
भगवान बुद्ध की देशना का हृदय ‘पटिच्चसमुप्पाद’ है। यह शब्द दो पदों के मेल से बना है: ‘पटिच्च’ (प्रतीत्य/आधारित होकर) और ‘समुप्पाद’ (एक साथ उत्पन्न होना)। इसका शाब्दिक अर्थ है— “किसी हेतु के होने पर ही फल का उत्पन्न होना।”
बुद्ध ने इसे ‘इदप्पच्चयता’ के रूप में परिभाषित किया है: “इसके होने से, वह होता है। इसके उत्पन्न होने से, वह उत्पन्न होता है। इसके न होने से, वह नहीं होता। इसके निरोध से, उसका निरोध हो जाता है।”
यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत ‘आत्मा’ की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को ‘पका’ रही है और ‘खा’ रही है।
इस प्रक्रिया को बुद्ध ने द्वादश निदान (बारह कड़ियों) के माध्यम से समझाया है।
ये बारह कड़ियाँ एक पहिए की तरह हैं, जो अज्ञानता की धुरी पर घूम रही हैं।
यह चक्र की प्रथम अवस्था है, लेकिन इसे ‘शुरुआत’ नहीं, बल्कि वह ‘पृष्ठभूमि’ समझना चाहिए जिसमें यह नाटक घटित होता है। अविद्या का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि ‘विपरीत ज्ञान’ है। यह चार आर्य सत्यों को न जानना है। अविद्या के कारण हम अनित्य को नित्य, दुख को सुख और अनात्म को ‘मैं’ (आत्मा) मान बैठते हैं। इसी अंधेरे में हम भटकते हैं और कर्म करने को प्रेरित होते हैं।
अविद्या के वशीभूत होकर हम ‘रचना’ करना आरंभ करते हैं। इसे अभिसंखार भी कहते हैं—अर्थात् अपनी दुनिया को सक्रिय रूप से तैयार करना। हम तीन प्रकार से रचना करते हैं:
ये संखार केवल अतीत के कर्म नहीं हैं, बल्कि यह वर्तमान की वह इच्छाशक्ति (चेतना) है जो भविष्य के लिए बीज बो रही है।
संखारों के धक्का देने पर विञ्ञाण (चेतना) की उत्पत्ति होती है। यह वह तत्व है जो ‘जानता’ है। इसे एक प्रकाश-पुंज या ‘बीज’ की उपमा दी जा सकती है।
जब संखार सक्रिय होते हैं, तो विञ्ञाण किसी विषय पर जाकर प्रतिष्ठित हो जाता है। यह विञ्ञाण ही माता के गर्भ में उतरता है और नए जीवन का आधार बनता है। यह वहीं स्थापित होता है जहाँ इसकी रुचि या झुकाव होता है।
विञ्ञाण अकेले कार्य नहीं कर सकता; उसे ठहरने के लिए एक धरातल चाहिए। वह धरातल नाम-रूप है।
नाम-रूप के पुष्ट होने पर छह इंद्रिय द्वार (आयतनानि) विकसित होते हैं—आँख, कान, नाक, जीभ, काया और मन। बुद्ध इन्हें ‘शून्य गाँव’ की उपमा देते हैं। ये द्वार अपने आप में खाली हैं, लेकिन इन्हीं झरोखों से बाह्य संसार भीतर प्रवेश करता है और भीतर का संसार बाहर झांकता है।
जब (१) इंद्रिय, (२) विषय, और (३) विञ्ञाण—ये तीनों एक सीध में मिलते हैं, तो फस्स (संस्पर्श) घटित होता है।
यह केवल भौतिक टकराव नहीं है, बल्कि अनुभव की चिंगारी है। फस्स के बिना हमें अपने अस्तित्व का भान ही नहीं हो सकता। यह वह बिंदु है जहाँ जगत हमारे चित्त को छूता है।
फस्स के होते ही तत्काल वेदना उत्पन्न होती है। यह अनुभव का स्वाद है। यह तीन प्रकार की होती है: सुखद, दुखद, या अदुक्खम-असुख (उपेक्षा)।
यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि वेदना केवल शारीरिक संवेदना नहीं है, बल्कि यह मन पर पड़ने वाला प्रभाव है। यह पुराने कर्मों का ‘विपाक’ (फल) है। हम संसार को तथ्यों के रूप में नहीं, बल्कि वेदनाओं के रूप में भोगते हैं।
यहीं से चक्र जटिल होता है। वेदना के प्रति जो हमारी प्रतिक्रिया होती है, वह तण्हा है।
तण्हा जब घनी और तीव्र हो जाती है, तो वह उपादान बन जाती है। शब्दार्थ की दृष्टि से उपादान का अर्थ है— ‘ईंधन’ या ‘आहार’। अग्नि को जलने के लिए जैसे ईंधन चाहिए, वैसे ही भव को जलने के लिए उपादान चाहिए। हम चार प्रकार से आहार लेते हैं:
उपादान (ईंधन) मिलने पर प्रक्रिया आगे बढ़ती है और भव का निर्माण होता है। इसे दो स्तरों पर समझें:
जब चित्त उस रचे हुए ‘भव’ (स्वप्न-लोक) में किसी पात्र के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है—कि “यह मैं हूँ”—तो इसे जाति (जन्म) कहते हैं।
यह केवल माता के गर्भ से निकलना नहीं है। यह हर क्षण घटता है। जब भी आप क्रोधित होते हैं, आप ‘क्रोध-लोक’ में जन्म लेते हैं; जब भी आप लोभी होते हैं, आप ‘प्रेत-लोक’ में जन्म लेते हैं। आपने एक सीमित पहचान धारण कर ली।
जो भी ‘जन्मा’ है, जो भी ‘बना’ है, उसका स्वभाव है बिखरना। क्योंकि हमने उस पहचान को ‘मैं’ मान लिया था, इसलिए उसके टूटने पर शोक, परिदेव, दुख और दोमनस्स (मानसिक संताप) उत्पन्न होते हैं। यही दुख का पूरा पहाड़ है।
यह बारह कड़ियाँ किसी रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह सीधी नहीं जुड़ी हैं। लेकिन सुत्तों में बुद्ध ने इसे एक जटिल जाल और एक भंवर की तरह दर्शाया है, जिसे विशेष रूप से दो महत्वपूर्ण स्थानों पर तोड़ा जा सकता है।
दीघ निकाय के महानिदान सुत्त में बुद्ध आनंद से कहते हैं कि यह पटिच्चसमुप्पाद गंभीर है और गंभीर दिखाई देता है। वहाँ बुद्ध बताते हैं कि यह पूरी श्रृंखला नाम-रूप और विञ्ञाण के बीच के संबंध पर आकर एक ‘लूप’ (चक्र) बना लेती है।
बुद्ध इसे दो सरकंडों (नळकलपी) की उपमा देते हैं। कल्पना करें कि दो सरकंडे (बांस की डंडियां) एक-दूसरे के सहारे खड़े हैं।
यदि आप एक को हटा दें, तो दूसरा गिर जाएगा। विञ्ञाण के बिना नाम-रूप (गर्भ में भ्रूण या वर्तमान क्षण में अनुभव) विकसित नहीं हो सकता। और नाम-रूप के बिना विञ्ञाण को टिकने के लिए कोई आधार नहीं मिलेगा। यह दोनों एक-दूसरे को लगातार पैदा करते रहते हैं।
यही वह स्थान है जहाँ ‘जीवन’ का भ्रम पैदा होता है। विञ्ञाण एक बीज की तरह है और नाम-रूप खेत की तरह। जब हम अविद्या के कारण कर्म (संखार) करते हैं, तो हम विञ्ञाण रूपी बीज को बार-बार नाम-रूप के खेत में रोपते हैं।
मुक्ति का द्वार:
सुत्तों के अनुसार, मुक्ति तब मिलती है जब विञ्ञाण को ‘अप्रतिष्ठित’ (बिना आधार का) कर दिया जाए। बुद्ध कहते हैं— “जैसे दीवार पर धूप की किरण पड़ती है। यदि दीवार न हो, तो किरण कहाँ दिखेगी? कहीं नहीं।”
जब साधक अपनी साधना से विञ्ञाण को किसी भी ‘नाम-रूप’ (विचार, शरीर, योजना) पर चिपकने नहीं देता, तब विञ्ञाण को आधार नहीं मिलता। वह बीज अंकुरित नहीं होता। विञ्ञाण की यह ‘अनाधार’ अवस्था ही चक्र को इस बिंदु पर तोड़ देती है। इसे ‘विञ्ञाण उपसम’ (चेतना का शांत हो जाना) कहते हैं।
दूसरा और सबसे गहरा स्तर है अविद्या और संखार का। संखार का अर्थ है ‘रचना करना’ या ‘बनाना’। हम हर पल अपने मन में दुनिया बना रहे हैं। यह निर्माण कार्य अविद्या (बेहोशी) के कारण चलता है। हमें लगता है कि यह रचनाएँ सुख देंगी, या ये ‘मैं’ हूँ।
बुद्ध इसे गृहकारक (घर बनाने वाले) की उपमा देते हैं। अविद्या वह आर्किटेक्ट है जो नक्शा बनाता है, और संखार वे ईंटें हैं जिनसे भव (घर) खड़ा होता है।
जब तक अविद्या है, संखार बनते रहेंगे। संखार विञ्ञाण को धक्का देंगे, विञ्ञाण नाम-रूप में उतरेगा, और दुख का पूरा वृक्ष खड़ा हो जाएगा।
मुक्ति का द्वार: यहाँ चक्र को तोड़ने का उपाय है ‘अविद्या-विराग-निरोध’।
जब विपश्यना (विशेष दृष्टि) से साधक देखता है कि सभी संखार अनित्य हैं, दुख हैं और अनात्म हैं, तो अविद्या का पर्दा फट जाता है। जब अविद्या मिटती है, तो मन नई रचनाएँ (संखार) बनाना बंद कर देता है।
आपकी यह उपमा अत्यंत सटीक और सुत्त-सम्मत है कि ‘भव और जाति’ की प्रक्रिया ‘सो कर स्वप्न देखने’ जैसी है।
यह प्रक्रिया केवल मृत्यु के समय ही नहीं, बल्कि हर पल घट रही है। कम्म (कर्म) वह शक्ति है जो हमें किसी विशेष भव (लोक) की ओर खींचती है।
ये लोक केवल बाहर भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चित्त की अवस्थाएँ भी हैं।
इस पूरे चक्र को भेदने के लिए बुद्ध एक बहुत ही सूक्ष्म अवस्था का संकेत देते हैं जिसे ‘अतम्मयता’ कहा जाता है। अतम्मयता का अर्थ है— “उससे तन्मय न होना” या “उससे बना हुआ न होना।”
जब साधक देखता है कि:
तो वह उनसे ऊब जाता है (निब्बिदा)। वह अब विञ्ञाण के किसी भी खेल में हिस्सा नहीं लेता। वह न तो ‘भव’ की चाह रखता है (विभव-तण्हा), न ही ‘अस्तित्व’ की चाह (भव-तण्हा)।
इस अवस्था में, साधक का चित्त ‘अनिदस्सन’ (निराकार/अदृश्य) हो जाता है। “जैसे पका हुआ फल पेड़ की डाल से स्वयं गिर पड़ता है,” वैसे ही उसका चित्त भवचक्र से टूटकर गिर जाता है। यहाँ न तो अविद्या है जो संखार रचे, और न ही तण्हा है जो विञ्ञाण को नाम-रूप से चिपकाए। यह शांति है। यह निर्वाण है।
यही बुद्ध का असली संदेश है: चक्र को केवल समझना नहीं, बल्कि उस सटीक संधि-स्थान (विञ्ञाण-नामरूप या अविद्या-संखार) को पहचानना जहाँ इसे तोड़ा जा सके। और यह तभी संभव है जब चित्त अविद्या की नींद से जागकर ‘अतम्मय’ हो जाए।