
भारतवर्ष का इतिहास केवल राजाओं के युद्धों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन की कहानी नहीं है। यह उन ऋषियों और श्रमणों की तपोभूमि रही है जिन्होंने सत्य की खोज में अपना सर्वस्व त्याग दिया। इसी पुण्यभूमि पर, आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व, गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों में एक ऐसा सूर्य उदित हुआ जिसने न केवल आर्यावर्त को बल्कि सम्पूर्ण जम्बुद्वीप (भारतीय उपमहाद्वीप) को प्रज्ञा के प्रकाश से भर दिया। वे थे भगवान बुद्ध।
हम भारतीय अक्सर रामायण या महाभारत की कथाओं से परिचित हैं, किन्तु हमारे इतिहास का एक बहुत बड़ा अध्याय—जो मगध और कोसल की गलियों में लिखा गया—हमसे कुछ दूर हो गया। सैकड़ों वर्षों तक भारत अपनी ही इस सबसे अमूल्य निधि से वंचित रहा। जिन वचनों को कभी मगध, कोसल और काशी के जन-जन ने अपनी भाषा में सुना था, वे ग्रन्थ बनकर सुदूर देशों में सुरक्षित रहे।
आज जब हम ‘तिपिटक’ की ओर देखते हैं, तो हम केवल एक प्राचीन ग्रन्थ को नहीं, बल्कि भारत की उस लुप्त होती ‘धम्म-घोष’ (धर्म की गूंज) को पुनः सुनने का प्रयास कर रहे हैं। यह साहित्य केवल ताड़पत्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उस ‘जागृत पुरुष’ की वाणी है जो मगध और कोसल की धूल में नंगे पांव चले। आज जब हम इन ग्रंथों की ओर लौटते हैं, तो हम केवल एक धर्मग्रंथ नहीं पढ़ रहे होते, बल्कि हम अपनी खोई हुई विरासत और अपनी जड़ों की ओर लौट रहे होते हैं।

बुद्ध के महापरिनिब्बान के तुरंत बाद, राजगृह (वर्तमान राजगीर) की सप्तपर्णी गुफा में ५०० अरहंत भिक्षुओं की एक महासभा बुलाई गई, जिसे ‘प्रथम संगीति’ कहा जाता है। इस ऐतिहासिक सभा में महाकास्सप की अध्यक्षता में, भिक्षु उपालि ने ‘विनय’ का पाठ किया और भिक्षु आनंद ने ‘धम्म’ (सुत्त) का पाठ किया। यही वह क्षण था जब बुद्ध-वचन को आधिकारिक रूप से संकलित किया गया।
आज के युग में हमारे लिए यह कल्पना करना कठिन है कि बिना कागज और कलम के, लाखों शब्दों का इतना विशाल साहित्य कैसे सुरक्षित रहा?
प्राचीन भारत में लेखन कला का प्रयोग व्यापार या शिलालेखों के लिए होता था, किन्तु पवित्र ज्ञान को ‘कण्ठस्थ’ रखने की परंपरा थी। इसे हम ‘भाणक’ परंपरा कहते हैं। यह केवल रटना नहीं था, बल्कि यह एक अत्यंत अनुशासित सामूहिक साधना थी।

इसके अंतर्गत भिक्षुओं के अलग-अलग समूह बनाए गए थे, जिन्हें विशिष्ट जिम्मेदारी दी गई थी:
ये भाणक अकेले में याद नहीं करते थे, बल्कि वे समूह में बैठकर एक स्वर में ‘सज्झाय’ (स्वाध्याय/पाठ) करते थे। इस सामूहिक पाठ की विधि ने यह सुनिश्चित किया कि यदि कोई एक व्यक्ति भूल भी जाए, तो बाकी संघ उसे सुधार दे। इसी ‘क्रॉस-चेकिंग’ की व्यवस्था के कारण, ढाई हजार वर्षों के बाद भी, पाली सुत्त हमें उसी शुद्धता के साथ प्राप्त हुए हैं जैसे वे प्रथम संगीति में उच्चारित किए गए थे।
पश्चिमी विद्वान अक्सर मौखिक परंपरा की सटीकता पर संदेह करते हैं, क्योंकि उन्होंने ‘स्मृति’ की ऐसी पराकाष्ठा कभी देखी नहीं थी। किन्तु उन्हें भारतीय ‘श्रुति’ परंपरा की शक्ति का अनुमान नहीं है। यह भाणक परंपरा ही थी जिसने युद्धों, अकालों और विस्थापन के बीच भी तथागत की वाणी की ज्योति को बुझने नहीं दिया, जब तक कि उसे श्रीलंका में ताड़पत्रों पर पहली बार लिखा नहीं गया।
लगभग चार शताब्दियों तक बुद्ध-वचन केवल मौखिक रूप से जीवित रहे। लेकिन ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी (लगभग २९ ई.पू.) में श्रीलंका के राजा वट्टगामिनी अभय के समय भीषण अकाल (बामणतिय अकाल) और युद्धों ने संघ को झकझोर दिया। महास्थविरों को यह भय सताने लगा कि विषम परिस्थितियों और भविष्य में मनुष्यों की स्मृति-शक्ति के ह्रास के कारण, कंठस्थ किया गया यह ज्ञान सदा के लिए विलुप्त हो सकता है।

इस अमूल्य निधि को बचाने के लिए, ५०० विद्वान भिक्षु श्रीलंका के आलुविहार गुफा में एकत्रित हुए। थेरवाद इतिहास में इसे ‘चतुर्थ संगीति’ कहा जाता है। यहाँ भिक्षुओं ने एक क्रांतिकारी निर्णय लेते हुए सम्पूर्ण त्रिपिटक और उसकी अट्ठकथाओं को ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध किया। यदि उस दिन आलुविहार की गुफाओं में यह निर्णय न लिया गया होता, तो आज हमारे पास ‘बुद्ध-वचन’ के नाम पर शायद केवल कहानियाँ ही शेष रह जातीं।
आज बौद्ध परंपरा में सम्पूर्ण बुद्ध-वचन को ‘तिपिटक’ (या त्रिपिटक) के नाम से जाना जाता है। पाली भाषा में ‘पिटक’ का अर्थ है—टोकरी या मंजूषा।
प्राचीन भारत में, जब निर्माण-कार्य होता था, तो सामग्री को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए टोकरियों की एक मानव-श्रृंखला बनाई जाती थी। ठीक उसी प्रकार, तथागत के वचनों को विस्मृत होने से बचाने के लिए, शिष्यों ने उन्हें स्मृति की टोकरियों में सहेजा और गुरु-शिष्य परंपरा की एक लंबी श्रृंखला द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया।
पारंपरिक रूप से तिपिटक को तीन भागों में विभाजित किया गया है:
किंतु, एक गंभीर अध्येता के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि ये तीनों पिटक एक ही समय में नहीं रचे गए। इनमें काल और प्रमाणिकता का गहरा भेद है। इन ग्रंथों की ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता के विस्तृत विश्लेषण के लिए, हमारा लेख ‘प्रारंभिक बुद्ध वचन’ पढ़ें।"
बुद्ध के समय और उनके परिनिब्बान के तुरंत बाद की शताब्दियों में केवल दो ही विभाग थे:
यह बुद्ध की शिक्षा का प्राण है। जब भगवान किसी वृक्ष के नीचे, किसी गाँव की चौपाल पर, या किसी राजा के दरबार में उपदेश देते थे, तो वे ‘सुत्त’ बन जाते थे। यह बुद्ध और उनके शिष्यों के बीच का सीधा संवाद है। इसमें जीवन जीने की कला, मन को समझने का विज्ञान और निर्वाण की साधना-पद्धति है। यदि आप जानना चाहते हैं कि बुद्ध ने वास्तव में क्या कहा था, तो सुत्त पिटक ही वह एकमात्र प्रामाणिक स्रोत है।
जहाँ सुत्त ‘सिद्धांत’ है, वहीं विनय ‘आचरण’ है। जैसे-जैसे भिक्षु संघ का विस्तार हुआ, सामाजिक व्यवस्था और सामंजस्य बनाए रखने के लिए नियमों की आवश्यकता पड़ी। विनय पिटक में भिक्षु और भिक्षुनियों के आचार-नियम, संघ की कार्यप्रणाली और उन ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण है जिनके कारण वे नियम प्रज्ञप्त (बनाए) किए गए।
तिपिटक का तीसरा भाग, अभिधम्म पिटक, बुद्ध के महापरिनिब्बान के कई शताब्दियों बाद की रचना है। यह बुद्ध-वचन नहीं, बल्कि यह बाद के विद्वान भिक्षुओं और आचार्यों द्वारा किया गया एक दार्शनिक विश्लेषण है।
सुत्त पिटक की भाषा सरल और संवादमयी है, जिसे एक आम गृहस्थ भी समझ सकता है। इसके विपरीत, अभिधम्म एक अत्यंत जटिल, तकनीकी और सूखी तालिकाओं और वर्गीकरणों का संग्रह है। विद्वानों का मत है कि यह सुत्तों में बिखरे हुए सिद्धांतों को व्यवस्थित करने का एक प्रयास था। इसलिए, यदि हम बुद्ध को उनके मौलिक रूप में समझना चाहते हैं, तो हमारी दृष्टि मुख्यतः सुत्त पिटक (और उसके पूरक के रूप में विनय पिटक) पर ही केंद्रित होनी चाहिए, अभिधम्म का अध्ययन आवश्यक नहीं।
यदि विनय-पिटक संघ का शरीर है, तो सुत्त-पिटक धर्म का हृदय है। ‘सुत्त’ शब्द का अर्थ है—सुत या धागा। जिस प्रकार एक कुशल माली बिखरे हुए फूलों को एक धागे में पिरोकर सुंदर माला बनाता है, ठीक उसी प्रकार तथागत के वचनों को सुत्तों की माला में पिरोया गया है।
वैदिक परंपरा में ‘सूत्र’ प्रायः बहुत संक्षिप्त और गूढ़ होते थे, जिन्हें समझने के लिए भाष्य की आवश्यकता होती थी। किन्तु बुद्ध के सुत्त ऐसे नहीं हैं। वे विस्तृत संवाद हैं, जिनमें करुणा, तर्क और स्पष्टता है। इन्हें पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो हम श्रावस्ती के जेतवन या राजगृह के वेणुवन में, भगवान के चरणों में बैठकर उन्हें साक्षात् सुन रहे हों।
प्राचीन आचार्यों ने इस विशाल साहित्य सागर को पाँच मुख्य भागों में व्यवस्थित किया है, जिन्हें ‘निकाय’ (संग्रह) कहा जाता है। उत्तर भारत की संस्कृत परंपरा में इन्हें ‘आगम’ के नाम से भी जाना जाता था।

यह निकाय प्रचार और दार्शनिक शास्त्रार्थ का केंद्र है। इसमें कुल ३४ सुत्त हैं, जिन्हें तीन वर्गों (वग्ग) में बांटा गया है।
| वर्ग | विवरण | प्रमुख सुत्त | EBT स्थिति |
|---|---|---|---|
| शील खन्ध वग्ग | इसमें शील (नैतिकता) और ब्राह्मणों व तपस्वियों के मतों का खंडन है। | अम्बट्ठ सुत्त (प्रसिद्ध ब्राह्मण का धर्म-परिवर्तन), सामञ्ञफल सुत्त (श्रमण जीवन के प्रत्यक्ष फल)। | ✅ पूर्णतः EBT ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अत्यंत प्राचीन। |
| महा वग्ग | इसमें ‘महा’ (बड़े) शीर्षक वाले सुत्त हैं, जो ऐतिहासिक और कथात्मक हैं। | महापरिनिब्बान सुत्त (बुद्ध के अंतिम दिन), महासतिपट्ठान सुत्त (स्मृति ध्यान की विधि)। | ✅ मुख्यतः EBT कुछ पौराणिक अंश बाद में जुड़े हो सकते हैं, पर मूल ढांचा प्राचीन है। |
| पाथिक वग्ग | इसमें विविध विषयों पर सुत्त हैं, जिनमें कुछ पौराणिक कथाएँ भी हैं। | सिङ्गाल सुत्त (गृहस्थ के कर्तव्य), आटानाटिय सुत्त (देवताओं के द्वारा दिया रक्षा मंत्र)। | ⚠️ मिश्रित इसमें कुछ सुत्त भाषा और शैली में थोड़े बाद के प्रतीत होते हैं (जैसे लक्खण सुत्त)। |
यह धम्म-साधना का सबसे प्रमाणिक स्रोत है। इसमें १५२ सुत्त हैं।
| विवरण | प्रमुख सुत्त | EBT स्थिति |
|---|---|---|
| यह निकाय विपस्सना, कर्म, शून्यता और ध्यान की विधियों का भंडार है। इसमें बुद्ध भिक्षुओं को प्रशिक्षण देते हुए दिखाई देते हैं। | सब्बासव सुत्त (आस्रवों का नाश), कायगतासति सुत्त (काया के स्मृति की ध्यान विधि), आनापानस्सति सुत्त (श्वास के ध्यान की मूल विधि)। | ✅ सर्वोच्च EBT विद्वान इसे बुद्ध की शिक्षाओं का सबसे विश्वसनीय और प्राचीन संग्रह मानते हैं। |
यहाँ सुत्तों को विषयवार सजाया गया है, जिन्हें सबसे प्राचीन माना जाता हैं। इसमें ५६ ‘संयुत्त’ हैं।
| प्रमुख संयुत्त | विषय | EBT स्थिति |
|---|---|---|
| सच्च संयुत्त | चार आर्य सत्य | ✅ EBT |
| निदान संयुत्त | प्रतीत्यसमुत्पाद (कार्य-कारण सिद्धांत) | ✅ EBT |
| खंड संयुत्त | पाँच स्कंध (रूप, वेदना आदि) | ✅ EBT |
| सगाथ वग्ग | देवताओं और यक्षों के साथ बुद्ध के पद्य-संवाद। | ✅ EBT (प्राचीन काव्य शैली) |
यहाँ सुत्तों को १ से ११ की संख्या के क्रम में रखा गया है।
| निपात (संख्या) | उदाहरण | EBT स्थिति |
|---|---|---|
| एकक से एकादसक | द्विक (२), तिक (३), चतुक्क (४) आदि। जैसे: ४ आर्य सत्य, ५ नीवरण, ८ अष्टांगिक मार्ग। |
✅ मुख्यतः EBT यद्यपि यह बाद में संकलित हुआ हो सकता है, किन्तु इसमें निहित सामग्री मूल सुत्तों से ही ली गई है। |
यह निकाय सबसे जटिल है। इसमें सबसे प्राचीन और सबसे नवीन दोनों प्रकार के ग्रंथ शामिल हैं। EBT के दृष्टिकोण से इसका वर्गीकरण अत्यंत आवश्यक है।
ये ग्रंथ बुद्ध के समय के या अत्यंत प्राचीन माने जाते हैं।
| ग्रंथ का नाम | परिचय | महत्व |
|---|---|---|
| सुत्तनिपात | यह संभवतः तिपिटक का सबसे पुराना हिस्सा है। विशेषकर इसके अट्ठकवग्ग और पारायनवग्ग बुद्ध की मूल भाषा के सबसे करीब हैं। | मुनि जीवन और शून्यता का गंभीर उपदेश। |
| धम्मपद | ४२३ गाथाओं (दोहों) का संग्रह। | बौद्ध नैतिकता का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ। |
| उदान | बुद्ध के मुख से अनायास निकले भावपूर्ण उद्गार (गाथा) और उनकी कथा। | “अस्ति भिक्खवे…” जैसे निर्वाण के प्रसिद्ध वर्णन यहीं हैं। |
| इतिवुत्तक | “वुत्तं हेतं भगवता” (ऐसा भगवान ने कहा है)—इस शैली में लिखे गए छोटे सूत्र। | बुद्ध-वचन का प्रत्यक्ष संग्रह। |
| थेरगाथा | २६४ भिक्षुओं (अरहंतों) की कविताएँ। | मोक्ष का व्यक्तिगत अनुभव। |
| थेरीगाथा | ७३ भिक्षुनियों (अरहंतों) की कविताएँ। | महिलाओं की आध्यात्मिक मुक्ति का बेजोड़ दस्तावेज। |
ये ग्रंथ बुद्ध के महापरिनिब्बान के शताब्दियों बाद रचे गए। इनमें ऐतिहासिक बुद्ध के बजाय ‘भक्ति’ और ‘पौराणिकता’ अधिक है। EBT अध्ययन में इन्हें मूल बुद्ध-वचन नहीं माना जाता।
| ग्रंथ का नाम | परिचय | क्यों यह बाद का है? |
|---|---|---|
| जातक | बोधिसत्त्व के पूर्व जन्मों की ५४७ कथाएँ। | गाथाएँ पुरानी, कहानियाँ बाद में जुड़ीं। |
| विमानवत्थु | देवताओं के विमानों (महलों) की कहानियाँ। | कर्म-फल समझाने के लिए बाद में रची गई। |
| पेतवत्थु | प्रेतों (भूतों) की कहानियाँ। | पुण्य-दान का महत्व बताने के लिए। |
| अपदान | अरहंतों के पिछले जन्मों की वीरगाथाएँ। | इसमें दान के अतिमहत्व के अलावा बुद्ध-पूजा और भक्ति का प्रभाव अधिक है। |
| बुद्धवंस | २४ पिछले बुद्धों का जीवन चरित्र। | ‘अनेक बुद्धों’ की अवधारणा बहुत बाद में विकसित हुई। |
| चरियापिटक | पारमिताओं का वर्णन। | यह बोधिसत्त्व आदर्श को स्थापित करने के लिए लिखा गया। |
| पटिसम्भिदामग्ग | सुत्तों का विश्लेषणात्मक अध्ययन। | इसकी शैली ‘अभिधम्म’ जैसी है, सुत्त जैसी नहीं। |
| निद्देस | सुत्त निपात की व्याख्या। | यह मूलतः एक टीका है जिसे पिटक में शामिल कर लिया गया। |

यदि आप मूल बुद्ध को खोजना चाहते हैं, भगवान की मूल वाणी सुनना चाहते हैं, तो आपका ध्यान चार प्रमुख निकायों (दीघ, मज्झिम, संयुत्त, अंगुत्तर) और खुद्दक निकाय के प्रारंभिक ग्रंथों (सुत्तनिपात, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, थेर-थेरीगाथा) पर केंद्रित होना चाहिए। शेष ग्रंथ श्रद्धा और थेरवाद संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, किन्तु ऐतिहासिक तथागत से उनका सीधा संबंध जोड़ना कठिन है।
सुत्त पिटक की इस यात्रा का अंत केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं है। यदि हम इन प्राचीन शब्दों को केवल ‘इतिहास’ या ‘साहित्य’ मानकर पढ़ते हैं, तो हम इसके वास्तविक रस से वंचित रह जाएंगे।
यह सुत्त पिटक भारत की उस खोई हुई वसीयत की तरह है जो सदियों से बंद पड़ी थी। आज जब हम इसे खोलते हैं, तो हमें इसमें किसी पौराणिक देवता की नहीं, बल्कि एक ऐसे महामानव की आवाज सुनाई देती है जो हमारे ही बीच जिए। एक ऐसा मनुष्य जिसने भय, दुख और मृत्यु की आँखों में आँखें डालकर देखा और उनसे मुक्ति का मार्ग खोजा।
एक भारतीय होने के नाते, यह क्षण हमारे लिए ‘घर वापसी’ जैसा है। जिस हवा में तथागत की करुणा बही, जिस मिट्टी पर सारिपुत्त और मोग्गल्लान चले, हम उसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं। इन सुत्तों का अनुवाद और अध्ययन केवल एक अकादमिक कार्य नहीं, बल्कि उस ‘धम्मचक्र’ को फिर से गति देने का प्रयास है, जिसने नालंदा को विश्व-गुरु बनाया।
तथागत का स्पष्ट निर्देश था—धम्म केवल पढ़ने या रटने के लिए नहीं, बल्कि धारण करने के लिए है।
इसलिए, जब आप इस वेबसाइट पर प्रारंभिक सूत्र पढ़ें, तो उन्हें एक आलोचक की तरह ही नहीं, बल्कि एक ‘श्रावक’ (सुनने वाले शिष्य) की तरह पढ़ें। कल्पना करें कि आप जेतवन में बैठे हैं और भगवान आपसे ही बात कर रहे हैं। शब्दों (परियत्ति) से शुरू करें, लेकिन लक्ष्य धारण करने (पटिपत्ति) पर होना चाहिए, ताकि अंततः आप से भी गहरे सत्य को भेद लिया जाए (पटिवेधन) । सुत्त एक नक्शा है; यात्रा आपको स्वयं करनी है।
आइए, २५०० वर्षों के अंतराल को मिटाएं और उस अमृत-वाणी को फिर से सुनें:
“अप्पमादेन सम्पादेथ!” — दीघनिकाय १६ : महापरिनिब्बान सुत्त
अर्थात,
