
दुनिया के अधिकतर धर्म ‘विश्वास’ (Belief) पर टिके हैं। वे कहते हैं— “इस किताब पर भरोसा करो,” या “ईश्वर पर भरोसा करो।” लेकिन बुद्ध का धम्म ‘खोज’ (Discovery) पर टिका है।
यह किसी ईश्वर के अवतार की कहानी नहीं है। यह एक साधारण इंसान (सिद्धार्थ गौतम) की कहानी है जिसने अपने दम पर, बिना किसी गुरु की मदद के, जीवन के सबसे बड़े सच को खोज निकाला। वह घटना जब सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ बने, उसे हम ‘संबोधि’ (Enlightenment) कहते हैं।
आज २६०० साल बाद भी, वह ज्ञान हमारे जीवन के तनाव, डिप्रेशन और सभी दुःखों को जड़ से खत्म करने की ताकत रखता है। लेकिन सवाल यह है— आखिर उस रात बुद्ध ने ऐसा क्या जान लिया था जो हम नहीं जानते?
क्या बुद्ध ‘सर्वज्ञ’ थे? क्या उन्हें पता था कि दुनिया कैसे बनी, आत्मा का साइज क्या है, या ब्रह्मांड का अंत कब होगा?
एक बार भगवान बुद्ध कोसांबी के ‘सीसपा वन’ (जंगल) में रुके थे। उन्होंने जमीन से मुट्ठी भर सूखे पत्ते उठाए और भिक्षुओं से पूछा: “भिक्षुओं! मेरे हाथ में ये जो थोड़े से पत्ते हैं वे अधिक हैं, या इस विशाल जंगल के सूखे पत्ते?”
भिक्षुओं ने कहा: “भंते! आपके हाथ में तो बस मुट्ठी भर पत्ते हैं, जबकि जंगल में तो अनगिनत पत्ते हैं।”
तब बुद्ध ने एक गहरा राज खोला: “बस यही समझ लो! मैंने जो जाना है (संबोधि में), वह इस जंगल के पत्तों जैसा ‘अनंत’ है। लेकिन मैंने तुम्हें जो सिखाया है, वह केवल इस मुट्ठी भर पत्तों के समान है।”
बुद्ध ने ऐसा क्यों किया? क्योंकि बाकी का ज्ञान (ब्रह्मांड का रहस्य, ईश्वर है या नहीं, आदि) सुनने में मजेदार हो सकता है, लेकिन वह तुम्हारे ‘दुःख’ को कम नहीं कर सकता। वह केवल टाइम-पास है। बुद्ध ने केवल वही ‘मुट्ठी भर ज्ञान’ दिया जो तुम्हारे सीने में चुभे हुए तीर (पीड़ा) को निकालने के लिए जरूरी है।
संबोधि की रात, बुद्ध ने मुख्य रूप से तीन बातें जानीं। यही उनकी खोज का सार है:
रात के पहले पहर में, बुद्ध का मन लेजर-बीम की तरह एकाग्र हो गया। उन्हें अपने लाखों पिछले जन्म याद आने लगे। “मैं वहां था… मेरा यह नाम था… मैंने वह सुख भोगा… फिर मरकर वहां पैदा हुआ…”
इस ज्ञान ने उनके ‘अहंकार’ (Ego) को तोड़ दिया। उन्हें समझ आ गया कि जिसे वे “मैं” समझ रहे थे, वह कोई एक ठोस इंसान नहीं, बल्कि जन्मों-जन्मों से बहती आ रही एक धारा है। यह ‘मैं’ केवल एक प्रोसेस है, कोई स्थायी चीज़ नहीं।
रात के दूसरे पहर में, उन्हें दिव्य-दृष्टि मिली। उन्होंने देखा कि दुनिया में कोई ईश्वर किसी को सजा या इनाम नहीं दे रहा। यहाँ तो बस ‘कर्म’ का नियम चल रहा है।
जैसे हम बीज बोते हैं, वैसा फल मिलता है। हमारे अपने ही इरादे (Intentions) और काम हमें ऊंच-नीच, सुखी-दुखी बना रहे हैं। इस ज्ञान ने उनके मन से ‘दैवीय चमत्कार’ का भ्रम मिटा दिया। उन्हें दिखा कि हर कोई अपने कर्मों का वारिस है।
रात के तीसरे और आखिरी पहर में, उन्होंने सबसे कीमती ज्ञान पाया— मुक्ति की चाबी।
उन्होंने चार आर्य सत्यों को आर-पार देखा। उन्होंने जाना कि दुःखों की असली जड़ बाहर नहीं, हमारे भीतर छिपी ‘तृष्णा’ (Craving) और ‘अविद्या’ (अज्ञान) है।
जैसे ही उन्होंने इस अज्ञान को नष्ट किया, उनके मन के सारे विकार (लालच, नफरत, मोह) हमेशा के लिए बुझ गए। सूरज उगने के साथ ही उन्होंने घोषणा की— “जंजीरें टूट गईं! अब दोबारा जन्म नहीं होगा। काम पूरा हुआ!”
बुद्ध ने हमें अपने पिछले जन्मों की कहानियां मनोरंजन के लिए नहीं सुनाईं। उन्होंने एक बहुत ही डरावना सच बताया:
भिक्षुओं! इस लंबे संसार-चक्र में भटकते हुए तुमने इतना रोया है, अपनों को खोकर इतना विलाप किया है कि तुम्हारे आंसुओं का पानी चार महासागरों के जल से भी अधिक है। बस बहुत हुआ! अब इस खेल को बंद करने का समय आ गया है।
बुद्ध यह सब बताकर हमें डराना नहीं, बल्कि जगाना चाहते थे। इसे ‘संवेग’ कहते हैं।
संवेग का मतलब है— “अरे! मेरा घर (जीवन) जल रहा है और मैं मजे से सो रहा हूँ?” वाली फीलिंग। जब तक हमें यह नहीं लगेगा कि हम खतरे में हैं, हम मुक्ति की कोशिश नहीं करेंगे।
संबोधि कोई जादुई घटना नहीं है जो सिर्फ ‘भगवान’ के साथ घट सकती है। यह ‘मन की पूर्ण सफाई’ का नाम है।
बुद्ध का रास्ता किसी खास जाति या धर्म के लिए नहीं है। यह एक ओपन-सीक्रेट है। जो भी व्यक्ति—
—वह उसी ‘संबोधि’ को पा सकता है जो बुद्ध ने पाई। बुद्ध मुक्ति “देते” नहीं हैं, वे मुक्ति का “रास्ता” देते हैं। उन्होंने नक्शा (मुट्ठी भर पत्ते) हमारे हाथ में दे दिया है। अब उस पर चलना हमारी जिम्मेदारी है।