नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा-सम्बुद्धस्स

आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

बुद्ध के समय का जम्बूद्वीप (भारत) केवल ऋषियों की भूमि नहीं थी, बल्कि एक बौद्धिक युद्धक्षेत्र था। गणित और खगोलशास्त्र की नई खोजों ने लोगों की नींद उड़ा दी थी। वैज्ञानिकों ने तारों को देखकर निष्कर्ष निकाला था कि ‘समय’ एक सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक चक्र है।

यह खबर भयावह थी। इसका अर्थ था कि हम एक ऐसे ‘कालचक्र’ और ‘महाकल्पों’ में फँसे हैं जहाँ बार-बार जन्म लेना होगा, बार-बार मरना होगा। इस अंतहीन चक्र ने लोगों के मन में एक गहरा प्रश्न खड़ा कर दिया: “क्या इस दुष्चक्र से निकलने का कोई रास्ता है?”

इसी प्रश्न ने उस दौर के विचारकों को दो विरोधी खेमों में बाँट दिया:

दो विरोधी विचारधाराएँ

उस समय मुक्ति का दावा करने वाले दो प्रमुख वर्ग थे:

  • ब्राह्मण (परंपरावादी): इनका मानना था कि वेदों में लिखे यज्ञ, पशु-बलि और महंगे कर्मकाण्ड ही मुक्ति का मार्ग हैं। उनके लिए ‘कर्म’ का मतलब था—सही मंत्र बोलना और सही विधि से हवन करना। यह केवल एक बाहरी शारीरिक क्रिया थी।
  • श्रमण (विद्रोही अन्वेषक): ये वेदों को चुनौती देते थे और जंगलों में रहकर सत्य खोजते थे।

लेकिन इन श्रमणों के बीच भी भारी मतभेद थे:

  • आजीवक (कठोर नियतिवादी): इनका मानना था कि “सब कुछ पहले से तय है।” उन्होंने अपनी बात को ‘सूत के गोले’ की प्रसिद्ध उपमा से समझाया। उनका कहना था— “जैसे सूत के गोले को फेंका जाए तो वह उतना ही खुलता है जितना उसमें धागा है, वैसे ही इंसान का जीवन और सुख-दुःख पहले से तय है। कोशिश करना बेकार है।”
  • लोकायत (भौतिकवादी): इनका नारा था—“खाओ, पियो, मौज करो।” न कोई आत्मा है, न पुनर्जन्म। सब कुछ आकस्मिक है।
  • जैन (तपस्वी): ये मानते थे कि कर्म एक ‘धूल’ की तरह आत्मा पर चिपका है। इसे जलाने के लिए शरीर को घोर कष्ट देना (तपस्या) जरूरी है।

बोधिसत्व का निरीक्षण

सिद्धार्थ (बोधिसत्व) ने इन सभी रास्तों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि एक बहुत बड़ी चूक हो रही है—ब्राह्मण कर्मकांड में उलझे हैं, और जैन शरीर को तपाने में। दोनों ही ‘कर्म’ को केवल शारीरिक क्रिया मान रहे हैं। लेकिन असली खेल तो ‘मन’ में चल रहा है!

उन्होंने देखा कि अगर नियतिवाद (सब तय है) सही होता, या अक्रियावाद (सब अकस्मात है) सही होता, तो खुद को सुधारने का कोई मतलब ही नहीं बचता। लेकिन सच्चाई यह थी कि ‘मानसिक कौशल’ विकसित किया जा सकता है।

मानसिक प्रयोगशाला

बोधिसत्व ने बाहर की दुनिया छोड़कर, अपने भीतर चल रहे विचारों को देखना शुरू किया। उन्होंने पाया कि मन को साधना एक हुनर है, ठीक वैसे ही जैसे कोई धनुर्विद्या या संगीत सीखता है।

उन्होंने खोज निकाला कि किसी भी कौशल में महारत हासिल करने के लिए तीन घटकों का होना अत्यावश्यक है:

  • मौजूदा परिस्थिति क्या है? (सचेत रहना)
  • नया प्रयास क्या किया जा रहा है? (ऊर्जा लगाना)
  • परिणाम पर प्रतिक्रिया क्या है? (स्मरण रखना)

बौद्ध साधना में इसी तिकड़ी को ‘आतापी सम्पजानो सतिमा’ कहा गया। सरल हिंदी में इसे ‘तत्पर, सचेत और स्मृतिमान’ होना कहते हैं। बोधिसत्व ने इसी फार्मूले का उपयोग कर अपने मन को लेज़र बीम की तरह तीक्ष्ण कर लिया।

उन्होंने देखा कि जब मन में राग, द्वेष या भ्रम होता है, तो वह दुःख पैदा करता है। और जब मन में विराग और मैत्री होती है, तो वह सुख देता है। यानी हम किसी ‘भाग्य’ या ‘ईश्वर’ के गुलाम नहीं, बल्कि अपने ही मन के मालिक हैं।

तीन विद्याओं का प्रकाश

वैशाख पूर्णिमा की रात, जब वे ध्यान की चरम सीमा (चतुर्थ ध्यान) पर पहुँचे, तो उस अविचल और परिशुद्ध मन से उन्होंने ब्रह्मांड के तीन सबसे बड़े रहस्यों को भेदा:

  • प्रथम पहर (स्मृति): उन्होंने अपने लाखों पिछले जन्म देखे। यह साबित हो गया कि ‘सूत का गोला’ वाली बात गलत थी—जीवन पहले से तय नहीं था, बल्कि हमारे कर्मों से बदल रहा था।
  • द्वितीय पहर (ब्रह्मांडीय नियम): उन्होंने दिव्य चक्षु से देखा कि कैसे हर प्राणी अपने ही कर्मों के कारण सुखी या दुखी हो रहा है। कोई और हमें सजा नहीं दे रहा, हम खुद अपने कर्मों के शिल्पकार हैं।
  • तृतीय पहर (मुक्ति का द्वार): अंत में, उन्होंने वह रास्ता खोज निकाला जिससे इस चक्र को तोड़ा जा सकता है। उन्होंने देखा कि सारी मुसीबत की जड़ ‘तृष्णा’ और ‘अविद्या’ है। उन्होंने इस कारण-कार्य की शृंखला को वहीं तोड़ दिया।

जैसे ही अविद्या नष्ट हुई, आस्रव सूख गए। जन्म-मरण का चक्र टूट गया। एक अभूतपूर्व शांति छा गई। जो काम सदियों से कोई दार्शनिक नहीं कर पाया था, वह एक मानव मन ने अपनी ‘कुशलता’ से कर दिखाया था।

सिद्धार्थ अब सिद्धार्थ नहीं रहे थे। वे जाग चुके थे। वे बुद्ध थे।


निष्कर्ष

बुद्ध की यह खोज हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है: मुक्ति किसी कर्मकांड, किसी ताबीज, या किसी ग्रह-नक्षत्र के बदलने से नहीं मिलेगी। वह केवल और केवल ‘मन के प्रशिक्षण’ और सही ‘दृष्टि’ से मिलेगी।

बुद्ध ने हमें वह नक्शा दिया है; चलना हमें ही होगा।

नमो बुद्धानं नमो बोधिया!
नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया!