असुभ सञ्ञा
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आहारे पटिकुलसञ्ञा
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पटिकुल मनसिकार
| नवसिवथिक |
मरणसञ्ञा
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आदीनव सञ्ञा
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सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञा
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धातु मनसिकार
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सब्बसङखारेसु अनिच्चानुसञ्ञा
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अनत्त सञ्ञा
भगवान कहते हैं —
“(१) कोई भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई।
तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’
जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।
(२) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—कौवों द्वारा नोची जाती, चीलों द्वारा नोची जाती, गिद्धों द्वारा नोची जाती, बगुलों द्वारा नोची जाती, कुत्तों द्वारा चबाई जाती, बाघ द्वारा चबाई जाती, तेंदुए द्वारा चबाई जाती, सियार द्वारा चबाई जाती, अथवा विविध जंतुओं द्वारा खायी जाती।
तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’
जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।
(३) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस से युक्त, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…
(४) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…
(५) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…
(६) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बिना बँधी, हड्डियाँ जहाँ-वहाँ बिखरी हुई—कही हाथ की हड्डी; कही पैर की; कही टखने की हड्डी; कही जाँघ की; कही कुल्हे की हड्डी; कही कमर की; कही पसली; कही पीठ की हड्डी; कही कंधे की हड्डी; कही गर्दन की; कही ठोड़ी की हड्डी; कही दाँत; कही खोपड़ी।
तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’
जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।
(७) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—हड्डियाँ शंख जैसे सफ़ेद हो चुकी…
(८) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—वर्षोंपश्चात, जब हड्डियों का ढ़ेर लगा हो…
(९) आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—जब हड्डियाँ सड़कर चूर्ण बन चुकी हो।
तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’
जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।