
हम सभी जानते हैं कि जब दीये की लौ बुझती है तो क्या होता है—“अग्नि शांत होकर खत्म हो जाती है।” इसलिए जब हमें पता चलता है कि बौद्ध साधना का अंतिम लक्ष्य ‘निर्वाण’ है—जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘बुझ जाना’—तो मन में एक सिहरन दौड़ जाती है।
अनेक लोगों के मन में ‘खात्मे’ की एक खौफ़नाक छवि उभरती है।
निर्वाण को लेकर यह जो ‘बोरिंग’, ‘खौफ़नाक’ या ‘दुःखमयी’ छवि बनी है, उसका मुख्य कारण यह है कि हम प्राचीन रूपकों का संदर्भ भूल चुके हैं। प्राचीन भारतीय समाज—चाहे वह बौद्ध हो, वैदिक हो या जैन—वहाँ “आग बुझने” का अर्थ “मौत” नहीं था।
प्राचीन भारत में यह मान्यता प्रचलित थी कि अग्नि एक तत्व है जो कभी नष्ट नहीं होता। जब आग जलती है, तो वह ईंधन से बंधी होती है। वह छटपटाती है, जलती है और जलाती है। लेकिन जब वह बुझती है, तो वह नष्ट नहीं होती, बल्कि शांत होकर एक अव्यक्त अवस्था में चली जाती है। वह बंधनमुक्त होकर ब्रह्मांड में फैल जाती है।
बुद्ध ने जब ‘निर्वाण’ शब्द चुना, तो उनका ध्यान इस बात पर नहीं था कि “बुझी हुई आग का अस्तित्व बचा या नहीं?” उनका इशारा इस बात पर था कि आग “बंधन से मुक्त” हुई या नहीं।
इसलिए, निर्वाण का अर्थ यह कदापि नहीं है—“सब खत्म! संपूर्ण विनाश! महाशून्य! गया काम से!” 👹
बुद्ध के लिए जलती हुई आग प्रतीक थी—अशांति, जलन, पीड़ा और निर्भरता की। आग को टिके रहने के लिए ईंधन को कसकर पकड़े रहना पड़ता है। यही उसकी पीड़ा है। जैसे ही वह ईंधन को छोड़ती है, वह मुक्त हो जाती है। ‘बुझना’ दरअसल ‘आज़ादी’ है—जलन से, तड़प से और निर्भरता से।
इसी संदर्भ में ‘पाँच उपादान स्कन्ध’ को समझना चाहिए। खन्ध का एक अर्थ “पेड़ का तना” भी होता है। सूखी पत्तियां तो जल्दी जलकर राख हो जाती हैं, लेकिन ‘तना’ देर तक सुलगता रहता है। हमारा चित्त भी आग की तरह इन पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) रूपी तने से चिपका रहता है और जलता रहता है।
निर्वाण का अर्थ है—चित्त द्वारा उस ईंधन को छोड़ देना। जब ईंधन छूटता है, तो पीड़ा शांत हो जाती है। इसे ही ‘शीतली-भाव’ कहा गया है। इसमें ‘बोर होने’ या ‘मज़ा आने’ का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि ये दोनों अवस्थाएं जलन का ही हिस्सा हैं।
निर्वाण की यह ‘बंधनमुक्ति’ दो चरणों में समझाई गई है:
इस अवस्था को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।
१९७७ की एक प्रसिद्ध घटना है। थाईलैंड के महान भिक्षु अजान चाह लंदन गए थे। वहाँ एक अंग्रेज़ महिला ने उनसे पूछा, “अजान, क्या निर्वाण के बाद अस्तित्व बचता है?”
अजान चा ने पास जल रही एक मोमबत्ती की ओर इशारा किया, “क्या तुम्हें यह लौ दिख रही है?”
उसने कहा, “हाँ।”
अजान ने फूंक मारकर मोमबत्ती बुझा दी। “अब यह लौ कहाँ गयी? क्या वह नष्ट हो गयी, या कहीं और है?”
महिला चकरा गयी, “मुझे नहीं पता।”
अजान चा मुस्कुराए, “बस, निर्वाण भी ऐसा ही है। जिसे तुम अपनी बुद्धि के छोटे से प्याले में नहीं भर सकती।”
यह बात बुद्धि से समझना कठिन है। लेकिन हो सकता है कि किसी दिन, किसी शांत पल में, आप भी भिक्षुणी पटाचारा 1 की तरह इसे महसूस कर सकें। पटाचारा, जिसने अपने जीवन में सब कुछ खो दिया था, एक रात अपनी कुटिया में दीये की लौ को देख रही थी…
पाँव धोते हुए,
मैंने नीचे बहता जल देखा।
उसे देखकर चित्त मेरा,
अश्व की भाँति स्थिर हुआ।
दीया उठा कर तब मैंने,
कुटी में प्रवेश किया।
बिछावन पर बैठी मैं,
सुई से बत्ती को दबा दिया।
लौ को बुझते (निवृत्त होते) देख,
मेरा चित्त विमुक्त हुआ।थेरीगाथा ५:१० : पटाचारा
अजान चाह के मजेदार, सीधे और अनुभव-आधारित उपदेशों का संकलन पढ़ें:
बौद्ध इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर भिक्षुणी पटाचारा का नाम ध्रुवतारे की भांति अंकित है। वह केवल एक भिक्षुणी नहीं, बल्कि भिक्षुणी-संघ में ‘विनय-धरों’ (अनुशासन के रक्षकों) में शिरोमणि थीं। अट्ठकथाओं में वर्णित उनकी जीवन-गाथा जितनी हृदयविदारक है, उतनी ही प्रेरणादायी भी।
श्रावस्ती के एक महाधनाढ्य श्रेष्ठी के घर जन्मी इस कन्या का नाम ‘रूपवती’ था—जो न केवल उसका नाम था, बल्कि उसके अद्वितीय सौंदर्य का यथार्थ वर्णन भी। किंतु प्रारब्ध का खेल देखिए—महलों में पली-बढ़ी रूपवती का हृदय अपने ही घर के एक दास पर आ गया। प्रेम और हठ के वशीभूत होकर उसने कुल-वैभव को ठुकराया और गहन वन में जाकर अभावों का जीवन चुना।
दो पुत्रों को जन्म देने के बाद, एक दिन नियति ने उस पर वज्रपात किया। एक ही काली रात में उसका संसार उजड़ गया। पति को विषैले सर्प ने डस लिया, और ममता की छांव में पल रहे उसके दोनों नन्हें शिशु उफनती नदी के क्रूर प्रवाह में बह गए। जब वह बदहवास होकर, दुःखों का पहाड़ लिए अपने मायके पहुँची, तो देखा कि प्रकृति के प्रकोप ने उसका पैतृक घर भी ढहा दिया है—माता, पिता और भाई, सभी चिता की राख बन चुके थे।
दुःखों के इस अतिरेक ने उसकी चेतना को खंडित कर दिया। वह विक्षिप्त हो गई। सुध-बुध खोकर, वह कई वर्षों तक निर्वस्त्र और निराश्रित होकर पागलों की भांति भटकती रही।
अंततः, भटकते-भटकते उसके कदम जेतवन विहार की ओर मुड़ गए, जहाँ करुणा के सागर—तथागत बुद्ध—धर्म वर्षा कर रहे थे। बुद्ध की अमृतमयी दृष्टि उस पर पड़ते ही चमत्कार हुआ। उसकी खोई स्मृति लौटी। अपनी नग्नता का भान होते ही वह लज्जा से गड़ गई, तब एक करुणावान सज्जन ने उसे अपनी ‘पट’ (चादर) ओढ़ाई। इसी ‘पट’ को धारण कर, आचरण (आचार) शुद्ध करने के कारण वह ‘पटाचारा’ कहलायी।
भगवान के श्रीमुख से धर्म की एक ही देशना सुनकर वह सोतापन्न हुई। कालांतर में, उसी विक्षिप्त नारी ने अपनी साधना के बल पर न केवल भिक्षुणी संघ में प्रवेश किया, बल्कि ‘विनय’ के अनुशासन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर अर्हत्व के परम पद को सुशोभित किया। ↩︎