शुद्ध स्वर्ण विलुप्त नहीं होता, जब तक उसका जाली प्रतिरूप (=नकली स्वर्ण चलन में) न आ जाए। उसी तरह, शुद्ध धर्म भी विलुप्त नहीं होता, जब तक उसका जाली प्रतिरूप न आए।
—भगवान बुद्ध (संयुत्तनिकाय १६:१३ : सद्धम्मपतिरूपक सुत्त)

इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
आज हम जिसे ‘बुद्ध वचन’ के रूप में सुनते, पढ़ते और पूजते हैं—क्या वह सचमुच बुद्ध की अपनी वाणी है? या फिर यह सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में लिपटी हुई कोई और गूंज है?
यह प्रश्न किसी अकादमिक बहस या विद्वता के प्रदर्शन के लिए नहीं है; यह एक साधक की विनम्र, किन्तु अनिवार्य जिज्ञासा है। आज जब हमारे सामने बौद्ध धम्म की अनगिनत धाराएँ, संप्रदाय और व्याख्याएँ मौजूद हैं, तब यह जानना आवश्यक हो जाता है कि धम्म का वह मूल स्वरूप क्या था जो २६०० वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया था। क्या वह मूल आज भी कहीं सुरक्षित है, या समय की धूल ने उसे पूरी तरह ढंक दिया है?
यह जिज्ञासा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है—
क्या हम इतनी परिपक्वता पा चुके हैं कि कुछ असहज ऐतिहासिक तथ्य हमारी श्रद्धा को तोड़ें नहीं, बल्कि उसे और अधिक विवेकपूर्ण तथा स्थिर बनाएँ?
यह प्रश्न असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन अनिवार्य है। क्योंकि यदि बुद्ध का धम्म वास्तव में आजमाने योग्य (“एहिपस्सिको”) का निमंत्रण है, तो फिर जाँच-परख से डरने का कारण क्या है?
इस निबंध का उद्देश्य किसी परंपरा को नकारना या किसी की आस्था को चोट पहुँचाना नहीं है। यह प्रयास है उस ‘आर्य-नाद’ को फिर से सुनने का, जो कभी सारनाथ, श्रावस्ती और राजगृह के वनों में गूंजा था। वह गूंज, जो सदियों तक प्रवाहित रही, लेकिन धीरे-धीरे संसार के शोर और कर्मकांडों के कोलाहल में कहीं विलीन हो गई।
हमें यह पूछना ही होगा—क्या हम त्रिपिटक या अन्य बौद्ध ग्रंथों को आँख मूँद कर “बुद्ध वचन” मान लें? क्या यह संभव है कि इन ग्रंथों में कुछ भाग बुद्ध की वाणी के अत्यंत निकट हों, और कुछ भाग बाद की मिलावट? और यदि ऐसा है, तो उस सच्चे ‘सद्धम्म’ तक पहुँचने के लिए हमें कौन से द्वार खटखटाने होंगे?
समय के साथ, बुद्ध की मूल शिक्षाएँ विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों से गुज़रीं। हमारा कर्तव्य है कि हम उन परतों को हटाकर मूल तत्वों को पहचानें।
—गैरी टुल्लॉक
(प्रारंभिक बौद्ध सूत्रों के अध्ययन में विद्वान)
आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि भगवान बुद्ध ‘पालि’ भाषा बोलते थे और आज उपलब्ध ‘थेरवाद त्रिपिटक’ ही उनकी मूल वाणी का हूबहू रिकॉर्ड है। लेकिन इतिहास इतना सीधा नहीं है। सत्य तक पहुँचने के लिए हमें इतिहास की उन गलियों से गुजरना होगा जहाँ यह भाषा बनी और ग्रंथों का स्वरूप तय हुआ।

सबसे पहला झटका शायद यह जानकर लगे कि गौतम बुद्ध ने वह भाषा नहीं बोली थी जिसे आज हम ‘पालि’ कहते हैं।
बुद्ध के समय उत्तर भारत में संस्कृत विद्वानों और ब्राह्मणों की भाषा थी, लेकिन आम जनता ‘प्राकृत’ (स्थानीय बोलियाँ) बोलती थी। बुद्ध का उद्देश्य अपनी बात को जन-जन तक पहुँचाना था, इसलिए उन्होंने संस्कृत को अस्वीकार कर जनसामान्य की बोली (प्राकृत) में उपदेश दिए।
विद्वानों का मत है कि बुद्ध संभवतः ‘पुरानी मागधी’ बोलते थे—यह बिहार और उसके आसपास बोली जाने वाली एक सहज और अनौपचारिक बोली थी।
तो फिर ‘पालि’ क्या है? भगवान के निर्वाण के बाद, जब उनके वचनों को अलग-अलग क्षेत्रों में सुरक्षित रखने की चुनौती आई, तब एक ऐसी भाषा की आवश्यकता पड़ी जो विभिन्न बोलियों के बीच ‘पुल’ का काम कर सके। इसी आवश्यकता से पालि का विकास हुआ। पालि किसी एक गाँव की बोली नहीं, बल्कि एक “साहित्यिक” भाषा है, जिसे बुद्ध-वचनों को “सुरक्षित और मानक” रूप देने के लिए तैयार किया गया था। यह पश्चिमी और पूर्वी भारत की बोलियों का एक सुंदर मिश्रण है।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद, राजगृह में ५०० अर्हंत भिक्षुओं की एक ऐतिहासिक सभा (प्रथम संगीति) बुलाई गई। इसका एकमात्र उद्देश्य था—धम्म और विनय का मानकीकरण करना, ताकि भविष्य में कोई अपनी मर्जी से कुछ भी जोड़ न सके।
उस समय जिस “धम्म” का संकलन किया गया, वही आज हमारे लिए ‘प्रारंभिक बुद्ध वचन’ (EBT) का आधार है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय का धम्म अत्यंत सीधा और व्यावहारिक था—उसमें अधिकांशतः “चार आर्य सत्य” और सैंतीस बोधिपक्खिय धम्म की प्रधानता थी।
उस मूल स्वरूप में न तो अभिधम्म का जटिल दार्शनिक बुद्धिविलास था, और न ही पारमियों के नाम पर मुक्ति को असंख्य कल्पों तक टालने की कोई अवधारणा। सब कुछ इसी जीवन में अनुभव करने योग्य था।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद कुछ शताब्दियाँ शांति से बीतीं, लेकिन धीरे-धीरे संघ के भीतर दरारें उभरने लगीं। यह “मिलावट” किसी एक क्षण में नहीं हुई। यह एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया थी—धीमी, मानवीय और लगभग अपरिहार्य—जिसने समय के साथ धम्म के प्रस्तुतीकरण और प्राथमिकताओं को बदल दिया।
सबसे पहला मतभेद विनय (भिक्षु अनुशासन) को लेकर हुआ। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए लगभग १५२ पातिमोक्ख नियम बनाए थे और स्पष्ट कहा था कि “छोटे-मोटे नियमों को संघ चाहे तो बदल सकता है”। लेकिन कुछ वरिष्ठ भिक्षुओं (“स्थविरों”) ने नियमों को कम करने के बजाय उन्हें और कठोर बनाना शुरू कर दिया। नियमों की संख्या बढ़कर २२७ हो गई।
इस कठोरता के कारण संघ दो बड़े हिस्सों में टूट गया:
अब हर संप्रदाय ने अपने-अपने दृष्टिकोण को सही साबित करने के लिए ग्रंथों में थोड़ा-बहुत फेरबदल करना शुरू कर दिया।
इतिहास का एक बड़ा मोड़ सम्राट अशोक के काल में आया। अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिलने से संघ को बहुत धन-संपदा मिलने लगी। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि अनेक भोग-विलासी लोग, जो साधक नहीं थे, केवल सुख-सुविधाओं के लिए भिक्षु बन गए।
संघ को शुद्ध करने के लिए तीसरी संगीति बुलाई गई। विडंबना देखिए—संघ की “शुद्धि” करते-करते विद्वान भिक्षुओं ने धम्म में एक बहुत बड़ी “मिलावट” कर दी।
मोग्गलिपुत्त तिस्स ने ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ लिखा। बाद में, भिक्षुओं के पाण्डित्यपूर्ण उत्साह ने इसे और विस्तार दिया और विनय और सुत्त के साथ एक तीसरा पिटक जोड़ दिया—अभिधम्म पिटक।
भगवान ने कहा था—“मेरा धम्म परिपूर्ण है, इसमें न कुछ जोड़ने की जगह है, न घटाने की।”
लेकिन अभिधम्म के रचयिताओं ने मान लिया कि वे धम्म को बुद्ध से अधिक व्यवस्थित ढंग से वर्गीकृत कर सकते हैं। परिणाम? जो धम्म पहले “दुःख और उसका निरोध” था, वह अभिधम्म में आकर “चित्त-चेतसिक के सूक्ष्म विश्लेषण” में बदल गया। यह शुष्क, जटिल और आम आदमी की समझ से परे था।
मिलावट का एक और कुरूप चेहरा “लैंगिक भेदभाव” के रूप में उभरा। बाद के पाली संपादकों ने ग्रंथों को एक स्पष्ट “पुरुष-प्रधान” रंग देने का प्रयास किया। विनयपिटक में यह कथा प्रमुखता से जोड़ दी गई कि भगवान महिलाओं को संघ में शामिल करने के इच्छुक नहीं थे।
लेकिन यह केवल पाली परंपरा की अपनी खुराफात लगती है। जब हम महासर्वास्तिवाद जैसे समानांतर विनय ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, तो वहां बुद्ध की ऐसी कठोर अनिच्छा कहीं नहीं मिलती। यह इस बात का प्रमाण है कि परवर्ती संपादकों ने अपनी ही सामाजिक संकीर्णता को बुद्ध के मुख से कहलवा दिया।
विकृति सूत्रों तक भी पहुँची, जहाँ महिलाओं को कर्म और क्लेश में ‘हीन’ बताया जाने लगा। हद तो तब हो गई जब अंगुत्तरनिकाय में स्त्रियों की तुलना ‘काले सांपों’ से कर दी गई—कि उनमें भी सांपों जैसा ही क्रोध, विष और दोमुंहापन होता है। करुणा के जिस सागर में सबका समान स्वागत था, वहां महिलाओं के विरुद्ध अपमानजनक दीवारें खड़ी कर दी गईं।
उधर उत्तर भारत में महायान का उदय हो रहा था। उन्होंने बुद्ध को एक महामानव से उठाकर ‘देवता’ और ‘तारक’ बना दिया।
अब केवल ‘मुक्ति’ लक्ष्य नहीं थी, बल्कि ‘बोधिसत्व’ बनकर कल्पों तक संसार में रहना आदर्श बन गया। इस विचारधारा के दबाव में, थेरवाद परंपरा ने भी अपने साहित्य में जातक कथाएँ, बुद्धवंश और चरियापिटक जैसे ग्रंथ जोड़े ताकि वे दिखा सकें कि हमारे बुद्ध भी महायानी बुद्ध से कम चमत्कारी नहीं थे।
धीरे-धीरे, मूल सूत्रों पर अट्ठकथाओं की परतें चढ़ाई गईं। स्थिति यह हो गई कि लोगों ने मूल बुद्ध-वचन पढ़ना छोड़ दिया और केवल इन टीका-टिप्पणियों और कहानियों को ही ‘धम्म’ समझने लगे।
भिक्षु सुजातो इस स्थिति को एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाते हैं: “प्राचीन मंदिर का उदाहरण!”
कल्पना करें एक प्राचीन मंदिर की, जिसके गर्भगृह में एक सुंदर स्वर्ण प्रतिमा (मूल धम्म) है। समय के साथ, भक्तों ने उस मंदिर के चारों ओर नई दीवारें, मंडप और सजावट (बाद के ग्रंथ) बना दीं।
आज जब हम मंदिर को देखते हैं, तो हमें वह बाहरी सजावट ही दिखाई देती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि उन्होंने मूल प्रतिमा को तोड़ा नहीं, बस उसे ढक दिया। वह मूल प्रतिमा आज भी उन दीवारों के भीतर सुरक्षित है।
“मिलावट” का अर्थ यह भी नहीं है कि मूल धम्म नष्ट हो गया। इसका अर्थ है कि वह EBT (Early Buddhist Texts) के रूप में आज भी त्रिपिटक के विशाल भंडार के भीतर मौजूद है—बस हमें उसे पहचानने वाली नज़र चाहिए।
जब हम कहते हैं कि “धम्म में मिलावट हुई है”, तो मन में निराशा हो सकती है। क्या हम कभी जान पाएंगे कि बुद्ध ने वास्तव में क्या कहा था?
सौभाग्य से, उत्तर है—हाँ। हमारे पास एक वैज्ञानिक तरीका है।
इतिहास की एक घटना हमारे लिए वरदान बन गई। जब बौद्ध संघ अलग-अलग संप्रदायों (जैसे थेरवाद, सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तक आदि) में बंटा, तो वे अपने साथ “मूल सूत्रों” का बंडल लेकर अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
हजारों साल तक ये दोनों परंपराएं एक-दूसरे से कटी रहीं। भौगोलिक दूरी और भाषा के अंतर के कारण इनमें कोई संपर्क नहीं था।
आधुनिक विद्वानों (जैसे भिक्षु अनालयो और अन्य) ने एक क्रांतिकारी कार्य किया। उन्होंने पालि सूत्रों को एक तरफ रखा और चीनी आगमों को दूसरी तरफ। जब उनका मिलान किया गया, तो एक चमत्कारिक तथ्य सामने आया:
भाषा अलग थी, देश अलग थे, संप्रदाय अलग थे—लेकिन मुख्य उपदेश ९०% तक एक समान थे!

चूँकि ये परंपराएं लगभग २००० वर्षों तक एक-दूसरे से पूरी तरह कटी हुई थीं, इसलिए इनके बीच यह अद्भुत समानता किसी बाद के “सहयोग” का नहीं, बल्कि एक ही “मूल स्रोत” से निकले होने का अकाट्य प्रमाण है।
विभिन्न परंपराओं के बीच मौजूद यही “साझा और समान” हिस्सा निर्विवाद रूप से “प्रारंभिक बौद्ध सूत्र” (Early Buddhist Texts - EBT) कहलाता है। यही वह “शुद्ध स्वर्ण” है जिसकी हमें तलाश थी।
प्रारंभिक बुद्ध-वचनों (EBT) की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वे मुक्ति को किसी भविष्य, किसी अगले जन्म या किसी कल्प में नहीं टालते। यहाँ धम्म “संग्रह” का विषय नहीं, बल्कि “प्रत्यक्ष अनुभव” का मार्ग है। EBT में बुद्ध चमत्कार नहीं, समस्या दिखाते हैं—दुःख। और फिर कहते हैं: इसे यहीं, अभी, इसी जीवन में समझा और समाप्त किया जा सकता है। यही बात EBT को जीवित बनाती है।
अंत में, यह ऐतिहासिक बहस नहीं, बल्कि आपके और मेरे जीवन का सवाल है। जब आप बुद्ध का नाम लेते हैं, तो आप किसे पुकार रहे हैं?
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सी परंपरा सही है और कौन-सी गलत। असली प्रश्न यह है—जब मैं “बुद्ध” कहता हूँ, तो मैं किस बुद्ध को सुन रहा हूँ? उस बुद्ध को, जो परंपराओं की परतों में ढक गया है—या उस बुद्ध को, जिसकी आवाज़ आज भी प्रारंभिक सूत्रों में साफ़ सुनाई देती है?
EBT को पढ़ना इतिहास पढ़ना नहीं है; यह बुद्ध के सामने घुटने टेककर बैठने जैसा है। यह उस धुंध को हटाने जैसा है जो हमारे और हमारे शास्ता (बुद्ध) के बीच आ गई थी।
आज हमें किसी “नये” धम्म की जरूरत नहीं है। हमें बस उस धूल को झाड़ना है जो उस प्राचीन, चमकते हुए हीरे पर जम गई है। यदि हम ध्यान से सुनें, तो शोर-शराबे के नीचे आज भी वही सौम्य और स्पष्ट आवाज सुनाई दे रही है जो २६०० साल पहले सारनाथ में गूंजी थी—
दुःख है, उसका कारण है, उसका निवारण संभव है… और यह रहा उसका मार्ग।
बुद्ध अभी भी बोल रहे हैं। क्या हम सुनने को तैयार हैं?
इन प्राचीन ग्रंथों की विस्तृत संरचना और सूची देखें:
इस विषय पर हमारा हास्य-लेख भी देखे: