यहाँ हम जिस ध्यान विधि की बात कर रहे हैं, उसकी जड़ें दो स्रोतों से जुड़ी हैं। पहला स्रोत तो खुद भगवान बुद्ध के निर्देश हैं कि चित्त को साधने के लिए श्वास का उपयोग कैसे किया जाए। ये निर्देश पाली त्रिपिटक में मिलते हैं, जो बुद्ध की शिक्षाओं का सबसे पुराना और सबसे भरोसेमंद खजाना है।
जैसा कि धर्मग्रंथ बताते हैं, बुद्ध ने पाया कि श्वास एक ऐसा विषय है जो शरीर और चित्त, दोनों को आराम देता है। साथ ही, यह स्मृति 1, समाधि और प्रज्ञा जगाने के लिए भी एक आदर्श जरिया है। सच तो यह है कि अपनी संबोधि की यात्रा में उन्होंने खुद इसी सहारे का इस्तेमाल किया था।2 यही वजह है कि उन्होंने किसी भी और तरीके के मुकाबले, श्वास-ध्यान ही सबसे ज्यादा लोगों को और सबसे ज्यादा विस्तार से सिखाया।
दूसरा स्रोत पिछली सदी में विकसित श्वास-ध्यान की एक विधि है, जिसे थाईलैंड की ‘वन परंपरा’ के महान आचार्य, अजान ली धम्मधरो 3 ने संजोया था। अजान ली का तरीका पूरी तरह बुद्ध के निर्देशों पर ही आधारित है, लेकिन उन्होंने उन कई बातों को खोलकर समझाया है जिन्हें बुद्ध ने सूत्रों में बस इशारों में कह दिया था।
मैंने अजान ली के शिष्य, अजान फुआंग जोतिको 4 की देखरेख में दस साल तक इस तकनीक को सीखा और साधा है। इसलिए, यहाँ जो भी बारीक समझ या अंतर्दृष्टि आपको मिलेगी, वह मुझे अजान फुआंग के साथ रहने से ही मिली है।
इन दोनों स्रोतों के आधार पर मैंने श्वास को ही ध्यान का मुख्य विषय बनाया है, क्योंकि ध्यान के जितने भी विषय हो सकते हैं, उनमें यह सबसे सुरक्षित है। यहाँ बताई गई तकनीक शरीर और चित्त को एक संतुलित और स्वस्थ हाल में ले आती है। इस संतुलन की वजह से चित्त अपनी खुद की चालों को साफ-साफ देख पाता है—वह देख पाता है कि वह कैसे खुद ही तनाव और दुख पैदा कर रहा है, और फिर वह उन्हें मजे से छोड़ पाता है।
यह तकनीक चित्त को प्रशिक्षित करने वाले एक बड़े रास्ते का हिस्सा है। इस रास्ते में सिर्फ ध्यान ही नहीं, बल्कि दान और शील का विकास भी शामिल है। इस पूरे प्रशिक्षण की बुनियाद एक ही नजरिए पर टिकी है: अपने हर काम को ‘कारण और परिणाम’ (कर्म) की कड़ी के रूप में देखना, ताकि आप कारणों को एक बेहतर और सकारात्मक दिशा में मोड़ सकें।
चाहे आप मन से कुछ सोचें, वचन से कुछ बोलें या शरीर से कुछ करें—हर काम के साथ आप यह चिंतन करते हैं कि आप आखिर कर क्या रहे हैं। आप अपने काम के पीछे छिपी नीयत को देखते हैं और यह भी देखते हैं कि उस काम का अंजाम क्या होगा। जैसे-जैसे आप यह चिंतन करते हैं, आप अपने कर्मों से कुछ खास सवाल पूछना सीख जाते हैं:
शील और दान का अभ्यास आपके बाहरी चाल-चलन से यही सवाल पूछता है। और ध्यान? ध्यान का अभ्यास आपके चित्त के भीतर होने वाली हर हलचल को—चाहे वे विचार हों या भावनाएं—‘कर्म’ के रूप में देखता है और उनसे भी यही सवाल पूछता है।
दूसरे शब्दों में, यह आपको मजबूर करता है कि आप अपने विचारों और भावनाओं को सिर्फ ‘कहानियों’ के रूप में न देखें, बल्कि ‘घटनाओं’ के रूप में देखें—कि वे कहाँ से आ रही हैं और आपको कहाँ ले जाएंगी।
अपने कर्मों को देखने और उन पर ये सवाल उठाने की यह रणनीति सीधे उस समस्या पर वार करती है जिसे हम सुलझाना चाहते हैं: यानी आपके अपने कर्मों से पैदा होने वाला तनाव और दुख। इसीलिए यह पूरे प्रशिक्षण की नींव है।
ध्यान आपको अपने कर्मों को बहुत बारीकी से देखने का मौका देता है, ताकि आप उन कर्मों से पैदा होने वाले तनाव की महीन से महीन परतों को भी पकड़ सकें और उन्हें छोड़ सकें। साथ ही, यह उन मानसिक गुणों को भी जगाता है जो कुशलता से काम करने की आपकी ताकत को बढ़ाते हैं।
हालाँकि यहाँ बताई गई ध्यान विधि बौद्ध साधना का हिस्सा है, लेकिन इसे अपनाने के लिए आपका बौद्ध होना जरूरी नहीं है। यह उन समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकती है जो सिर्फ बौद्धों तक सीमित नहीं हैं।
आखिरकार, ऐसा तो है नहीं कि सिर्फ बौद्ध लोग ही खुद को तनाव और दुख देते हैं। और ध्यान से जो मानसिक गुण निखरते हैं, उन पर किसी एक धर्म का कॉपीराइट नहीं है। स्मृति, सचेतता, समाधि और प्रज्ञा—ये गुण हर उस इंसान का भला करते हैं जो इन्हें अपने भीतर जगाता है। बस जरूरत इतनी है कि आप इन गुणों को आजमाने की एक ईमानदार कोशिश करें।
इस पुस्तक का मकसद ध्यान के अभ्यास को—और उस बड़े प्रशिक्षण को जिसका यह एक हिस्सा है—इस तरह पेश करना है जिसे पढ़ना आसान हो और जिसे जिंदगी में उतारना सरल हो। यह पुस्तक पाँच भागों में बटी है। हर भाग के बाद कुछ और साधनों की सूची दी गई है—जैसे किताबें, लेख और ऑडियो—जो आपको उन विषयों की गहराई में जाने में मदद करेंगी।
बुद्ध ने स्मृति स्थापित करने की विस्तृत विधि को इस 👉 महासतिपट्ठान सुत्त में उजागर किया है। ↩︎
बुद्ध के संबोधि पाने की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि जानने के लिए यह लेख पढ़ें 👉 संबोधि ↩︎
अजान ली धम्मधरो थाई वन-परंपरा के अत्यंत प्रसिद्ध और प्रभावशाली आचार्य माने जाते हैं, जिन्हें उनकी गहन साधना, कठोर तप और महाऋद्धियों के लिए जाना जाता है। वे न केवल एक सिद्ध साधक थे, बल्कि बुद्ध के उपदेशों को व्यावहारिक रूप में समझाने वाले उत्कृष्ट ध्यान-आचार्य भी थे।
अजान ली ने आनापानसति और कायगतासति जैसी साधनाओं को अत्यंत स्पष्ट, प्रयोगात्मक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी शिक्षाओं की विशेषता यह थी कि वे केवल सिद्धांत तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि साधक को यह बताती थीं कि शरीर, श्वास और चित्त के साथ वास्तविक साधना कैसे की जाए। इसी कारण उनकी पद्धति ने आगे चलकर अनेक महान आचार्यों और साधकों को गहराई से प्रभावित किया।
थाई वन-परंपरा के पुनर्जागरण में अजान ली धम्मधरो की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। उनकी शिक्षाएँ आज भी यह स्मरण कराती हैं कि धम्म कोई रहस्यमय विचार नहीं, बल्कि अनुशासन, सजगता और प्रत्यक्ष अनुभव से साकार होने वाला मार्ग है। उनकी आत्मजीवनी पढ़ें 👉 अजान ली की आत्मकथा ↩︎
अजान फुआंग जोतिको थाई वन-परंपरा के एक अत्यंत विनम्र, मौनप्रिय और गहन साधक आचार्य थे। वे अजान ली धम्मधरो के प्रमुख शिष्यों में से एक रहे और अपनी सादगी, कठोर शील तथा सूक्ष्म ध्यान-निर्देशों के लिए जाने जाते हैं। अजान फुआंग की शिक्षाएँ दिखावे या चमत्कार पर नहीं, बल्कि मन की बारीक गतिविधियों को सीधे देखने, श्वास के साथ टिके रहने और अहंकार को शांत रूप से समझने पर केंद्रित थीं। उनका प्रभाव भले ही बाहरी रूप से शांत और सीमित दिखाई दे, लेकिन जिन साधकों ने उनके सान्निध्य में अभ्यास किया, उनके लिए वे एक गहरे और भरोसेमंद मार्गदर्शक सिद्ध हुए। ↩︎