✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

शरण

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १० मिनट
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प्राचीन काल में, जब मनुष्य घने जंगलों में हिंस्र पशुओं और कड़कती बिजली से घिर जाता था, तो वह भयभीत होकर किसी गुफा, पर्वत या वृक्ष की ‘शरण’ ढूँढता था। कांपते हुए व्यक्ति के लिए बस एक ही आस होती थी—सुरक्षा।

आज का मनुष्य जंगलों में नहीं रहता, लेकिन वह आज भी असुरक्षित है। आज के हिंस्र पशु बाहर नहीं, भीतर हैं। ‘लोभ, द्वेष और भ्रम’ के वो शत्रु, जो हमें दिन-रात नोचते हैं। बाहर की गुफाएँ शरीर को बचा सकती हैं, लेकिन चित्त को जलने से कौन बचाएगा? हम आज भी भाग रहे हैं, किसी ऐसे रक्षक की तलाश में जो हमें खुद से बचा सके।

बौद्ध परंपरा में ‘शरण-गमन’ इसी भीतरी युद्ध का शंखनाद है। यह किसी ईश्वर के आगे घुटने टेककर भीख माँगना नहीं है। बुद्ध ‘ईश्वर’ नहीं हैं जो चमत्कार से आपको बचा लेंगे। वे एक ‘जागृत सत्य’ हैं। शरण जाने का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि “मैं अपने विकारों से हार रहा हूँ, और अब मुझे एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता है जिसने इन शत्रुओं को परास्त किया हो।”

मन ही शत्रु है, और मन ही मुक्तिदाता। इसलिए शरण दो स्तरों पर काम करती है: बाहरी शरण (मार्गदर्शन के लिए) और भीतरी शरण (सुरक्षा के लिए)। बाहरी शरण हमें रास्ता दिखाती है, लेकिन जब हम उस रास्ते पर चलते हैं, तो हमारे भीतर उपजे ‘गुण’ ही हमारी असली शरण बन जाते हैं।

त्रिरत्न: तीन अभेद्य कवच

बौद्ध धर्म में शरणस्थल तीन हैं—बुद्ध, धम्म और संघ। इन्हें ‘रत्न’ कहा गया। पत्थर के रत्न तो केवल गरीबी मिटा सकते हैं, किन्तु ये तीन रत्न ‘भव-रोग’ (जन्म-मरण के चक्र) को मिटाते हैं। ये तिलिस्मी ताबीज नहीं हैं, बल्कि ‘सत्य’ के वो स्तम्भ हैं जो हमें बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु के महाभय से मुक्त कर, निर्वाण की अचल संपत्ति प्रदान करते हैं।

भगवान बुद्ध ने धम्मपद में स्पष्ट किया है:

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बतानि वनानि च,
आरामरुक्खचेत्यानि, मनुस्सा भयतज्जिता।”

अर्थात—
खतरों से भयभीत होकर,
मानव लेते शरण अनेक,
वन, पर्वत या उद्यान हो,
चैत्य हो या वृक्ष अनेक।

नेतं खो सरणं खेमं, नेतं सरणमुत्तमं,
नेतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति।”

अर्थात—
न शरण वह सर्वोत्तम है,
न ही वह सुरक्षित है,
जिसकी लेकर शरण कोई,
सब दुःखों से छूट जाएँ।

यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च, सङ्घञ्च सरणं गतो,
चत्तारि अरियसच्चानि, सम्मप्पञ्ञाय पस्सति।
दुक्खं दुक्खसमुप्पादं, दुक्खस्स च अतिक्कमं,
अरियं चट्ठङ्गिकं मग्गं, दुक्खूपसमगामिनं।”

अर्थात—
किन्तु बुद्ध, धर्म और संघ की,
जब कोई शरण लेता है,
  उसे चार आर्यसत्यों का,
सम्यक दर्शन होता हैं।
दुःख और दुःख उत्पत्ति,
और दुःख को लाँघना,
चार-अंगी आर्यमार्ग पर,
चलने से दुःख का रुक जाना।

“एतं खो सरणं खेमं, एतं सरणमुत्तमं,
एतं सरणमागम्म, सब्बदुक्खा पमुच्चति।”

अर्थात—
यह शरण सर्वोत्तम है,
यही शरण सुरक्षित है,
जिसकी लेकर शरण कोई,
सब दुःखों से छूटता है।

— धम्मपद १४ बुद्धवग्ग : १८८ - १९२

१. बुद्ध: संबोधि की शरण

बुद्ध की शरण लेने का अर्थ केवल ‘सिद्धार्थ गौतम’ नामक व्यक्ति की पूजा करना नहीं है। यह उस ‘संबोधि’ में विश्वास करना है जो उनके भीतर घटित हुई।

जब आप बुद्ध की शरण जाते हैं, तो आप इस संभावना को नमन करते हैं कि “एक साधारण मनुष्य अपने प्रयासों से दुःखों का अंत कर सकता है।” बुद्ध ने लोभ, द्वेष और मोह को जड़ से उखाड़ फेंका। उन्होंने जिन गुणों से यह किया, वे गुण बीज रूप में हमारे भीतर भी हैं। बुद्ध की शरण लेना, अपने भीतर सोए हुए बुद्ध को जगाने का संकल्प है।

गहरे स्तर पर, बुद्ध की शरण लेना ‘कर्म-नियम’ के स्वामित्व को स्वीकारना है। यह मान लेना कि ‘मैं ही अपने कर्मों का स्वामी हूँ, और मैं ही उनका वारिस हूँ।’ जब तक हम अपने दुःखों के लिए दूसरों को, ईश्वर को, या भाग्य को दोषी ठहराते हैं, हम अनाथ हैं। जिस क्षण हम यह जिम्मेदारी स्वीकार लेते हैं कि ‘सुख और दुःख की जड़ मेरे अपने इरादों (चेतना) में है’, उसी क्षण हम सुरक्षित हो जाते हैं। अब जीवन का सूत्र हमारे हाथ में है। बाहरी निर्भरता से हटकर, भीतरी जिम्मेदारी को थाम लेना ही बुद्ध की शरण का मर्म है।

२. धम्म: नक्शा और रास्ता

धम्म कोई ‘पंथ’ या ‘संप्रदाय’ नहीं है, और न ही यह बुद्ध द्वारा बनाया गया कोई कानून है। धम्म तो प्रकृति का अटल नियम है। जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम न्यूटन के पैदा होने से पहले भी था, वैसे ही ‘अनित्य’ और ‘दुःख’ का सत्य बुद्ध के जन्म से पहले भी था। बुद्ध ने उस सत्य को केवल ‘उजागर’ किया।

धम्म की शरण लेने के तीन व्यावहारिक स्तर हैं:

  • परियत्ति (नक्शा): बुद्ध के वचनों को सुनना और बौद्धिक रूप से समझना।
  • पटिपत्ति (यात्रा): उस नक्शे पर खुद चलना। उन कुशल गुणों को धारण करना।
  • पटिवेधन (मंज़िल): चलते-चलते सत्य का साक्षात्कार कर लेना।

धम्म की शरण लेना संसार की ‘धारा के विरुद्ध’ तैरना है। दुनिया ‘भोग’ की ओर बहती है, धम्म ‘त्याग’ की ओर ले जाता है। यह शरण एक ‘औषधि’ की तरह है, जो किसी को कड़वी लगती है, तो किसी को मीठी। लेकिन जैसे बीमार व्यक्ति को केवल डॉक्टर (बुद्ध) पर भरोसा करने से लाभ नहीं होता, उसे दवा (धम्म) निगलनी ही पड़ती है। धम्म की शरण का अर्थ है—उस आर्य सच्चाई को पीने का साहस जुटाना जो हमें भीतर से चंगा कर दे।

३. संघ: साथ चलने वाले

संघ के बिना यह यात्रा लगभग असंभव है, क्योंकि अकेले चलने पर मार्ग भटकने का भय रहता है। संघ दो प्रकार के हैं:

  • आर्य संघ: वे विरले साधक जिन्होंने सत्य (निर्वाण) की झलक पा ली है—जैसे सोतापन्न या अरहंत। वे ही हमारे सच्चे आदर्श हैं क्योंकि वे बीमारी से मुक्त हो चुके हैं।
  • परंपरागत संघ: भिक्षु और भिक्षुणियों का वह समुदाय जो अभी रास्ते पर चल रहा है। वे हमारे ‘कल्याणमित्र’ हैं।

“क्या संघ की शरण अनिवार्य है?”

इतिहास गवाह है: जब तक संघ नहीं बना था, ‘तपस्सु और भल्लिक’ ने केवल दो रत्नों की शरण ली। 1 किन्तु जिस क्षण बुद्ध ने ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ कर तीसरे रत्न को जन्म दिया, ‘त्रिरत्न’ ही नियम बन गया। एक भी रत्न को नकारना, इमारत की एक नींव को हटाने जैसा है—पूरी संरचना ढह जाएगी।

आधुनिक काल में, विशेषकर डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायियों और विपश्यना साधकों के बीच, एक द्वंद्व दिखाई देता है। वे बुद्ध और धम्म को तो पूजते हैं, किन्तु भिक्षुसंघ के प्रति उदासीन हैं। कारण स्पष्ट है—उन्हें आज के भिक्षुओं में वह ‘आदर्श’ नहीं दिखता।

एक भिक्षु होने के नाते, मैं इस सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकता। यह हमारे भिक्षुसंघ की विफलता है कि हम समाज की श्रद्धा को डिगा रहे हैं। जब रक्षक ही शिथिल हो जाए, तो शरणार्थी का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।

किन्तु, यहाँ एक भूल हो रही है।

याद रहे, चीवर धारण करना ‘मंज़िल’ पर पहुँचना नहीं है; यह तो बस उस कठिन ‘रास्ते’ पर उतरने का संकल्प है। एक भिक्षु, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, उसी मार्ग का एक यात्री है। हो सकता है वह अभी-अभी चला हो, हो सकता है वह लड़खड़ा रहा हो। लेकिन उसके पास बुद्ध के उन नक्शों (उपदेशों) का बस्ता है, जो उसने अपने कंधों पर उठा रखा है।

यदि हम केवल ‘पूर्णतः सिद्ध’ (आर्य) व्यक्तियों की ही शरण लेंगे, तो शायद हम प्रतीक्षा ही करते रह जाएँगे। परंपरागत संघ वह सेतु है, जिसने २६०० वर्षों के तूफानों में भी धर्म की मशाल को बुझने नहीं दिया। यदि आज हमें बुद्ध का नाम भी पता है, तो वह इसलिए क्योंकि किसी ‘साधारण’ भिक्षु ने, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, उन शब्दों को रटकर, ताड़पत्रों पर लिखकर, हम तक पहुँचाया है।

संदेशवाहक को हीन मानकर उसे ठुकराना, उस संदेश का अपमान है जो वह लाया है। यह केवल अज्ञानता नहीं, कृतघ्नता है।

बुद्ध ने कहा था: “यो धम्मं पस्सति सो मं पस्सति” (जो धर्म को देखता है, वह मुझे देखता है)।

जिस दिन आपकी आँखें अहंकार से मुक्त होंगी, आपको उस साधारण से दिखने वाले भिक्षु के चीवर में भी २६०० साल पुरानी त्याग की परंपरा दिखाई देगी। आपको व्यक्ति नहीं, वह ‘ध्वज’ दिखाई देगा जो अरहंतों ने फहराया था। कहते हैं, जब बाबासाहेब ने संघ के इस गहरे, दोहरे स्वरूप को समझा, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के लाखों अनुयायियों के साथ ‘बुद्ध, धम्म और संघ’—तीनों की शरण ली।

निष्कर्ष

अगली बार जब आप संघ को देखें, तो व्यक्ति के दोष खोजने के बजाय उस पवित्र वंश-परंपरा को नमन करें। अमृत जिस प्याले में है, वह प्याला मिट्टी का हो या सोने का—महत्व अमृत का है।

ये तीनों रत्न एक-दूसरे में ऐसे गुथे हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। इन्हें थाम लें।

क्योंकि यही शरण सुरक्षित है। यही शरण सर्वोत्तम है।



  1. तपस्सु और भल्लिक इस बुद्ध शासन के पहले दो उपासक हैं, जो उक्कला (ओड़ीशा) राज्य के थे। चूंकि उस समय तक भगवान ने भिक्षुसंघ का निर्माण नहीं किया था, इसलिए उन्होंने केवल दो रत्नों की शरण ली। इस कहानी को ठीक से जानने के लिए हमारी मार्गदर्शिका में पढ़ें संघ कथा १। ↩︎