
जीवन के किसी निष्ठुर मोड़ पर, जब दुख के बादल आ घेरते हैं, तो हमारा भारतीय मन अक्सर लाचार आँखों से आसमान की ओर देखकर कह पड़ता है— “आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”, “मैंने किसका क्या बिगाड़ा था?”, या “ये मुझसे किस जन्म का बदला लिया जा रहा है?”
कुछ आस्तिक लोग डबडबाई आँखों से हताश होकर मान लेते हैं— “हाय, मेरी किस्मत ही खराब है!”, “विधाता ने मेरे भाग्य में यही लिखा था!”, या “मुझ पर ग्रह-नक्षत्र भारी हैं।”
वहीं दूसरी ओर, नास्तिक लोग ज़ोर देकर कहते हैं, “अरे भाई, सब कुछ महज एक इत्तेफाक है! कर्म-वर्म कुछ नहीं होता! दुनिया में जो भी घटता है, सब एक्सीडेंटल है!”
विडंबना देखिए: एक तरफ हम तर्क देते हैं, और दूसरी तरफ डर के मारे मंदिरों की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, ज्योतिषियों के सामने हथेलियाँ फैलाते हैं, और ग्रह-नक्षत्रों को शांत करने के लिए ‘शांति-पूजा’ करवाते हैं। हमारे अवचेतन में यह गहरा बैठ गया है कि ‘कर्म’ का अर्थ है—किस्मत, भाग्य, या किसी दैवीय बही-खाते में लिखा गया दंड। कहीं-न-कहीं हम खुद को एक ऐसी कठपुतली मानने लगे हैं, जिसकी डोर किसी और के हाथ में है। यह सोच हमें भीतर से कमजोर, लाचार और भाग्यवादी बना रही है।
हमारी देखा-देखी अब पश्चिम के लोग भी कहते फिरते हैं— “Karma is a bitch!” (“कर्म बहुत कमीना है!”) मानो कर्म कोई कुदरत का गंभीर नियम न होकर, हाथ में डंडा लिए कोई ‘वसूली भाई’ हो, जो बस आपके पिछले जन्म का उधार वसूलने के लिए गली के मोड़ पर खड़ा है।
उधर, आधुनिक विज्ञानवादी हमें केवल एक ‘जैविक रोबोट’ घोषित कर देते हैं। उनका कहना है कि सब कुछ न्यूरॉन्स और रसायनों का खेल है; हमारे पास चुनाव की कोई आजादी नहीं है।
इस तरह, ‘कर्म’ दुनिया का सबसे चर्चित, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा गया विषय बन गया है। यह वह धुरी है जिस पर लोग सहमत भी होते हैं, और आवेग में आकर विवाद भी करते हैं।
लेकिन यहाँ एक प्रश्न उठता है: जब सिद्धार्थ गौतम ‘बुद्ध’ बने और उन्होंने अस्तित्व के सभी रहस्यों को अपनी प्रज्ञा से जान लिया, तो उनका क्या कहना था? क्या बुद्ध भी हमें अपने भाग्य, ईश्वर की लीला, या ग्रहों की चाल के आगे इतना असहाय और लाचार मानते थे?
जी नहीं। बुद्ध का ‘कम्म’ सिद्धांत हमें लाचार नहीं, बल्कि सशक्त बनाता है। तो आईये, सदियों पुरानी धूल हटाते हैं और कर्म को ठीक वैसे समझते हैं, जैसा बुद्ध ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर समझाया।
मजे की बात यह है कि इतिहास खुद को दोहराता है। बुद्ध के समय भी समाज का हाल बिलकुल आज जैसा ही था। उस दौर में भी चौराहों से लेकर राजमहलों तक, ‘कर्म’ को लेकर एक भारी घमासान मचा हुआ था। बुद्ध के क्रांतिकारी ‘कम्म’ को समझने के लिए, उस समय के शोर-शराबे को सुनना जरूरी है, क्योंकि आज भी हम अनजाने में उन्हीं पुरानी भ्रांतियों को ढो रहे हैं।
उस समय मुख्य रूप से चार खेमे थे, जो आज भी हमारे आस-पास मौजूद हैं:
इनका फलसफा सीधा था: “खाओ-पियो और ऐश करो।” ये कहते थे: “कर्म-वर्म कुछ नहीं होता। मरने के बाद शरीर राख बन जाएगा और चेतना हवा में उड़ जाएगी। न कोई पाप है, न पुण्य। माँ-बाप की सेवा का कोई फल नहीं मिलता। इसलिए, जब तक जियो, उधार लेकर भी घी पियो।” (यह आज के उन लोगों जैसा है जो ‘YOLO’ (You Only Live Once) में विश्वास रखते हैं और मानते हैं कि जीवन केवल रसायनों का एक संयोग है, इसलिए नैतिकता की कोई जरूरत नहीं।)
इनका मानना था: “सब पहले से लिखा जा चुका है।” ये कहते थे: “इंसान के हाथ में कुछ नहीं है। जैसे धागे का गोला फेंकने पर वह उतना ही खुलता है जितना उसमें धागा हो, वैसे ही हमारे सुख-दुख पहले से तय हैं। हाथ-पैर मारने से या मेहनत करने से कुछ नहीं बदलने वाला।” (यही वह ‘किस्मत’ वाला विचार है जिसने सदियों से भारतीय जनमानस को कमजोर और आलसी बना रखा है।)
इनका पूरा जोर ‘जुगाड़’ पर था। ये कहते थे: “सुख-दुख सब ईश्वर की कृपा या कोप है। अगर बचना है, तो हमें दक्षिणा दो और बदले में मंत्र सुनो। अगर तुमसे पाप हो भी जाए, तो घबराना मत! बस एक भारी-भरकम पूजा करवा लो, होम-हवन करो और गंगा में डुबकी लगा लो—पाप धुल जाएगा।” (यानी पहले जी भरकर पाप कर लो, और फिर ‘रिश्वत’ देकर ईश्वर से सेटिंग कर लो और सजा से बच जाओ।)
इनका मत सबसे डरावना था। ये मानते थे कि शारीरिक क्रिया ही सबसे बड़ा कर्म है। अगर अनजाने में भी पैर से कीड़ा दब गया, तो पाप लग गया! इनका कहना था: “पुराने कर्मों का फल तो हर हाल में भोगना ही पड़ेगा। इसलिए शरीर को पीड़ा दो, कड़ा उपवास करो और खुद को कष्ट दो ताकि पुराने कर्म-संस्कार ‘जल’ जाएं और नए कर्म न बनें।” (यहाँ आदमी हर वक्त डरा-सहमा रहता है कि कहीं साँस लेने से भी पाप न लग जाए!)
इन सभी पुराने विचारों में मनुष्य की हालत दयनीय थी—
उन तमाम दार्शनिक शोर-शराबे के बीच, भगवान बुद्ध का आगमन एक सिंहनाद की तरह गूँजा। आईयें, देखते हैं, भगवान ने क्या घोषणा की।