✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— दुक्खा पटिपदा —
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सभी लोक के प्रति नीरस!

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ५ मिनट

भगवान कहते हैं —

“सभी लोक-विश्व के प्रति निरस नज़रिया क्या है?

यदि साधक को किसी लोक (=कामलोक, ब्रह्मलोक) के प्रति आसक्ति हो, या उसके चित्त का स्थिराव, टिकाव, या झुकाव होता हो — तब उसे त्यागकर, वह अनासक्त रहता है।

यह सभी लोक के प्रति निरस नज़रिया कहलाता है।

सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना — महाफ़लदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।

जब कोई सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए में लीन रहे, तब सांसारिक चकाचौंध से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।

जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए में लीन रहे, तब सांसारिक चकाचौंध से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।

किंतु, यदि कोई ‘सभी लोकविश्व के प्रति निरस नज़रिए’ में लीन रहने पर भी, सांसारिक चकाचौंध से आकर्षित होता हो, या उसमें घिन-भाव उपस्थित न होता हो — तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फ़ल नहीं पाया!’

इस तरह, वह सचेत हो जाए।

और, यदि कोई ‘सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए’ में लीन रहे, और ‘सांसारिक चकाचौंध’ से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है — तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने ‘सभी लोक के प्रति निरस नज़रिया’ विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फ़ल पा लिया!’

इस तरह, वह सचेत हो जाए।

सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना — महाफ़लदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!”

— अंगुत्तरनिकाय १०:६० + ७:४६


उपनीयति लोको, अद्धुवो!
बह जाती है दुनिया,
बचती नहीं!

अताणो लोको, अनभिस्सरो!
आश्रय नहीं देती दुनिया,
कोई मालिक नहीं!

अस्सको लोको, सब्बं पहाय गमनीयं!
अपना नहीं कुछ इस दुनिया में।
सब छोड़कर जाना पड़ता है!

उनो लोको, अतित्तो, तण्हा दासो!
पर्याप्त नहीं यह दुनिया,
तृप्त नहीं करती,
तृष्णा की नौकर है!

— मज्झिमनिकाय ८२ : रट्ठपाल सुत्त


किसी ने भगवान से पूछा:

“भंते, लोग ‘दुनिया.. दुनिया..’ कहते हैं। यह शब्द ‘दुनिया’ (“लोक”) कहाँ लागू होता है?”

भगवान ने उत्तर दिया:

(“लुज्जती’ति लोके!”) “जो टूट-टूटकर बिखरती है, उसे ही ‘दुनिया’ कहते हैं!

क्या टूट-टूटकर बिखरती है?

  • आँख टूटकर बिखरती है। रूप टूटकर बिखरते हैं। आँख का चैतन्य टूटकर बिखरता है। आँख का संपर्क टूटकर बिखरता है। आँख के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
  • कान टूटकर बिखरते है। आवाज़े टूटकर बिखरती हैं। कान का चैतन्य टूटकर बिखरता है। कान का संपर्क टूटकर बिखरता है। कान के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
  • नाक टूटकर बिखरती है। गंध टूटकर बिखरती हैं। नाक का चैतन्य टूटकर बिखरता है। नाक का संपर्क टूटकर बिखरता है। नाक के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
  • जीभ टूटकर बिखरती है। स्वाद टूटकर बिखरते हैं। जीभ का चैतन्य टूटकर बिखरता है। जीभ का संपर्क टूटकर बिखरता है। जीभ के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
  • काया टूटकर बिखरती है। संस्पर्श टूटकर बिखरते हैं। काया का चैतन्य टूटकर बिखरता है। काया का संपर्क टूटकर बिखरता है। काया के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
  • मन टूटकर बिखरता है। स्वभाव टूटकर बिखरते हैं। मन का चैतन्य टूटकर बिखरता है। मन का संपर्क टूटकर बिखरता है। मन के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।

इस तरह, जो टूट-टूटकर बिखरती है, उसे ही ‘दुनिया’ कहते हैं।”

«सं.नि.३५:८२»



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