
कर्म की प्राथमिक समझ
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
उन तमाम दार्शनिक शोर-शराबे के बीच, भगवान बुद्ध का आगमन एक सिंहनाद की तरह गूँजा। उन्होंने उन पुरानी लाचार मान्यताओं को सिरे से खारिज कर दिया और घोषणा की:
और फिर बुद्ध ने कर्म की वह क्रांतिकारी परिभाषा दी जिसने अध्यात्म की दिशा हमेशा के लिए बदल दी:
चेतनाहं, भिक्खवे, कम्मं वदामि। चेतयित्वा कम्मं करोति – कायेन वाचाय मनसा।” — निब्बेधिक सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ६.६३
अर्थात, “चेतना (इरादे) को ही, भिक्षुओं, मैं कर्म कहता हूँ। इरादा करके ही कोई कर्म करता है—काया से, वाणी से, या मन से।”
यह बात उस समय के लिए एक बड़ा झटका थी। भगवान बुद्ध एक प्रमुख जैन अनुयायी उपालि को (उपालि सुत्त में) स्पष्ट करते हैं कि ‘दंड’ (शारीरिक क्रिया) और ‘कर्म’ (मानसिक चेतना) में जमीन-आसमान का अंतर है।
जहाँ जैन धर्म में शारीरिक क्रिया को सबसे भारी पाप माना जाता था, बुद्ध ने घोषित किया कि ‘मनो-कर्म’ ही सबसे भारी और सबसे दोषपूर्ण होता है। क्यों? क्योंकि ‘चेतना’ (इरादा) मन में ही जन्म लेती है। शरीर और वाणी तो बस उस मन के आदेश का पालन करने वाले नौकर हैं।
इसे दो उदाहरणों से समझें:
इस सिद्धांत को ‘धम्मपद’ की ये दो गाथाएं बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट करती हैं—
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया,
मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा,
ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्कंव वहतो पदं!
मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा,
ततो नं सुखमन्वेति, छायाव अनपायिनी!”— धम्मपद यमकवग्ग १+२
अर्थात,
अब प्रश्न उठता है कि हमें कैसे पता चले कि हमारा मन दूषित है या उजला? ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की कसौटी क्या है?
बुद्ध इसका बहुत स्पष्ट पैमाना देते हैं। वे कहते हैं कि कर्म का अच्छा या बुरा होना, उसके पीछे छिपी ‘जड़ों’ पर निर्भर करता है:

बुद्ध का ‘मनो-कर्म’ को सबसे भारी कहना केवल दार्शनिक बात नहीं है, यह एक भयानक वास्तविकता है।
बुद्ध कहते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी काया से एक पल में कितना बड़ा पाप कर सकता है? एक तलवार या हथियार से वह कुछ लोगों को मार सकता है। उसकी शारीरिक क्षमता की एक सीमा है। लेकिन दुष्ट मन की कोई सीमा नहीं है।
बुद्ध उपालि को उदाहरण देते हुए पूछते हैं कि प्राचीन काल में दंडक, कलिंग और मातंग जैसे विशाल वन-प्रदेश कैसे वीरान हो गए? उत्तर था—ऋषियों के चित्त-प्रकोप (मन के गुस्से) से।
(आधुनिक संदर्भ में सोचें तो एक तानाशाह का एक गलत ‘विचार’ या ‘दस्तखत’ (मनो-कर्म) एक ही पल में लाखों लोगों को युद्ध की आग में झोंक सकता है और पूरे देश को राख कर सकता है। शरीर की ताकत सीमित है, मन की ताकत असीमित है।)
अब जब हमने यह समझ लिया कि ‘चेतना’ ही कर्म का बीज है, तो अगला स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि इस बीज का फल कब, कहाँ और कैसे मिलता है?
अब तक तो किसी आधुनिक तर्कवादी को भी बुद्ध की परिभाषा (कर्म = इरादा) से कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन उसे दिक्कत तब शुरू होती है, जब वह सुनता है कि ये कर्म कब फल देंगे।
भगवान बुद्ध कहते हैं—
मैं कहता हूँ, भिक्षुओं, कर्मों के फल तीन समय उपजते हैं:
- इसी जीवन में,
- अगले जन्म में,
- उसके बाद के किसी जन्म में।
—निब्बेधिक सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ६:६३
इसका सैद्धांतिक अर्थ है कि बुद्ध का कर्म-सिद्धांत पुनर्जन्म से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। और कर्म का पीछा तब तक नहीं छूटता जब तक कि उसका फल न मिल जाए या व्यक्ति परिनिर्वाण प्राप्त न कर ले।
अक्सर कुछ आचार्य कहते हैं, “हाथ-कंगन को आरसी क्या? 1 पुनर्जन्म को भूल जाओ, कर्म का फल तो “अभी इसी समय” मिलता है। उनका तर्क होता है कि— “अच्छा करते समय अच्छा लगता है और बुरा करते समय बुरा।”
लेकिन, यह पैमाना पूरी तरह सही नहीं है। उदाहरण के लिए, एक सीरियल किलर को हत्या करते समय, या एक व्यभिचारी को व्यभिचार करते समय बहुत ‘मजा’ आ सकता है। उस वक्त उसे कोई ‘दुःख’ महसूस नहीं होता, क्योंकि उसका दूषित ‘आवेग’ तृप्त हो रहा होता है। इसलिए ही तो वह पाप बार-बार करता है।
इसके ठीक विपरीत, यदि उसी व्यक्ति को कोई कुशल कर्म (जैसे “संयम”) करने के लिए कहा जाए, तो उसे बहुत बुरा महसूस होता है। वह व्याकुल हो उठता है, और कई बार तो झुंझलाकर अपना आपा खो बैठता है। तीव्र राग, द्वेष या मोह वाले व्यक्ति के लिए ‘संयम’ जैसा कुशल कर्म करना आग में जलने जैसा कष्टकारी होता है।
अतः बुद्ध कहते हैं कि पाप करते वक्त आने वाला यह ‘मजा’, या पुण्य करते वक्त होने वाली यह ‘व्याकुलता’ कर्म का फल नहीं है; यह तो मन की विकृति है। असली ‘विपाक’ (फल) तो बाद में आएगा।
इसलिए समझदार व्यक्ति केवल यह न देखे कि कर्म करते समय “कैसा लग रहा है”, बल्कि यह देखे कि वह कर्म भविष्य में कहाँ ले जाएगा।
इस मुहावरे का मतलब है कि जो चीज़ बिल्कुल सामने, स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रही हो, उसके लिए अलग से प्रमाण देने की ज़रूरत नहीं होती। जैसे हाथ में पहना हुआ कंगन देखने के लिए शीशे की आवश्यकता नहीं होती, उसी तरह कुछ बातें इतनी स्पष्ट होती हैं कि उन्हें सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। ↩︎
आगे, बुद्ध कर्मों की विविधता उनके फलश्रुत होने वाले स्थानों के अनुसार बताते हैं—
- “कुछ (प्रकार के) कर्म नरक में फलश्रुत होते हैं,
- कुछ पशुयोनि में,
- कुछ प्रेतलोक में,
- कुछ मनुष्यलोक में,
- कुछ देवलोक में।
—निब्बेधिक सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ६:६३
और, इसका सैद्धान्तिक अर्थ यह है कि बुद्ध का धम्म केवल ‘मनोविज्ञान’ नहीं है, यह परलोक से भी जुड़ा है। इसे ३१ लोकों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
कई बार आधुनिक पाठक इन लोकों की बात सुनकर इसे “बाद की मिलावट” मान लेते हैं। लेकिन ऐतिहासिक सत्य यह है कि यह धारणा कोई बाद की मिलावट नहीं, बल्कि प्रारंभिक सूत्रों (EBT) का अभिन्न अंग है। भगवान बुद्ध अक्सर ३१ विभिन्न लोक का उल्लेख करते हुए मिलते हैं—चाहे वह उनका सर्वप्रथम उपदेश (धम्मचक्कपवत्तन सुत्त) हो (जहाँ विभिन्न देवलोकों में धम्म की गूँज पहुँचने का वर्णन है) या उनका अंतिम उपदेश (महापरिनिर्वाण सुत्त) (जहाँ वे अपने शिष्यों की मृत्यु के बाद की गति बताते हैं)।
भगवान बुद्ध ने महासीहनाद सुत्त में इन लोकों की तुलना इन उपमाओं से की है:
बुद्ध अपने प्रमुख शिष्य सारिपुत्त को बताते हैं—
जैसे, सारिपुत्त, कोई अंगारों से भरा गड्ढा हो—एक आदमी के कद से भी गहरा, जिसमें बिना धुएँ के अंगारे धधक रहे हों। तब कड़ी धूप में एक आदमी आता है—गर्मी से बेहाल, थका-हारा, कांपता हुआ और प्यासा। वह उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है जो सीधे उस गड्ढे की ओर जाता है।
उसे देखकर कोई आँख वाला व्यक्ति कहेगा—‘यह आदमी जिस रास्ते पर चल रहा है, यह निश्चित ही उस अंगारों से भरे गड्ढे में गिरेगा।’ और कुछ समय बाद, वह वाकई उस गड्ढे में गिरा हुआ मिलता है, जहाँ उसे मात्र केवल (शुद्ध स्वरूप में) घोर पीड़ा, तीव्र और कटु वेदनाओं की अनुभूति हो रही होती है।
उसी तरह, सारिपुत्त, जब मैं किसी व्यक्ति के चित्त को अपने मानस से जान लेता हूँ—“जैसा इस व्यक्ति का आचरण है, वह उस रास्ते पर चल रहा है, जहाँ कोई मरणोपरांत काया छूटने पर, दुर्गति हो नर्क में उपजता है।” तब कुछ समय बीतने पर, मैं अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से देखता हूँ कि वह मरणोपरांत काया छूटने पर, दुर्गति हो नर्क में उपजा है। और वहाँ उसे मात्र केवल (शुद्ध स्वरूप में) घोर पीड़ा, तीव्र और कटु वेदनाओं की अनुभूति हो रही है।”
जैसे कोई गू (मल) से भरा गड्ढा हो—एक आदमी के कद से भी गहरा, ऊपर तक गू से भरा हुआ। तब कड़ी धूप में एक आदमी आता है—गर्मी से बेहाल, थका-हारा, कांपता हुआ और प्यासा… और वहाँ उसे तीव्र पीड़ा और कटु वेदनाओं की अनुभूति हो रही है।"
जैसे किसी ऊबड़-खाबड़ भूमि पर एक (सूखा) वृक्ष हो, विरल पत्तियों से छितर-बितर छाया देने वाला। तब कड़ी धूप में एक आदमी आता है—गर्मी से बेहाल, थका-हारा, कांपता हुआ और प्यासा… वह पुरुष उस वृक्ष के ही नीचे बैठा या लेटा है, जहाँ उसे ज्यादातर पीड़ाओं की ही अनुभूति हो रही है।"
जैसे किसी समतल भूमि पर एक वृक्ष हो, घनघोर पत्तियों से गहरी छाया देने वाला। तब कड़ी धूप में एक आदमी आता है—गर्मी से बेहाल, थका-हारा, कांपता हुआ और प्यासा… वह पुरुष उस वृक्ष के ही नीचे बैठा या लेटा है, जहाँ उसे ज्यादातर सुखद अनुभूति हो रही है।"
जैसे कोई महल हो—शिखर छत वाली हवेली, भीतर और बाहर से उपलिप्त (=पलस्तर किया), बन्द होने वाला दरवाजा, पवन से बचने के लिए बंद होने वाली खिड़कियाँ हो। और वहाँ एक राज-सिंहासन जैसा बिस्तर हो—लंबी ऊनी चादर रखा, सफ़ेद ऊनी चादर रखा, कढ़ाईदार चादर रखा, नीचे कदली-मृग की खाल का गलीचा, ऊपर छत्र खुला, दोनों ओर लाल तकिये रखा हुआ। तब कड़ी धूप में एक आदमी आता है—गर्मी से बेहाल, थका-हारा, कांपता हुआ और प्यासा… वह पुरुष उस महल में हवेली के भीतर उस बिस्तर पर बैठा या लेटा है, जहाँ उसे मात्र केवल (शुद्ध स्वरूप में) सुखद अनुभूति हो रही है।"

अब, प्रश्न यह है कि आखिर कौन से कर्म हमें आग के गड्ढे (नरक) में धकेलते हैं और कौन से कर्म हमें महल (देवलोक) या शीतल छाया (मनुष्य जीवन) में ले जाते हैं? आईये, कर्मों के इस वर्गीकरण को विस्तार से जानते हैं।
हमने पहले ही जान लिया है कि कर्म मुख्य रूप से तीन द्वारों से होते हैं—काया, वाणी और मन। बुद्ध इन कर्मों को दो स्पष्ट भागों में विभाजित करते हैं—
इसे आप एक ‘मेन्यू कार्ड’ की तरह समझ सकते हैं। आप जैसा ऑर्डर (कर्म) करेंगे, वैसा ही डिश (फल) आपके टेबल पर आएगा।
भगवान बताते हैं कि दस अकुशल-कर्मपथ होते हैं—
यहाँ गौर करें: यहाँ बुद्ध किसी एक बार की गलती की बात नहीं कर रहे (जिसका पश्चाताप होने पर दुबारा न किया गया हो)। यहाँ बात हो रही है ‘आदत’ की। भगवान कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति इन कार्यों में लिप्त रहता है, उन्हें बार-बार करता है और अपना स्वभाव बना लेता है, तो मृत्यु के बाद उसका नरक, पशुयोनि या प्रेतयोनि में गिरना लगभग तय है।
लेकिन, यदि किसी पुण्य के प्रभाव से वह दुर्गति से बच जाए और उसे मानव जन्म मिल भी जाए, तो भी उसके पुराने पाप उसका पीछा नहीं छोड़ते। उसे “सबसे हल्का फल” भुगतना ही पड़ता है, जिसे सस्ते में निपट जाना भी कहा जा सकता है। वह फल क्या है? आईये इस तालिका से समझते हैं:
| अकुशल कर्म (कारण) | मानव जीवन में मिलने वाला सबसे हल्का फल (परिणाम) |
|---|---|
| जीवहत्या | अल्पायु, बचपन या जवानी में मौत। |
| हिंसा/यातना देना | बीमारियां, कमजोर सेहत। |
| क्रोध/चिड़चिड़ापन | कुरूपता, बदसूरती। |
| ईर्ष्या करना | प्रभावहीनता, कोई इज्जत न होना। |
| दान न देना (कंजूसी) | दरिद्रता, पैसों की तंगी। |
| अहंकार | नीच कुल/परिवार में जन्म। |
| चोरी करना | धन-नाश (पैसा आएगा पर टिकेगा नहीं।) |
| व्यभिचार | शत्रुओं से घिरा रहना, नफरत मिलना। |
| झूठ बोलना | झूठे आरोप लगना, बदनामी होना। |
| चुगली करना | दोस्तों का बिछड़ना, मित्रता टूटना। |
| कटु वचन (गाली) | अप्रिय आवाजें सुनना (गाली, अपमान, धमकी।) |
| ज्ञान न पूछना (धार्मिक रुचि नहीं) | मंदबुद्धि होना। |
| शराब पीना, नशा करना | पागलपन आना |
और, इसलिए जब लोग अक्सर रोते हैं—“मैं ही बीमार क्यों हूँ?”, “मेरा पैसा डूब क्यों जाता है?”, “मैं दिखने में बदसूरत क्यों हूँ?”, तब भगवान बुद्ध (चूळकम्मविभङ्ग सुत्त में) कहते हैं:
इस प्रकार, कुमार, सभी सत्व अपने कर्म के स्वयं स्वामी हैं… वे जो भी कर्म करते हैं—कल्याणकारी या पापपूर्ण—उसी के वारिस बनते हैं… उनके (पूर्व) कर्म ही उन्हें हीन और उत्तम में विभाजित करते हैं।"
कुशल कर्म ठीक इसके विपरीत हैं। यह केवल “बुरे कामों से बचना” नहीं है, बल्कि अच्छाई को सक्रिय रूप से ‘स्वभाव’ बनाना है।
भगवान कहते हैं (सालेय्यक सुत्त) कि जो व्यक्ति १० कुशल कर्मों का पालन करता है, वह मृत्यु के बाद सद्गति पाकर स्वर्ग में जाता है। यही नहीं, ऐसा व्यक्ति जिस भी लोक की कामना करता है (चाहे वह अमीर बनना हो, देव बनना हो, या ब्रह्म बनना हो), उसकी वह कामना पूरी होती है क्योंकि उसके पास ‘पुण्य’ की करेंसी है।
यदि वह दोबारा मनुष्य बनता है, तो उसे अकुशल के मुकाबले ठीक उल्टा और सकारात्मक फल मिलता है:
| कुशल कर्म (कारण) | मानव जीवन में मिलने वाला सबसे हल्का फल (परिणाम) |
|---|---|
| जीवहत्या से विरत (अहिंसा) | दीर्घायु, लंबी उम्र और जीवन की सुरक्षा। |
| जीवों को न सताना (दया) | निरोगी काया, उत्तम स्वास्थ्य, बीमारियां नहीं होतीं। |
| क्रोध न करना (मैत्री) | सुंदरता (सुरूपता), मनमोहक व्यक्तित्व। |
| ईर्ष्या न करना (मुदिता) | प्रभावशाली, बड़ा रुतबा, समाज में साख। |
| दान देना (उदारता) | महाधनवान, विपुल संपत्ति का स्वामी। |
| अहंकार न करना (विनम्रता) | उच्च कुल, प्रतिष्ठित परिवार में जन्म। |
| चोरी से विरत (ईमानदारी) | धन-संपत्ति सुरक्षित, धन का कभी नाश नहीं होता। |
| व्यभिचार से विरत (वफ़ादारी) | शत्रु रहित, कोई दुश्मन नहीं, शांतिपूर्ण जीवन। |
| झूठ से विरत (सत्य) | विश्वसनीयता, लोग बातों पर भरोसा करते हैं, मुख से सुगंध। |
| चुगली से विरत (जोड़ने वाली बातें) | अटूट मित्रता, दोस्त कभी साथ नहीं छोड़ते। |
| कटु वचन से विरत (मधुर वाणी) | प्रशंसा, कानों को केवल प्रिय शब्द सुनने मिलते हैं। |
| ज्ञानियों से प्रश्न पूछना (जिज्ञासा) | महाबुद्धिमान (महाप्रज्ञ), हर बात की गहरी समझ। |
| नशे-पते से विरत (होश) | तीक्ष्ण स्मृति, मानसिक संतुलन, कभी पागलपन नहीं आता। |

यह सूची पढ़कर आपको समझ आ गया होगा कि आपका वर्तमान जीवन आपके पिछले ‘ऑर्डर्स’ का नतीजा है। और आपका आने वाला कल, आपके ‘आज’ के ऑर्डर्स पर निर्भर है।
आईयें, अब कर्म को थोड़ी और गहराई से समझें, उसकी वास्तविक जटिलता और विविधता के साथ।