
कर्म के विरोधाभास और मुक्ति
इसलिए सुनते हुए अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
और इसे अपनी सुविधा और गति से धीरे-धीरे पढ़ें।)
एक परेशान करने वाला प्रश्न उठता है: “दुनिया में बुरे लोगों के साथ अच्छा क्यों होता है और अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों?”
लोग अक्सर शिकायत करते हैं: “देखो, वह आदमी इतना बेईमान और भ्रष्ट है, फिर भी महलों में मजे कर रहा है। और वह दूसरा आदमी इतना ईमानदार है, फिर भी ठोकरें खा रहा है। कर्म-वर्म सब झूठ है!”
भगवान बुद्ध महाकम्मविभंग सुत्त में इस भ्रम को दूर करते हैं। वे कहते हैं कि हम गलती इसलिए करते हैं क्योंकि हम कर्म को ‘इंस्टेंट कॉफी’ की तरह समझते हैं—अभी किया, अभी मिला। जबकि कर्म ‘खेती’ की तरह है।
इसे ऐसे समझें:

जो बेईमान व्यक्ति आज मजे कर रहा है, वह अपनी आज की बेईमानी का फल नहीं खा रहा। वह अपने अतीत (शायद पिछले जन्म) के किसी महान पुण्य (आम के पुराने वृक्ष) का फल खा रहा है।
चेतावनी: वह अभी जो बेईमानी के बीज बो रहा है, वे जमीन के नीचे पक रहे हैं। जब पुराने ‘आम’ खत्म होंगे, और यह नई ‘कंटीली फसल’ तैयार होगी—तब जो पतन होगा, वह भयानक होगा।
पापी भी सौभाग्य देखता है,
जब तक पाप पकता नहीं।
किंतु जब पाप पक जाता है,
तब पापी दुर्भाग्य देखता है।”—धम्मपद पापवग्गो ११९
जो ईमानदार व्यक्ति आज दुख भोग रहा है, वह अपनी ईमानदारी की सजा नहीं भुगत रहा। वह अपने अतीत के किसी अकुशल कर्म का पुराना ‘कड़वा फल’ खा रहा है।
आशा: वह अभी जो ईमानदारी के बीज बो रहा है, वे भविष्य के लिए एक विशाल और सुखद फसल तैयार कर रहे हैं।
भला (व्यक्ति) भी दुर्भाग्य देखता है,
जब तक भलाई पकती नहीं।
किंतु जब भलाई पक जाती है,
तब भला सौभाग्य देखता है।”—धम्मपद पापवग्गो १२०
इसलिए, “समय-अंतराल को समझें। आज की फसल देखकर आज के बीज का अनुमान न लगाएं।
अक्सर लोग कर्म को बहुत ही सरल मान लेते हैं। ऐसा मानने की भूल न करें कि “जैसा बोओगे, वैसा पाओगे” या “सभी पुण्यशाली हमेशा १००% गारंटी के साथ स्वर्ग ही जाते हैं, जबकि सभी पापी नर्क ही।”
याद रखें कि कर्म कोई सीधी रेखा में काम नहीं करता। भगवान बुद्ध महाकम्मविभंग सुत्त में कर्म की जटिलता को उजागर करते हुए चार स्थितियां बताते हैं:
जी हाँ! ऐसा कभी-कभी होता है। भगवान इसके पीछे का सूक्ष्म कारण उजागर करते हैं। मृत्यु के बाद का अगला जन्म केवल ‘अंतिम रसीद’ पर निर्भर नहीं होता, बल्कि ‘खाते के शेष’ और ‘मृत्यु के समय की मति’ पर निर्भर करता है।
जिस पापी की सद्गति हुई—
जिस भले व्यक्ति की दुर्गति हुई—
इसलिए, कभी भी किसी को देखकर यह ‘जज’ न करें कि “यह तो नरक ही जाएगा” या “यह तो बुद्ध ही बनेगा”। कर्म का जाल बहुत गहरा है। हमें बस अपने वर्तमान को शुद्ध रखने की जिम्मेदारी लेनी है।
आजकल कई “न्यू एज” गुरु और किताबें एक नया ‘लॉलीपॉप’ बेच रहे हैं। वे कहते हैं— “हम आपको ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य बताते हैं!”
उनका कहना है: “आपको जो चाहिए—सुंदरता, पैसा, बंगला—बस आंखें बंद करो और शिद्दत से ‘ब्रह्मांड’ से मांगो। भावुक होकर कल्पना करो कि वो चीज आपको मिल गई है। बस! फिर देखिए, ब्रह्मांड कैसे अलादीन के जिन्न की तरह आपकी विश पूरी करने में लग जाता है।” (मानो ब्रह्मांड कोई ‘डिलीवरी बॉय’ हो, जो आपके ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है!)
दूसरी तरफ, हमारे धर्मों में भी ‘शॉर्टकट’ की कमी नहीं है। कहा जाता है कि बस फलां पूजा करवा लो, फलां बाबा के पैर छू लो, या मरने के बाद फलां मंत्र बुलवा लो—तो सारे पाप धुल जाएंगे और सीधे वीआईपी एंट्री के साथ स्वर्ग मिलेगा।
लेकिन क्या कुदरत के नियम इतने सस्ते हैं? क्या वाकई केवल ‘चाहने’ या ‘प्रार्थना करने’ से कर्म का फल बदल सकता है?
भगवान बुद्ध (असिबंधकपुत्त सुत्त : संयुक्तनिकाय ४२.६) में गांव के एक मुखिया को इसका उत्तर एक बहुत ही तार्किक उदाहरण से देते हैं।
बुद्ध पूछते हैं: “मुखिया! मान लो एक आदमी एक भारी चट्टान को गहरे तालाब में फेंक दे। चट्टान डूबकर तल में बैठ जाती है। अब अगर बहुत से पुजारी और भीड़ किनारे पर आ जाए और हाथ जोड़कर पूरी शिद्दत से प्रार्थना करें— ‘हे चट्टान! ऊपर आ जाओ! हे प्यारी चट्टान! पानी पर तैरने लगो!’ तो क्या उनकी प्रार्थनाओं और कामनाओं से वह चट्टान पानी पर तैरेगी?”
मुखिया ने झेंपते हुए कहा: “नहीं भन्ते! वे (हजार साल भी) प्रार्थना करें, कामना करें, चट्टान तो नहीं तैरेगी। यह असंभव है।”
बुद्ध ने फिर पूछा: “अच्छा, मान लो वह आदमी तेल का घड़ा तालाब में डाल दे, जो फूटकर तेल ऊपर तैरने लगता है। अब अगर वही भीड़ प्रार्थना करे, रोए, और मनाए— ‘हे तेल! डूब जाओ! हे तेल! नीचे बैठ जाओ!’ तो क्या तेल डूब जाएगा?”
मुखिया ने कहा: “नहीं भन्ते, यह भी असंभव है।”
बुद्ध का निष्कर्ष: ठीक इसी तरह, तुम्हारे कर्म ही वह चट्टान या तेल हैं।

तुम्हें स्वयं तैरना सीखना होगा। कोई दूसरा तुम्हें तार नहीं सकता।
इस बात को और स्पष्ट करते हुए भगवान अनाथपिंडिक (गृहस्थ) से कहते हैं:
गृहस्थ! दुनिया में पाँच चीजें—आयु, सुंदरता, सुख, सफलता और स्वर्ग—सुलभ नहीं हैं। मैं कहता हूँ कि ये पाँचों चीजें न तो प्रार्थना से मिलती हैं और न ही कामना से। यदि वे प्रार्थना करने या कामना करने से मिल जातीं, तो यहाँ इस दुनिया में दुखी कौन होता? किसके पास किस चीज की कमी होती?
इसलिए आर्यश्रावक को चाहिए कि वह इनके लिए (निठल्ला बैठकर) प्रार्थना या कामना न करे। बल्कि वह उस ‘रास्ते’ (कर्म-पथ) पर चले जो इन चीजों की ओर ले जाता है। क्योंकि सही रास्ते पर चलने से ही उसे ये चीजें (आयु, सौंदर्य, सुख, सफलता या स्वर्ग) प्राप्त होंगी।
—इट्ठ सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ५:४३
आजकल कई ध्यान-साधकों और बौद्ध अनुयायियों में यह भ्रांति प्रचलित हो चुकी है कि— “हमें जो भी दुःख, दर्द या संवेदना महसूस होती है, वह हमारे पुराने कर्म-संस्कारों के कारण ही है।”
उनका मानना होता है कि यदि हम उस दर्द को समता (उपेक्खा) से देखते रहें, तो पुराने संस्कार ‘उखड़ते’ चले जाएंगे और हम शुद्ध हो जाएंगे।
लेकिन सावधान! भगवान बुद्ध देवदह सुत्त में स्पष्ट कहते हैं कि यह सिद्धांत बौद्ध नहीं, बल्कि जैन (निगंठ) सिद्धांत है।
उस समय जैन मुनि मानते थे कि कठोर तपस्या और शारीरिक कष्ट सहने से पुराने कर्म ‘जल’ जाते हैं। बुद्ध ने उनसे पूछा:
“मित्र, जब आप घंटों तक एक ही कष्टदायक मुद्रा में जबरदस्ती बैठते हैं या तप करते हैं, तो क्या आपको तीव्र पीड़ा होती है?”
उन्होंने कहा: “हाँ।”
बुद्ध ने पूछा: “और जब आप उस तपस्या को रोक देते हैं, तो क्या वह पीड़ा रुक जाती है?”
उन्होंने कहा: “हाँ।”
बुद्ध का निष्कर्ष: यदि वह पीड़ा वाकई ‘पुराने कर्मों’ के कारण होती, तो आपके बैठने या उठने से उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपना समय पूरा करके ही जाती। लेकिन चूँकि वह पीड़ा आपके ‘अभी जबरदस्ती बैठने’ से पैदा हो रही है और उठने से बंद हो रही है, तो इसका कारण ‘पूर्व-कर्म’ नहीं, बल्कि ‘वर्तमान-कर्म’ है।
बुद्ध कहते हैं कि हर संवेदना कर्म का फल नहीं होती। (सीवक सुत्त : संयुक्तनिकाय ३६.२१) में भगवान बताते हैं कि दुःख के ८ कारण होते हैं:
अतः यदि आप बीमार हैं या गलत तरीके से बैठकर घुटने तोड़ रहे हैं, और सोचते हैं कि “मेरा कर्म कट रहा है”, तो आप भ्रम में हैं। आप कर्म नहीं काट रहे, आप बस अपने शरीर को ‘वर्तमान’ में पीड़ा दे रहे हैं।
एक और बड़ी गलतफहमी है। कई साधक मानते हैं कि ‘उपेक्खा’ (समता) कर्म से परे की अंतिम अवस्था है।
परंतु बुद्ध याद दिलाते हैं कि जब तक आप प्रयास करके उपेक्षा बनाए रखते हैं, वह भी एक ‘संस्कार’ (रचित अवस्था) ही है। वह एक ‘कुशल’ संस्कार हो सकता है—जिसे आप ‘सोने की जंजीर’ कह सकते हैं—लेकिन वह भी भव-संसार में बांधे रखती है।
सच्चा कर्म-निरोध केवल ‘दांत भींचकर दर्द सहने’ या ‘जबरदस्ती शांत रहने’ से नहीं होता। वह ‘सम्यक समाधि’ और ‘प्रज्ञा’ से होता है—जब हम दर्द के असली स्वरूप को जान लेते हैं, और दर्द के साथ हमारा हस्तक्षेप पूरी तरह खत्म हो जाता है।
चाहे दर्द पुराने कर्मों से हो, या मौसम के बदलाव से, या किसी संयोग से—जब वह आता है, तो एक ज्ञानी (साधक) और अज्ञानी में क्या अंतर होता है?
भगवान बुद्ध (सल्लथ सुत्त : संयुक्तनिकाय ३६.६) में एक मर्मस्पर्शी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जब किसी साधारण व्यक्ति को दुख मिलता है, तो उसे दरअसल दो तीर लगते हैं।
बुद्ध कहते हैं:
भिक्षुओं! अज्ञानी व्यक्ति को जब पहला तीर (शारीरिक कष्ट) लगता है, तो वह रोता है, छाती पीटता है और सम्मोहित हो जाता है। इस प्रकार वह दूसरा तीर (मानसिक कष्ट) भी खा लेता है।
लेकिन श्रुतवान आर्यश्रावक (ज्ञानी) को जब पहला तीर लगता है, तो वह विलाप नहीं करता। वह जानता है कि यह अनित्य है। इसलिए उसे केवल एक ही तीर लगता है—शारीरिक, मानसिक नहीं।"
निष्कर्ष: कर्म का चक्र तब टूटता है जब हम अकुशल प्रतिक्रिया बंद कर देते हैं। जब कोई आपको गाली दे (पुराना कर्म / पहला तीर), और आप पलटकर गाली न दें, बल्कि मुस्करा दें (दूसरा तीर नहीं चलाया)—तो आपने उस कर्म की जंजीर को वहीं तोड़ दिया। वह गूंज अब आगे नहीं जाएगी।
तो क्या हम बस जन्म-जन्म तक “अच्छे कर्म” करके स्वर्ग और “बुरे कर्म” करके नरक—इसी चक्र में घूमते रहेंगे? क्या इसका कोई अंत नहीं है?
यही वह बिंदु है जो बुद्ध के धम्म को दुनिया के बाकी सभी धर्मों से अलग करता है। बाकी धर्म कहते हैं: “पुण्य करो, स्वर्ग जाओ।” बुद्ध कहते हैं: “स्वर्ग भी अनित्य है। वहां से फिर गिरते हैं।”
इसलिए भगवान (कम्म सुत्त : अंगुत्तरनिकाय ४.२३२ में) चार प्रकार के कर्म बताते हैं:
| कर्म का प्रकार | रंग | परिणाम | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| १. काला कर्म | पाप | नरक या दुःख | हिंसा, चोरी, नफरत। |
| २. सफेद कर्म | पुण्य | स्वर्ग या सुख | दान, शील, भावना। |
| ३. काला-सफेद कर्म | मिश्रित | मनुष्य जीवन (सुख-दुःख दोनों) | आम गृहस्थ जीवन। |
| ४. न-काला-न-सफेद कर्म | मुक्ति | कर्मों का अंत | आर्य अष्टांगिक मार्ग |
याद रखें, लोहे की जंजीर (पाप) भी बांधती है और सोने की जंजीर (पुण्य) भी बांधती है। चौथा कर्म—यानी आर्य अष्टांगिक मार्ग—वह तेजाब है जो इन दोनों जंजीरों को गला देता है। एक अरहंत न पुण्य करता है, न पाप। वह जो भी करता है, वह ‘क्रिया’ मात्र होती है। उसका कोई बीज नहीं बनता, इसलिए उसका कोई नया जन्म नहीं होता। यही निर्वाण है।
इस पूरी मार्गदर्शिका का सार यही है कि कर्म का सिद्धांत आपको डराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है। यह आपको याद दिलाने के लिए है कि आप एक ‘पीड़ित’ नहीं हैं।
आप एक किसान हैं, और आपका मन वह खेत है। या आप एक वास्तुकार हैं, और आपका जीवन वह भवन है जिसे आप ईंट-दर-ईंट (कर्म-दर-कर्म) बना रहे हैं। तो उठिए, अपनी छेनी उठाइये। भाग्य की लकीरें पत्थर पर नहीं, गीली मिट्टी पर हैं। और आप अभी, इसी वक्त, उन्हें बदल रहे हैं।
"सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा,
सचित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान सासनं।"— धम्मपद बुद्धवग्गो १८३
अर्थात,
