
कर्म की गहरी समझ
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
अक्सर हम कर्म को बहुत ही सरल रेखीय गणित की तरह देखते हैं—जैसे १ + १ = २। हमारा मानना होता है कि इनपुट जैसा होगा, आउटपुट भी ठीक वैसा ही होगा।
लेकिन भगवान बुद्ध ने जिस कर्म-नियम का साक्षात्कार किया, वह कोई सरल ‘इनपुट-आउटपुट’ मशीन नहीं थी। बल्कि यह एक अत्यंत जटिल और गतिशील प्रक्रिया थी, जिसमें कई चक्र एक साथ घूमते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसमें कई सूक्ष्म कारक मिलकर यह तय करते हैं कि फल का स्वरूप क्या होगा।
बुद्ध ने कर्म के इस वास्तविक और उलझे हुए पैटर्न को अपनी गहरी प्रज्ञा से देखा, समझा और हॅक कर के उसे रोक दिया। रुकने के साथ ही मुक्ति घटित हुई। और उस मुक्ति के बाद, उन्होंने उस जटिल सत्य को हमारे लिए सरल बनाकर समझाने का प्रयास किया।
भगवान कहते हैं कि किसी कर्म का फल निश्चित एक ही रूप में फलश्रुत नहीं होता, बल्कि यह कई अन्य ‘घटक’ पर भी निर्भर करता है।
इसे एक उदाहरण से समझें: यदि आप एक ही प्रकार का बीज (जैसे आम की गुठली) दो अलग-अलग जगहों पर बोते हैं।
बीज (कर्म) तो एक ही था, लेकिन क्या उनका परिणाम (फल) एक जैसा होगा? नहीं। एक शायद अंकुरित होकर ही मर जाएगा, जबकि दूसरा विशाल वृक्ष बनकर हजारों मीठे फल देगा।
ठीक इसी तरह, भगवान बुद्ध कहते हैं कि हमारे कर्मों का ‘विपाक’ (फल) भी केवल क्रिया पर नहीं, बल्कि कई बातों पर निर्भर करता है। हम उनमें से पाँच प्रमुख बातों से समझाने का प्रयास करते हैं।
तो चलिए, अब एक-एक करके इन परतों को खोलते हैं और जानते हैं कि क्यों किसी एक ही कर्म का फल अलग-अलग लोगों को अलग-अलग रूप में मिलता है।
हमने पहले भाग में यह तो जान लिया कि ‘चेतना’ ही कर्म है। लेकिन क्या सभी चेतनाएं एक बराबर होती हैं? बिल्कुल नहीं।
कल्पना करें कि दो व्यक्ति हैं और दोनों ने एक समान वस्तु—मान लीजिए, १०० रुपये—किसी को दान में दिए। बाहर से देखने पर दोनों की क्रिया बिल्कुल एक जैसी है। कैमरे की रिकॉर्डिंग में भी दोनों एक जैसे दिखेंगे। लेकिन भगवान बुद्ध कहते हैं कि उन दोनों को मिलने वाला फल जमीन-आसमान का अंतर रख सकता है।
क्यों? क्योंकि उस दान को देते समय उनके चेतना का स्तर अलग-अलग था।
भगवान बुद्ध अपने प्रमुख शिष्य सारिपुत्त को (अंगुत्तरनिकाय ७.५२: दान महाफल सुत्त) में इस रहस्य को बहुत ही बारीकी से समझाते हैं। वे बताते हैं कि एक ही दान, अलग-अलग मानसिकताओं के साथ देने पर, व्यक्ति को अलग-अलग लोकों में ले जाता है।
आइए, चेतना की इस सीढ़ी को नीचे से ऊपर की ओर चढ़ते हुए समझते हैं:
सबसे निचले स्तर का दानी वह है जो दान को एक ‘निवेश’ की तरह देखता है। वह सोचता है: “अगर मैं आज दूँ, तो बुरे वक्त में मुझे वापस मिलेगा” या “मरने के बाद मुझे इसका फल भोगने को मिलेगा।” उसकी चेतना में ‘लोभ’ और ‘भविष्य का भय’ छिपा है। वह ‘त्याग’ नहीं कर रहा, वह ‘जमा’ कर रहा है।
इससे थोड़ा ऊपर वह व्यक्ति है जो लालच में नहीं, बल्कि यह सोचकर दान देता है: “दान देना अच्छी बात है। यह पुण्य का काम है।” यहाँ भय नहीं है, लेकिन एक सामाजिक धारणा है कि “साधु-संतों को देना चाहिए, यह अच्छा कर्म है।”
कुछ लोग इसलिए देते हैं क्योंकि यह उनकी कुल-परंपरा है। वे सोचते हैं: “मेरे पिता देते थे, मेरे दादा देते थे, हमारे घर का नियम है कि बिना दान दिए नहीं खाते। इसलिए मुझे भी देना चाहिए।” यहाँ ‘अहंकार’ नहीं है, बल्कि बड़ों का सम्मान और कर्तव्य-बोध है।
अब चेतना और ऊँची उठती है। यह व्यक्ति सोचता है: “मैं भोजन बना सकता हूँ, ये नहीं बना सकते। मेरे पास है, इनके पास नहीं है। यह उचित नहीं है कि मैं खाऊँ और ये भूखे रहें।” यहाँ ‘करुणा’ और दूसरों के दुःख को समझने की शक्ति जागृत होती है।
कुछ लोग यह सोचकर दान देते हैं: “जैसे प्राचीन काल के महान ऋषियों और मुनियों ने यज्ञ और दान किए थे, मैं भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलूँगा।” यहाँ आदर्शों को जीने की चाहत है।
यह बहुत ऊँची अवस्था है। यहाँ व्यक्ति किसी नियम, परंपरा या करुणा के बोझ तले नहीं देता। वह इसलिए देता है क्योंकि— “दान देने से मेरे मन को शांति मिलती है। मेरा चित्त प्रसन्न होता है।” उसे देने में ही आनंद आता है, पाने की कोई चाह नहीं होती।
इन सबसे ऊपर, भगवान एक ऐसी चेतना बताते हैं जो साधारण पुण्य से परे है। इसे बुद्ध कहते हैं— “चित्तालङ्कारं” (चित्त का गहना)। यहाँ साधक सोचता है: “मैं स्वर्ग जाने के लिए नहीं दे रहा, न ही सुख पाने के लिए। मैं दान इसलिए दे रहा हूँ ताकि मेरा मन ‘लोभ’ और ‘ममत्व’ से मुक्त हो। यह दान मेरे चित्त को मांजने का साधन है, यह मेरी साधना का सहारा (परिष्कार) है।”
यहाँ दान ‘पुण्य’ कमाने के लिए नहीं, बल्कि ‘अहंकार’ को गलाने के लिए दिया जा रहा है।
इसे एक नजर में समझने के लिए इस तालिका को देखें:
| आपकी सोच (चेतना) | परिणाम (जन्म स्थान) |
|---|---|
| “भविष्य में मुझे इसका फल भोगना है” (स्वार्थ) | चातुर्महाराजिका देवलोक |
| “दान देना अच्छी बात है” (नैतिकता) | तावतिंस देवलोक |
| “यह मेरी कुल-परंपरा है” (संस्कार) | यामा देवलोक |
| “मेरे पास है, इनके पास नहीं” (करुणा) | तुषित देवलोक |
| “प्राचीन ऋषियों की तरह” (आदर्श) | निर्माणरति देवलोक |
| “देने से मन प्रसन्न होता है” (खुशी) | परनिर्मित वशवर्ती देवलोक |
| “यह चित्त को शुद्ध करने का साधन है” (अनासक्ति) | ब्रह्मलोक (मुक्ति का मार्ग) |
अतः, अगली बार जब आप कोई कर्म करें, तो रुककर अपने आप से पूछें— “मैं यह क्यों कर रहा हूँ?” क्योंकि वही ‘क्यों’ यह तय करेगा कि आप भविष्य में कहाँ होंगे।
कर्म का नियम केवल ‘क्रिया’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस पर भी निर्भर करता है कि वह क्रिया किसके प्रति की गई है। इसे बुद्ध ‘खेती’ की उपमा देते हैं।
जैसे, आपके पास एक मुट्ठी उत्तम बीज (अच्छी चेतना) हैं।

बीज (कर्म/चेतना) वही था, लेकिन खेत (पात्र/व्यक्ति) अलग था, इसलिए परिणाम भी अलग हुआ। भगवान बुद्ध दक्खिणाविभंग सुत्त में इस गणित को बहुत स्पष्ट आंकड़ों में बताते हैं।
कल्पना करें कि आप किसी को एक वक्त का भोजन या कुछ धन देते हैं। उसका फल भविष्य में कितने गुना होकर लौटेगा?
| दान प्राप्त करने वाला (पात्र) | भविष्य में मिलने वाला फल (रिटर्न) |
|---|---|
| पशुयोनि (जैसे गाय) | १०० गुना |
| दुराचारी मनुष्य (शराबी/अनैतिक) | १,००० गुना |
| सदाचारी मनुष्य | १,००,००० (एक लाख) गुना |
| वीतरागी साधु (परधर्मी संन्यासी) | १,००,००,००० (१ करोड़) गुना |
| आर्य संघ (श्रोतापन्न से अरहंत तक) | असीम/असंखेय्य |
असीम क्यों? असीम की उपमा देते हुए बुद्ध कहते हैं, “जैसे कोई अपनी बाल्टी से समुद्र का कुल जल गिनने लगे, तो उसे पता ही नहीं लगेगा कि समुद्र का जल कुल कितनी बाल्टियाँ हैं। उसे ‘असीम’ कह देना ही ठीक है। उसी प्रकार, किसी आर्य व्यक्ति या संघ को देने का फल मापा नहीं जा सकता।”
यह ‘कई गुना’ का नियम पाप पर भी उतनी ही सख्ती से लागू होता है।
यदि आप किसी जानवर को डंडा मारते हैं, तो उसका पाप सीमित है। लेकिन यदि वही द्वेष किसी शांत, शीलवान संत या बुद्ध-पुरुष के प्रति किया जाए, तो उसका विपाक वज्र जैसा कठोर और भयानक होता है।
भगवान धम्मपद में भी स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि जो व्यक्ति निर्दोष और निहत्थे व्यक्ति को सताता है, वह वर्तमान जीवन में ही इन १० भयानक दुखों में से किसी एक को शीघ्र ही प्राप्त होता है:
“यो दण्डेन अदण्डेसु, अप्पदुट्ठेसु दुस्सति।
दसन्नमञ्ञतरं ठानं, खिप्पमेव निगच्छति।”— धम्मपद : दण्डवग्गो १३७
अर्थात: जो निर्दोष और निहत्थे पर दण्ड से प्रहार करता है, वह इन दस में से किसी एक स्थान पर जाकर गिर पड़ता है:
दूसरा उदाहरण: एक बार एक अहंकारी युवक ने घोड़े पर बैठे-बैठे एक शांत भिक्षु को देखकर नफरत से थूक दिया। उसे लगा, “बस थूका ही तो है!” लेकिन वह साधारण भिक्षु नहीं, एक ‘प्रत्येकबुद्ध’ थे।
उस एक पल की गुस्ताखी ने उसे कई जन्मों तक नरक की आग में झोंक दिया। और जब सदियों बाद उसे मनुष्य जन्म मिला भी, तो उसका शरीर कोढ़ से गला हुआ था।
सरल अर्थ: खेत (पात्र) जितना पवित्र होगा, पाप की आग उतनी ही भयंकर होगी।
अब तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण घटक पर आते हैं— “कैसे”।
बहुत से लोग कहते हैं, “मैं तो बहुत दान करता हूँ, फिर भी मेरे घर में सुख-शांति नहीं है। बच्चे बात नहीं मानते। धन जब जमा होता है, तो भोगने का समय नहीं मिलता। और जब समय मिले, तो धन खत्म हो जाता है ।”
बुद्ध कहते हैं कि कमी आपके ‘दान’ में नहीं, आपके ‘ढंग’ में भी होती है। आप ‘क्या’ देते हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप ‘कैसे’ देते हैं।
भगवान (सप्पुरिसदान सुत्त) में बताते हैं कि एक सत्पुरुष (सज्जन) ५ तरीकों से दान देता है, और हर तरीके का एक विशिष्ट बोनस फल मिलता है।
| आप कैसे देते हैं? | धन के साथ मिलने वाला ‘बोनस’ फल |
|---|---|
| १. श्रद्धा से और सम्मानपूर्वक देना | भविष्य में आप अत्यंत रूपवान, आकर्षक और प्रभावशाली बनेंगे। लोग आपको देखना पसंद करेंगे। |
| २. विचार करके, ध्यान से देना (जरूरत देखकर, पसंद देखकर) |
आपकी पत्नी, बच्चे, नौकर और कर्मचारी आपकी बात मानेंगे और आपकी सेवा दिल से करेंगे। (पारिवारिक सुख।) |
| ३. अपने हाथों से देना | आपको अपनी संपत्ति का भोग करने का सुख मिलेगा। (सिर्फ बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि उसका आनंद भी।) |
| ४. सही समय पर देना (जिस समय वाकई जरूरत हो) |
आपको जीवन में सफलता और लाभ समय पर मिलेंगे। (प्रमोशन में देरी नहीं होगी, काम नहीं अटकेंगे।) |
| ५. दूसरों को चोट पहुँचाए बिना देना (रॉबिन हूड जैसे किसी से चुराकर या लूटकर नहीं) | आपकी संपत्ति कभी आग, बाढ़, चोर, राजा या नफरती वारिसों द्वारा नष्ट नहीं होगी। वह सुरक्षित रहेगी। |
विपरीत स्थिति: यदि कोई व्यक्ति दान तो देता है, लेकिन—
…तो भविष्य में वह अमीर तो बनेगा (दान के कारण), लेकिन वह बदसूरत हो सकता है, उसके अपने बच्चे उसकी इज्जत नहीं करेंगे, और वह कंजूस स्वभाव का होगा जो अपनी ही दौलत का मजा नहीं ले पाएगा।
इस सिद्धांत को पायासि सुत्त की यह सच्ची घटना पूरी तरह साफ कर देती है।
राजकुमार पायासि एक बड़ा दानी था। वह महादान का आयोजन करता था। लेकिन वह दान में क्या देता था? टूटे हुए चावल की खिचड़ी और खट्टा अचार! और वह भी खुद नहीं देता था, बल्कि अपने नौकर ‘उत्तर’ से कह देता था— “जाओ, बाँट दो।” उसके मन में सम्मान नहीं था, वह बस एक रस्म निभा रहा था, मानो कूड़ा फेंक रहा हो।
वहीं, उसका नौकर ‘उत्तर’, जो उस दान को अपने हाथों से बांटता था, वह दान देते समय गरीबों को बहुत सम्मान और प्रेम से भोजन परोसता।
मरने के बाद क्या हुआ?
क्यों? क्योंकि “देने के तरीके” ने उनकी मंजिल बदल दी।
क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही बिजनेस शुरू करने वाले चार दोस्तों में से—
आधुनिक एम॰बी॰ए॰ के पास शायद इसका जवाब ‘मार्केटिंग’ या ‘लक’ हो, लेकिन बुद्ध (वणिज्ज सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ४.७९) में इसका सटीक कारण बताते हैं। यह आपकी “जुबान की कीमत” पर निर्भर करता है।
बुद्ध सारिपुत्त को बताते हैं:
| पूर्व-जन्म का व्यवहार | वर्तमान बिजनेस का परिणाम |
|---|---|
| जिसने किसी गुरु/साधु को कहा “मैं मदद करूँगा”, लेकिन फिर कुछ नहीं दिया (मुकर गया।) | अगले जन्म में वह जो भी बिजनेस करेगा, वह पूरी तरह फेल हो जाएगा। |
| जिसने कहा “मैं मदद करूँगा”, लेकिन वादा किए हुए से घटिया/कम वस्तु दी। | अगले जन्म में उसे बिजनेस में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिलेगी। घाटा या संघर्ष बना रहेगा। |
| जिसने कहा “मैं मदद करूँगा”, और जैसा कहा था, ठीक वैसा ही दिया। | अगले जन्म में उसे बिजनेस में अपेक्षानुसार सफलता मिलेगी। |
| जिसने कहा “मैं मदद करूँगा”, और वादे से बढ़कर (ज्यादा/बेहतर) दिया। | अगले जन्म में उसका बिजनेस उम्मीद से कई गुना ज्यादा सफल होगा। |
यह नियम केवल दान पर नहीं, हमारे ग्राहकों और कर्मचारियों के साथ व्यवहार पर भी लागू होता है।
यही कर्म का ‘वाणिज्य’ नियम है, जिसे बुद्ध ने उजागर किया।
यहाँ बड़े प्रश्न उठते हैं: “क्या हर पाप की सजा बराबर होती है?”, “क्या जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे?”, “क्या कर्म का फल पत्थर की लकीर है जिसे बदला नहीं जा सकता?”
भगवान बुद्ध (लोणफल सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ३.९९) में इसका उत्तर “नमक के ढेले” के अद्भुत उदाहरण से देते हैं।
वे कहते हैं कि कर्म का फल इस बात पर भी निर्भर करता है कि वर्तमान में “भोगने वाले का पात्र (मन)” कितना बड़ा है।
कल्पना करें कि आपके पास एक बड़ा चम्मच भरकर नमक (एक बुरा कर्म) है।
यह उस व्यक्ति की दशा है जिसका मन संकीर्ण है, जो शील और प्रज्ञा में विकसित नहीं है। एक छोटा सा पाप भी उसे नरक में ले जाने या भारी दुख देने के लिए काफी है।
यह उस व्यक्ति की दशा है जिसने साधना से अपने मन को विशाल कर लिया है। वही पुराना पाप जब फल देने आता है, तो वह उसे एक हल्की खरोंच या सिरदर्द की तरह महसूस होकर गुजर जाता है, उसे नरक नहीं ले जाता।

दुःख (नमक) का आना पुराना कर्म है, लेकिन उससे आपको कितनी पीड़ा होगी, यह आपके ‘आज के कर्म’ (पानी की मात्रा) पर निर्भर है। इसलिए, पाप से डरकर बैठने के बजाय, अपने पुण्य और प्रज्ञा को बढ़ाकर अपने पात्र को गंगा जैसा विशाल बनाना ही एकमात्र उपाय है।
भगवान एक बहुत ही क्रांतिकारी बात कहते हैं:
भिक्षुओं! यदि कोई ऐसा कहे—‘यह व्यक्ति जैसा-जैसा कर्म करता है, उसे ठीक वैसा-वैसा ही (उसी अनुपात में) फल भोगना पड़ेगा’ —तो ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य सफल होना (मुक्ति) संभव नहीं है, और दुःखों के पूर्ण अंत (निर्वाण) का कोई अवसर ही नहीं बचता।"
— लोणफल सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ३.९९
इसका क्या अर्थ है?
जरा सोचिए, यदि कर्म का नियम “खून के बदले खून” जैसा कठोर और गणितीय (1:1) होता, तो क्या होता? हम सभी ने अनंत पिछले जन्मों में अनगिनत पाप किए हैं। यदि हर पाप के लिए हमें ठीक उतना ही कष्ट भोगना पड़े, तो:
खुशखबरी: भगवान आगे कहते हैं: “कर्म का फल हमेशा सीधी रेखा में नहीं मिलता।” यह एक बहुत अच्छी बात है। क्योंकि यदि ऐसा न होता, तो कोई कभी मुक्त ही नहीं हो पाता।
परंतु यदि कोई कहे कि— ‘व्यक्ति कर्म करता है, और वह कर्म (वर्तमान अवस्था के अनुसार) जिस रूप में महसूस होने योग्य होता है, वह वैसा विपाक महसूस करता है’ —तब ब्रह्मचर्य संभव है, और दुःखों का अंत संभव है।"
इस सिद्धांत का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण अंगुलिमाल हैं। कहते हैं कि अंगुलिमाल ने सैकड़ों लोगों की हत्या की थी।
यही कर्म-निरोध का रहस्य है। आप अपनी प्रज्ञा की आग इतनी तेज कर सकते हैं कि पुराने कर्मों के पहाड़ (जो नरक ले जाने वाले थे) जलकर राख हो जाएं, या उनका असर घटकर मात्र एक ‘सिरदर्द’ या ‘हल्की चोट’ जितना रह जाए।
यदि सब कुछ पहले से तय होता (नियतिवाद), तो अध्यात्म, प्रयास, शिक्षा और सुधार का कोई अर्थ ही नहीं बचता। जबकि जीवन एक तीरंदाजी का खेल है।
एक बुरा तीरंदाज अनुकूल हवा में भी निशाना चूक सकता है। लेकिन एक कुशल, अभ्यस्त तीरंदाज तेज विपरीत हवा होने पर भी, अपने कौशल से तीर की दिशा को समायोजित करके लक्ष्य भेद सकता है।
हम हवा को दोष देकर बैठ नहीं सकते। हम ‘धनुष’ थामने वाले योद्धा हैं। हवा का काम है चलना, हमारा काम है साधना। बुद्ध कहते हैं कि वर्तमान का पुरुषार्थ अतीत के कर्मों से अधिक बलवान हो सकता है, यदि वह प्रज्ञा के साथ किया जाए।
अगला रहस्य यह है कि कर्म की शक्ति इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कर्म के तीनों चरणों में कैसा महसूस करते हैं।
बुद्ध कहते हैं कि पूर्ण कर्म वह है जिसमें:
लेकिन क्या होता है जब हम बाद में पछतावा करते हैं? भगवान के समय घटी एक घटना से सीखें।
श्रावस्ती में एक बहुत अमीर सेठ (श्रेष्ठी) की मृत्यु हुई, लेकिन उसने पीछे कोई वारिस नहीं छोड़ा। सारी संपत्ति राजा के पास गई। राजा ने बुद्ध को बताया कि सेठ के घर से करोड़ों की स्वर्ण-मुद्राएं मिलीं, लेकिन वह सेठ खुद फटे कपड़े पहनता था, टूटे चावल की खिचड़ी खाता था और जर्जर गाड़ी में घूमता था।
भगवान बुद्ध ने (पुत्तक सुत्त: संयुक्तनिकाय ३.२०) इसका रहस्य खोला कि
इसलिए कर्म करके कभी पछताना नहीं चाहिए। यदि आपने नेकी की है, तो बाद में उस पर शक न करें। “नेकी कर और दरिया में डाल”—यही सही तरीका है। यदि आप दान देकर सोचते हैं “पैसा बर्बाद हो गया”, तो आप अपने भविष्य के सुख में दीमक लगा रहे हैं।
तो हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि हमारे कर्म शुद्ध हैं और हमें बाद में पछताना न पड़े? भगवान बुद्ध अपने पुत्र राहुल को अम्बलट्ठिक-राहुलोवाद सुत्त में एक बहुत ही व्यावहारिक “दर्पण टेस्ट” देते हैं।
वे कहते हैं: “राहुल, कर्म वैसे ही करना चाहिए जैसे हम आईने में अपना चेहरा देखते हैं—बार-बार जांच करके।” इसे आप “तीन चरणों का टेस्ट” कह सकते हैं:
(१) कर्म करने से पहले: रुकें और सोचें— “मैं जो करने जा रहा हूँ (चाहे शरीर, वाणी या मन से), क्या इससे मुझे या किसी और को पीड़ा होगी?”
(२) कर्म करते समय: भी होश रखें— “क्या यह कार्य अनजाने में किसी को चोट पहुँचा रहा है?”
(३) कर्म करने के बाद: पलट कर देखें— “क्या मेरे इस कार्य से शांति मिली या बेचैनी?”
यही वह “फिल्टर” है जिससे एक साधक अपने कर्मों को ‘काला’ होने से बचाता है और उन्हें ‘सफेद’ (शुद्ध) रखता है।
हम अक्सर सोचते हैं कि कर्म बस “कर दिया और काम खत्म”। लेकिन बुद्ध कहते हैं कि कर्म की शक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि उसे करते समय समय की तीन अवस्थाओं में आपका मन कैसा था।

इसे “राहुल” को दिए गए उपदेश और “तगरसिखी” की कथा के आधार पर इस तालिका से आसानी से समझा जा सकता है:
| समय | शुद्ध कर्म | अशुद्ध कर्म |
|---|---|---|
| १. पूर्व-चेतना (करने से पहले) | उत्साह: “अरे! मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मुझे यह भला काम करने का मौका मिल रहा है।” | हिचकिचाहट: “यार, करना पड़ेगा क्या? मन तो नहीं है, पर चलो मजबूरी में कर देता हूँ।” |
| २. मुंचन-चेतना (करते समय) | प्रसन्नता/एकाग्रता: मन पूरी तरह उस काम में लगा हो। न क्रोध हो, न चिड़चिड़ापन। | विकृति: दान देते समय या सेवा करते समय मन में गुस्सा या खीज होना। |
| ३. अपर-चेतना (करने के बाद) | संतोष: “बहुत अच्छा हुआ। मेरा जीवन सफल हुआ।” (इसे बार-बार याद करके खुश होना।) | पछतावा: “अरे! बेकार पैसे खर्च हो गए। नहीं देता तो अच्छा था।” (यह पुण्य की शक्ति को नष्ट कर देता है।) |
सीख: यदि आप चाहते हैं कि आपका कर्म ‘महाफलदायी’ हो, तो इन तीनों खानों में “प्रसन्नता” का टिक (✓) होना चाहिए। बाद में पछताना सबसे बड़ा शत्रु है।
लोगों को कर्म के ऊपर कुछ सवाल होते हैं, जो विरोधाभास जैसे लगते हैं। आईये, इस निबंध के अंतिम भाग (भाग ३) में इस ‘विरोधाभास’ को सुलझाते हैं और कर्म से मुक्ति का रास्ता जानते हैं।