✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— साधना कैसे करें —
आनापान स्मृति | दुक्खा पटिपदा

ध्यान

साधना कैसे करें?

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ३ मिनट

भगवान ने साधकों के लिए कुल चार “पटिपदा”—या साधना मार्ग—बताए, जिन्हें मूलतः दो मुख्य मार्ग में संक्षेपित किया जा सकता है। किस शिष्य को कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए, यह उसकी व्यक्तिगत प्रवृत्तियों पर निर्भर करता है।

उदाहरण के लिए, कुछ साधक शांत प्रकृति के होते हैं — जिनमें क्रोध, आवेग या भ्रम जैसी प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक रूप से नियंत्रण में होती हैं।

ऐसे अनेक साधक सीधे श्वास पर ध्यान केंद्रित कर सहज रूप से समाधि प्राप्त कर लेते हैं। समाधि की स्थिति में पहुँचने के बाद, उनके भीतर के विकार क्रमशः क्षीण होने लगते हैं, और वे सहज रूप से मुक्ति-पथ पर अग्रसर हो जाते हैं।

ऐसे साधकों के बारे में भगवान कहते हैं —

कोई व्यक्ति सामान्यतः तीव्र रागपूर्ण… द्वेषपूर्ण… या मोहपूर्ण स्वभाव का नहीं होता, और न ही वह निरंतर राग/द्वेष/मोह से उत्पन्न दर्द-परेशानी को महसूस करता है।

तब उसे चाहिए कि वह —

  • कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर रहें।
  • आगे वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहें।
  • आगे प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करना। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर रहें।
  • और आगे, सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर रहें।

— अंगुत्तरनिकाय ४:१६२ : पटिपदावग्ग : वित्थार सुत्त

ऐसे साधक ये दो साधनाएँ परिपूर्ण करें:
कायागत स्मृति
आनापान स्मृति

दूसरी ओर, कुछ साधक स्वभाव से उग्र होते हैं—जिनमें क्रोध, आवेग, या भ्रम जैसी प्रवृत्तियाँ तीव्र होती हैं। उनका चित्त अस्थिर होता है और वे अपने विकारों पर सहज नियंत्रण नहीं रख पाते।

ऐसे साधकों के लिए सीधे श्वास पर ध्यान लगाकर समाधि प्राप्त कर पाना कठिन होता है। ऐसे में, उनके लिए उपयुक्त मार्ग है—“दुक्खा पटिपदा”, यानी कठिन साधना पथ, जो उन्हें मोक्ष की ओर ले जा सकता है।

ऐसे साधकों के विषय में भगवान कहते हैं —

कोई व्यक्ति सामान्यतः तीव्र रागपूर्ण… द्वेषपूर्ण… या मोहपूर्ण स्वभाव का होता है, और वह निरंतर राग/द्वेष/मोह से उत्पन्न दर्द-परेशानी को महसूस करता है।

तब उसे चाहिए कि वह—

  • (“असुभानुपस्सी काये विहरति”) काया का अनाकर्षक-पहलु देखते हुए विहार करें।
  • (“आहारे पटिकूलसञ्ञी”) आहार के प्रति प्रतिकूल नजरिया रखें
  • (“सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञी”) सभी लोक के प्रति निरस नजरिया रखें
  • (“सब्बसङखारेसु अनिच्चानुपस्सी”) सभी रचनाओं का अनित्य-पहलू देखते हुए विहार करें
  • (“मरणसञ्ञा”) मौत के नजरिए में भलीभांति प्रतिष्ठित हों।

— अंगुत्तरनिकाय ४:१६२ : पटिपदावग्ग : वित्थार सुत्त

ऐसे साधक ये सूचीबद्ध साधनाएँ परिपूर्ण करें:
कष्टदायी साधना