
बुद्ध के समय का जम्बूद्वीप (भारत) केवल ऋषियों की भूमि नहीं थी, बल्कि एक बौद्धिक युद्धक्षेत्र था। गणित और खगोलशास्त्र की नई खोजों ने लोगों की नींद उड़ा दी थी। वैज्ञानिकों ने तारों को देखकर निष्कर्ष निकाला था कि ‘समय’ एक सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक चक्र है।
यह खबर भयावह थी। इसका अर्थ था कि हम एक ऐसे ‘कालचक्र’ और ‘महाकल्पों’ में फँसे हैं जहाँ बार-बार जन्म लेना होगा, बार-बार मरना होगा। इस अंतहीन चक्र ने लोगों के मन में एक गहरा प्रश्न खड़ा कर दिया: “क्या इस दुष्चक्र से निकलने का कोई रास्ता है?”
इसी प्रश्न ने उस दौर के विचारकों को दो विरोधी खेमों में बाँट दिया:
उस समय मुक्ति का दावा करने वाले दो प्रमुख वर्ग थे:
लेकिन इन श्रमणों के बीच भी भारी मतभेद थे:

सिद्धार्थ (बोधिसत्व) ने इन सभी रास्तों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि एक बहुत बड़ी चूक हो रही है—ब्राह्मण कर्मकांड में उलझे हैं, और जैन शरीर को तपाने में। दोनों ही ‘कर्म’ को केवल शारीरिक क्रिया मान रहे हैं। लेकिन असली खेल तो ‘मन’ में चल रहा है!
उन्होंने देखा कि अगर नियतिवाद (सब तय है) सही होता, या अक्रियावाद (सब अकस्मात है) सही होता, तो खुद को सुधारने का कोई मतलब ही नहीं बचता। लेकिन सच्चाई यह थी कि ‘मानसिक कौशल’ विकसित किया जा सकता है।
बोधिसत्व ने बाहर की दुनिया छोड़कर, अपने भीतर चल रहे विचारों को देखना शुरू किया। उन्होंने पाया कि मन को साधना एक हुनर है, ठीक वैसे ही जैसे कोई धनुर्विद्या या संगीत सीखता है।
उन्होंने खोज निकाला कि किसी भी कौशल में महारत हासिल करने के लिए तीन घटकों का होना अत्यावश्यक है:
बौद्ध साधना में इसी तिकड़ी को ‘आतापी सम्पजानो सतिमा’ कहा गया। सरल हिंदी में इसे ‘तत्पर, सचेत और स्मृतिमान’ होना कहते हैं। बोधिसत्व ने इसी फार्मूले का उपयोग कर अपने मन को लेज़र बीम की तरह तीक्ष्ण कर लिया।
उन्होंने देखा कि जब मन में राग, द्वेष या भ्रम होता है, तो वह दुःख पैदा करता है। और जब मन में विराग और मैत्री होती है, तो वह सुख देता है। यानी हम किसी ‘भाग्य’ या ‘ईश्वर’ के गुलाम नहीं, बल्कि अपने ही मन के मालिक हैं।
वैशाख पूर्णिमा की रात, जब वे ध्यान की चरम सीमा (चतुर्थ ध्यान) पर पहुँचे, तो उस अविचल और परिशुद्ध मन से उन्होंने ब्रह्मांड के तीन सबसे बड़े रहस्यों को भेदा:
जैसे ही अविद्या नष्ट हुई, आस्रव सूख गए। जन्म-मरण का चक्र टूट गया। एक अभूतपूर्व शांति छा गई। जो काम सदियों से कोई दार्शनिक नहीं कर पाया था, वह एक मानव मन ने अपनी ‘कुशलता’ से कर दिखाया था।
सिद्धार्थ अब सिद्धार्थ नहीं रहे थे। वे जाग चुके थे। वे बुद्ध थे।
बुद्ध की यह खोज हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है: मुक्ति किसी कर्मकांड, किसी ताबीज, या किसी ग्रह-नक्षत्र के बदलने से नहीं मिलेगी। वह केवल और केवल ‘मन के प्रशिक्षण’ और सही ‘दृष्टि’ से मिलेगी।
बुद्ध ने हमें वह नक्शा दिया है; चलना हमें ही होगा।