजसिक, और तामसिक। यहाँ मान्यता यह है कि भोजन की ‘द्रव्य प्रकृति’ आपके मन को अशुद्ध करती है। यानी, अशुद्धि बाहर से (भोजन के रूप में) भीतर प्रवेश करती है। इसलिए यहाँ ‘छुआछूत’, ‘गंगा-स्नान’, और ‘रसोई की पवित्रता’ धर्म के केंद्र में आ गए।
लेकिन, बुद्ध ने इस पूरी अवधारणा को पलट दिया।
बुद्ध ने स्पष्ट कहा कि “शुद्धि या अशुद्धि ‘भौतिक’ या शारीरिक नहीं, बल्कि चैतसिक होती है। जो भोजन मुख के रास्ते उदर में जाता है, वह आपके चित्त को अशुद्ध नहीं करता। अशुद्धि वह है जो चित्त के रास्ते (कर्म बनकर) बाहर निकलती है।”
‘सुत्त निपात’ के आमगन्ध सुत्त में जब एक ब्राह्मण बुद्ध से पूछता है कि क्या मांस खाने से मनुष्य अपवित्र होता है? तो बुद्ध का उत्तर बिलकुल सीधा था:
जीवहत्या, चोरी, व्यभिचार, झूठ बोलना… यह ‘आमगन्ध’ (=दुर्गंध, अपवित्रता) है, न कि मांसाहार। क्रोध, मद, हठ, और द्वेष… यह असली अशुद्धि है, न कि मांस का सेवन।"
बुद्ध का धम्म ‘चेतना’ (मंशा या इरादा) पर आधारित है, भोजन की थाली पर नहीं। यदि आप शत-प्रतिशत शुद्ध शाकाहारी हैं, लेकिन मन में दूसरों के प्रति घृणा, ईर्ष्या और अहंकार भरा है, तो धम्म की दृष्टि में आप अशुद्ध हैं। वहीं, यदि कोई मांसाहारी है, लेकिन उसके मन में न दूसरों के प्रति घृणा है, न ईर्ष्या और न ही अहंकार, तो वह शुद्ध है।
हमें “शारीरिक शुद्धि” वाले पुराने संस्कारों के चश्मे को उतारकर, बुद्ध के “चित्त विशुद्धि” वाले चश्मे से इस मुद्दे को देखना होगा, तभी हम सत्य के निकट पहुँच पाएंगे।
चलिए उन तर्कों को भी समझते हैं जो आज के समय में बहुत प्रचलित हैं। कई आधुनिक आचार्य और साधक यह तर्क देते हैं कि भोजन केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि चित्त की गहराइयों को भी प्रभावित करता है।
कहा जाता है कि जब किसी प्राणी की हत्या की जाती है, तो मृत्यु के क्षण में वह अत्यधिक भय, पीड़ा या द्वेष से भरा होता है। यह तीव्र ‘वेदना’, भय और पीड़ा की तरंगें उसके मांस में संग्रहित हो जाती है, जिसे खाने से हमारे भीतर भी क्रोध और द्वेष के संस्कार संक्रमित होते हैं।
इससे साधक के भीतर अकारण ही क्रोध, काम-राग, आलस्य और हिंसक वृतियाँ जागने लगती हैं। यह तामसिक गुण चित्त की एकाग्रता को भंग करता है और निर्वाण के मार्ग में एक भारी बाधा बनता है। यह बात सुनने में तार्किक और वैज्ञानिक-सी प्रतीत होती है। “जैसा अन्न, वैसा मन” की कहावत यहाँ सटीक बैठती हुई दिखती है।
तब प्रश्न खड़ा होता है— क्या बुद्ध ने भी ऐसा ही माना था?
यदि मांस खाने से सचमुच ‘द्वेष’ और ‘हिंसा’ का संक्रमण होता, तो बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को इसकी अनुमति कदापि न दी होती। यदि यह निर्वाण में बाधक होता, तो न कोई भिक्षु साधना करते हुए इसका सेवन करता, न स्वयं बुद्ध, और न ही कोई अरहंत (मुक्त संत पुरुष) इसका सेवन कभी करते। अतः हमें अपनी धारणाओं और बुद्ध के वचनों के बीच के सत्य को ‘त्रिकोटि-परिशुद्ध’ नियम से परखना होगा।
इन आशंकाओं का निवारण बुद्ध ने स्वयं जीवक सुत्त में कर दिया है। जब राजवैद्य जीवक ने बुद्ध से पूछा कि क्या तथागत के लिए जानवरों का वध किया जाता है, तो बुद्ध ने मांसाहार के विषय में एक स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी।
बुद्ध ने कहा कि ऐसा मांस जो ‘त्रिकोटि-परिशुद्ध’ (तीन प्रकार से शुद्ध) हो—
—वह भिक्षु के लिए ग्राह्य है। यदि ये तीन शर्तें पूरी होती हैं, तो वह मांस ‘पवत्त मांस’ (पहले से उपलब्ध मांस) कहलाता है। ऐसे मांस को ग्रहण करने में कोई पाप नहीं है, क्योंकि इसमें खाने वाले की ‘हिंसक चेतना’ शामिल नहीं है। यहाँ कर्म का सिद्धांत पूरी तरह ‘इरादे’ पर टिका है। यदि आपने मारने का आदेश नहीं दिया, या मंशा भी नहीं की, तो वह हिंसा आपका कर्म नहीं बनती।
भिक्षाटन पर निर्भर रहने वाले भिक्षु भोजन को स्वयं चुनने की स्थिति में नहीं होते, अतः जो श्रद्धा से दिया गया मांस तीनों शर्तों पर खरा उतरे, उसे खाया जाता है। और जो भिक्षु कभी मांसाहारी भोजन विशेष रूप से बनवाते हों, यदि वह मांस पवत्त मांस हो, तो ग्रहण करने में कोई पाप नहीं है।
यदि बुद्ध ने मांस की अनुमति दी, तो फिर विनय पिटक में कुछ विशेष जानवरों का मांस वर्जित क्यों किया गया?
बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए दस प्रकार के मांस निषिद्ध किए हैं: मनुष्य, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, सांप, शेर, बाघ, चीता, भालू और लकड़बग्घा। यदि हम गहराई से देखें, तो यह निषेध ‘पवित्रता’ के कारण नहीं, बल्कि ‘लोक-लाज’ और ‘सुरक्षा’ के कारण था:
यह सूची ही यह सिद्ध करती है कि यदि बुद्ध को ‘सर्वथा मांसाहार निषेध’ करना होता, तो वे बस एक नियम बनाते— “मांस खाना मना है।” उन्हें यह विशेष सूची बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
यह इस पूरे विषय का सबसे सशक्त और निर्णायक तर्क है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
गौतम बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने बुद्ध से ‘बड़ा’ बनने की भूल की। उसने संघ में फूट डालने के लिए बुद्ध के सामने पाँच कठोर नियम लगाने की मांग रखी, ताकि वह जनता को दिखा सके कि “गौतम बुद्ध विलासी हैं, जबकि मैं उनसे अधिक तपस्वी हूँ।” उन मांगों में एक प्रमुख मांग यह थी: “भिक्षुओं के लिए आजीवन पूर्ण शाकाहार अनिवार्य किया जाए। जो मांस खाए, उसे पापी समझा जाए।”
ध्यान दें, शाकाहार की अनिवार्यता की मांग पापी देवदत्त ने की थी। वही देवदत्त, जिसने संघ को हथियाने के लिए फिर बुद्ध की हत्या के प्रयास किए। बुद्ध ने इस मांग को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा: “नहीं देवदत्त, जिसे इच्छा हो वह मांस खाए, जिसे इच्छा हो वह न खाए।”
बुद्ध ने इसे अनिवार्य क्यों नहीं किया? क्योंकि वे जानते थे कि यदि भोजन को ही धर्म का आधार बना दिया गया, तो भविष्य में लोग ‘चित्त की शुद्धि’ को भूलकर केवल ‘थाली की शुद्धि’ में उलझ कर रह जाएंगे।
जो लोग आज यह कहते हैं कि “शुद्ध शाकाहारी ही सच्चा बौद्ध है,” वे अनजाने में बुद्ध के मार्ग का नहीं, अपितु देवदत्त के मार्ग का समर्थन करते हैं। यह बात आरोप के रूप में नहीं, बल्कि धम्म की प्राथमिकता को समझाने के लिए कही जा रही है।
कुछ आलोचक यह तर्क भी देते हैं: “चलिए मान लेते हैं कि आप स्वयं हत्या नहीं करते। लेकिन कसाई तो आप लोगों की मांग देखकर ही हत्या करता है। अतः आप परोक्ष रूप से उस हत्या में सहायक बनते हैं।”
‘मांग और आपूर्ति’ की बात अर्थशास्त्र की दृष्टि से तो सही लगती है, किंतु ‘परोक्ष ज़िम्मेदारी’ का यह तर्क एक ऐसी दुधारी तलवार है जो फिर समान रूप से शाकाहारियों पर भी लागू होती है। यदि कोई सच्चा साधक गहराई से चिंतन करे, तो उसके सामने असहज करने वाला यह नंगा सत्य प्रकट होता है कि यहाँ जीवन ही जीवन की आहुति पर टिका है। इस संसार में पूर्ण अहिंसा एक मिथक है।
क्या वनस्पति, पेड़-पौधे और बीजों में जीवन नहीं है? एक शाकाहारी थाली तैयार करने के लिए जब धरती का सीना चीरा जाता है (हल चलाना), तो लाखों जीव, केंचुए और कीट मारे जाते हैं। फसल को बचाने के लिए कीटनाशकों का छिड़काव ‘भूलवश’ नहीं, बल्कि ‘पूरी चेतना’ के साथ की गई सामूहिक हत्या है। गोदामों में अनाज सुरक्षित रखने के लिए चूहों का नाश किया जाता है। यहाँ तक कि जब हम बीमार पड़ते हैं और एंटीबायोटिक लेते हैं, तो हम अपने प्राण बचाने के लिए जानबूझकर अरबों जीवित बैक्टीरिया का संहार कर रहे होते हैं।
जैन परंपरा के मुनि मुख पर कपड़ा (मुंहपत्ती) बांधते हैं और पानी छानकर पीते हैं। लेकिन व्यावहारिक सत्य यह है कि पानी उबालने की प्रक्रिया हो या ‘शुद्ध शाकाहारी’ भोजन उगाना, अनगिनत जीवों की हिंसा उसमें निहित है।
यदि हम ‘परोक्ष हत्या’ का हिसाब लगाने बैठें, तो मांसाहारियों और शाकाहारियों का सांस लेना भी अपराध हो जाएगा। जीवन धारण करना ही किसी न किसी रूप में अन्य जीवों के संसाधनों का उपभोग करना है।
तो फिर हम क्या करें, अन्न-वस्त्र-जल सब त्याग दें? नहीं, यह समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक और भारी अकुशल कर्म होगा। यह दुर्लभ मनुष्य जीवन धम्म-साधना के लिए मिला है, इसे नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं।
यहीं पर बुद्ध की ‘प्रज्ञा’ काम आती है। बुद्ध जानते थे कि यदि हम ‘परोक्ष हिंसा’ का हिसाब लगाने बैठेंगे, तो अस्तित्व का यह ताना-बाना ही टूट जाएगा। यदि बुद्ध ने यह नियम बनाया होता कि “तुम्हारे कारण किसी को कष्ट नहीं होना चाहिए,” तो कोई भी व्यक्ति कभी चल-फिर भी नहीं पाता।
इसीलिए, बुद्ध ने एक व्यावहारिक सीमा खींची। उन्होंने कर्मों के परिणाम देखकर हिंसा की परिभाषा को ‘परिणाम’ से हटाकर ‘चेतना’ (मंशा) पर केंद्रित कर दिया। बुद्ध का नियम स्पष्ट है: “क्या तुम्हारे मन में मारने की इच्छा थी?” यदि उत्तर ‘ना’ है, और आप केवल जीवन निर्वाह के लिए भोजन (चाहे वह मांस हो या साग-सब्जी) ग्रहण कर रहे हैं, तो आप दोषी नहीं हैं।
यदि हम दुनिया के कर्म का बोझ अपने सिर लेंगे, तो मुक्ति असंभव है। हमें ‘संसार’ को नहीं सुधारना है, हमें अपने ‘चित्त’ को सुधारना है।
जब आप बाज़ार से मांस या सब्जी खरीदते हैं, तो आपका इरादा ‘पेट भरना’ है, ‘हत्या करवाना’ नहीं। यह संसार का एक दुष्चक्र है जिससे बाहर निकलने का रास्ता ‘खाना छोड़ना’ नहीं, बल्कि ‘तृष्णा छोड़ना’ है। बुद्ध का मध्यम मार्ग हमें इसी अतिवादी सोच से बचाता है।
वीगनवाद का तर्क उन शाकाहारी लोगों की भी बोलती बंद करता है जो कहते हैं कि “हम तो हिंसक नहीं हैं। हाँ, दूध-दही जरूर खाते हैं।”
वीगन लोग कहते हैं कि यदि आप मांस नहीं खाते क्योंकि उसमें हिंसा है, तो आपको दूध, दही, घी, पनीर और चाय भी छोड़ देनी चाहिए। भारत में जिसे “शाकाहार” कहा जाता है, वह वास्तव में “दुग्ध-शाकाहार” है। परन्तु दुग्ध-व्यवसाय और कत्लखाने एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
दूध पाने के लिए गाय/भैंस को बार-बार गर्भवती किया जाता है। जो बछड़ा पैदा होता है, अगर वह नर हो तो वह किसान के लिए ‘बेकार’ माना जाता है, क्योंकि अब बैल से उतनी खेती नहीं होती। उन नर बछड़ों को या तो सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है या कत्लखानों में चमड़े के लिए बेच दिया जाता है। अतः, हर गिलास दूध के पीछे एक बछड़े के कटने या तड़पकर मरने की परोक्ष कहानी है।
अगर हम तर्क करें कि “मांसाहार हिंसा है”, तो “दूध पीना” भी क्रूरता में कम नहीं है। लेकिन, भगवान बुद्ध ने सुजाता की खीर (दूध-चावल) ग्रहण की थी। बुद्ध ने दूध, दही, घी, मक्खन और तेल को ‘पंचगव्य’ या औषधीय रूप में भिक्षुओं के लिए अनुमति दी थी। यदि बुद्ध ने दूध मना नहीं किया (जिसमें बछड़े का हक मारा जाता है), और मांस मना नहीं किया (जो भिक्षा में मिला हो), तो इसका अर्थ यही है कि बुद्ध हमें भोजन की राजनीति में नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि में लगाना चाहते थे।
जो शाकाहारी लोग मांसाहारियों को ‘पापी’ कहते हैं, वीगन तर्क के अनुसार वे स्वयं भी ‘दूध के लिए क्रूरता’ के भागीदार हैं। यह तुलना शाकाहार को गलत ठहराने के लिए नहीं, बल्कि नैतिक शुद्धता के दावे की सीमाएँ दिखाने के लिए है।
कुछ लोग कहते हैं, “बौद्ध धम्म मैत्री सिखाता है। क्या आप जिस प्राणी से मैत्री करते हैं, उसे खा सकते हैं?” यह एक भावुक बात है, तर्कसंगत नहीं। मैत्री का अर्थ है—“सभी प्राणी सुखी हों, सुरक्षित हों।” इसका अर्थ यह नहीं है कि “सभी प्राणी अमर हो जाएं।” मृत्यु एक अटल सत्य है। बुद्ध ने उपासकों को कसाई का पेशा (“मिथ्या-जीविका”) करने से मना किया है, लेकिन भोजन खरीदने से नहीं।
कुछ लोग कहते हैं, “शरीर एक मंदिर है, इसमें मरे हुए जानवरों की लाश डालकर इसे श्मशान मत बनाओ।” यह बहुत प्रचलित डायलॉग है, लेकिन यह सद्धर्म के बिल्कुल विपरीत है। बुद्ध ने सिखाया है कि यह शरीर न तो मंदिर है, न श्मशान। यह मात्र “३२ अशुद्ध अंगों का थैला” है। आप इसमें “पनीर और खीर” डालें, या “मांस और मछली”—पेट में जाकर सब कुछ मल, मूत्र, पित्त और कफ में ही बदलता है। शाकाहारी का पेट कोई ‘स्वर्ग’ नहीं बन जाता और मांसाहारी का पेट ‘नरक’ नहीं। दोनों ही अशुभ, गंदगी से भरे हैं। धम्म शरीर को ‘पवित्र’ बनाने या पूजने के लिए नहीं, बल्कि उसके प्रति ‘आसक्ति’ छोड़ने के लिए है।
कुछ लोग कहते हैं, “मांसाहार से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है, इसलिए एक बौद्ध को पर्यावरण रक्षक होना चाहिए।” यह एक आधुनिक समस्या है और एक अच्छा तर्क भी। एक जागरूक नागरिक होने के नाते हम मांस का उपभोग कम कर सकते हैं। किंतु, इसे “पाप और पुण्य” या “निर्वाण” से नहीं जोड़ा जा सकता। बुद्ध का लक्ष्य ‘संसार को बचाना’ नहीं था, क्योंकि संसार तो अनित्य है, यह एक दिन नष्ट होगा ही। बुद्ध का लक्ष्य ‘संसार से मुक्त होना’ था। पर्यावरण को बचाना अच्छी बात है, पर यह ‘शील’ का उल्लंघन या पाप नहीं है। यदि कोई पर्यावरण के लिए वीगन बनता है, तो अच्छी बात है। पर इसे “धम्म का नियम” बताकर दूसरों पर थोप नहीं सकता।
अंत में प्रश्न उठता है कि फिर विपश्यना केंद्रों में आज भी मांस वर्जित क्यों है?
हमें यह समझना होगा कि एक ध्यान शिविर ‘मन का चिकित्सालय’ है। जैसे अस्पताल में रोगी को विशेष पथ्य (डाइट) दिया जाता है, वैसे ही गहन साधना के समय सुपाच्य और हल्का भोजन (शाकाहार) आलस्य और निद्रा को दूर रखने में सहायक होता है। यह एक ‘अनुशासन’ है, धर्म का अंतिम सत्य नहीं।
गृहस्थों के लिए भी बुद्ध का यही ‘मध्यम मार्ग’ है।
यदि आप बाज़ार से मांस (मृत प्राणी का मांस) खरीद रहे हैं, तो आप ‘जीवहत्या’ के दोषी नहीं हैं, क्योंकि आपने उस प्राणी को मारने की ‘चेतना’ नहीं की थी। वह प्राणी आपके कहने पर नहीं मारा गया।
अंततः, धम्म का सार ‘त्याग’ है—भोजन का नहीं, विकारों का। तथागत का अंतिम भोजन (सूकर-मद्दव) हमें यही सिखाता है कि एक बुद्ध के लिए भोजन केवल शरीर को टिकाए रखने का ईंधन मात्र है। चाहे वह सूखी रोटी हो या मांस, यदि वह लोभ, द्वेष और मोह से रहित होकर ग्रहण किया गया है, तो वह शुद्ध है।
मुक्ति आहार बदलने से नहीं, स्वभाव बदलने से मिलेगी। १००% शुद्ध शाकाहार हो या मांसाहार, मुक्ति दोनों ही भोजन से नहीं मिलती। मुक्ति तृष्णा के क्षय से मिलती है। साधक को चाहिए कि वह अपनी ऊर्जा ‘थाली की शुद्धि’ में व्यर्थ न गंवाए, बल्कि ‘चित्त की शुद्धि’ में लगाए, क्योंकि निर्वाण का द्वार पेट से नहीं, प्रज्ञा से खुलता है।
सूकरमद्दव वही अंतिम और प्राणघातक भोज बना, जिसे भगवान बुद्ध ने ग्रहण किया। “सूकर” का सीधा अर्थ सूअर होता है। इसी कारण अनेक श्रद्धालु इस विचार से असहज हो जाते हैं कि भगवान का परिनिर्वाण सूअर के मांस के सेवन के बाद हुआ। और यहीं से “सूकरमद्दव” को लेकर विवाद जन्म लेता है।
कुछ विद्वान यह भी कहते हैं कि ‘सूकर’ नाम का प्रयोग कुछ विशेष मशरूम या बाँस की कोमल टहनियों के लिए भी होता था, जो नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों तथा चीन में इसी नाम से जानी जाती हैं। किन्तु अट्ठकथा इस विषय में स्पष्ट है। प्राचीन महा-अट्ठकथा के अनुसार “सूकरमद्दव” का अर्थ “सूअर का कोमल मांस” ही है। और इस व्याख्या में किसी प्रकार का संदेह या विवाद नहीं माना गया है। ↩︎
वे जैन सूत्र हैं आचरङ्गसूत्र २.१.१०, भगवतीसूत्र ५५७, कल्पसूत्र-सामाचारी १७, दसवेयालियसुत्त ५-१.७३ इत्यादि। ↩︎