आज हम जिसे 'बुद्ध वचन' के रूप में सुनते, पढ़ते और पूजते हैं—क्या वह सचमुच बुद्ध की अपनी वाणी है? या फिर यह सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में लिपटी हुई कोई और गूंज है?
प्रारंभिक सूत्रों की कसौटी पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पारमि की यह पूरी अवधारणा बुद्ध के मूल वचनों से एक ऐतिहासिक भटकाव है। आइए, इसकी विकास-यात्रा और इसके प्रभावों की पड़ताल करें।