✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— गोतम बुद्ध —
जाति | गिही | नेक्खम्म | तप | मग्ग | बुद्धत्त | पच्छा

संबोधि के पश्चात

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ९ मिनट
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युगों से चला आ रहा महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जिस ‘मार’ ने देवताओं तक को अपने पाश में बांध रखा था, वह परास्त हो चुका था। अविद्या का घना कोहरा छंट चुका था और उरुवेला के वनों में अब केवल एक ही स्वर गूँज रहा था—परम शांति।

कल्पना कीजिये उस क्षण की। जब कोई व्यक्ति संसार और अस्तित्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर, उसके भी आगे निकल जाए; जब वह ‘त्रिलोक’ (तीनों लोकों) को लांघकर ‘लोकोत्तर’ हो जाए, तो उसके भीतर क्या शेष रहता है? क्या विजय का अहंकार?

नहीं। बोधि वह अग्नि है जिसमें अहंकार सबसे पहले पिघलता है।

उस परम उपलब्धि के क्षण में, भगवान के मन में एक ऐसा विचार आया जो उनकी विनम्रता की पराकाष्ठा को दर्शाता है। उस सन्नाटे में उन्होंने सोचा—“बिना किसी श्रद्धा-स्थान के, बिना किसी गुरु के आदर में झुके जीना कठिन है। मैं किसके सम्मान में झुकूँ?”

जरा सोचिए! स्वयं परममुक्त ‘सत्था देवमनुस्सानं’ (देवताओं और मनुष्यों के गुरु) भी सम्मान करने के लिए किसी की खोज कर रहे थे।

उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से ब्रह्मांड का कोना-कोना देखा कि क्या कोई ऐसा सत्व है जो शील, समाधि, प्रज्ञा या विमुक्ति में उनसे श्रेष्ठ हो? और, अंत में उन्हें वह मिल ही गया, जिसके आगे स्वयं बुद्ध भी अपना सिर झुका सकते थे। आइए, जानते हैं इस रहस्य को।

उस समय बुद्ध भगवान उरूवेला में नेरञ्जरा नदी के किनारे बोधिवृक्ष के नीचे, बस अभी बुद्धत्व प्राप्त किए थे। वहाँ भगवान उस बोधिवृक्ष के नीचे एक सप्ताह तक एक आसन से बैठकर विमुक्ति सुख का निरंतर अनुभव करते रहे…

एक सप्ताह बीतने पर, भगवान उस समाधि से उठकर, बोधिवृक्ष के नीचे से ‘अजपाल’ नामक वटवृक्ष के नीचे गए। वहाँ जाकर, वे अजपाल वटवृक्ष के तले एक सप्ताह तक एक आसन से बैठकर विमुक्ति सुख का निरंतर अनुभव करते रहे…

तब एकांतवास में उनके चित्त में विचार उठे, “(किसी ज्येष्ठ के प्रति) गौरव और आदर-सम्मान के बिना रहना दुःखदायी है। मैं किस श्रमण-ब्राह्मण का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसके निश्रय में रहूँ?”

तब उन्हें लगा, “अपने अपरिपूर्ण शील-स्कन्ध को पूर्ण करने के लिए, मुझे किसी श्रमण-ब्राह्मण का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसके निश्रय में रहना चाहिए।

किन्तु, देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण-ब्राह्मण पीढ़ियाँ, शासक और जनता से भरे इस लोक में, मैं किसी अन्य श्रमण-ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जो मुझसे अधिक शील-संपन्न हो, जिसका मैं आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसके निश्रय में रह सकता हूँ।

और, अपने अपरिपूर्ण समाधि-स्कन्ध… प्रज्ञा-स्कन्ध… विमुक्ति-स्कन्ध… विमुक्ति ज्ञानदर्शन को पूर्ण करने के लिए, मुझे किसी श्रमण-ब्राह्मण का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसके निश्रय में रहना चाहिए।

किन्तु, देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण-ब्राह्मण पीढ़ियाँ, शासक और जनता से भरे इस लोक में, मैं किसी अन्य श्रमण-ब्राह्मण को नहीं देखता हूँ, जो मुझसे अधिक समाधि-संपन्न… प्रज्ञा-संपन्न… विमुक्ति-संपन्न… विमुक्ति ज्ञानदर्शन-संपन्न हो, जिसका मैं आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसके निश्रय में रह सकता हूँ।

क्यों न मैं उसी “धम्म” का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसका निश्रय लेकर रहूँ, जिससे मुझे अभी संबोधि मिली?”

और, सहम्पति ब्रह्मा ने भगवान के चित्त में चल रहे तर्क-वितर्क को जान लिया। तब, जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी समेटी हुई बाह को पसार दे, या पसारी हुई बाह को समेट ले, उसी तरह, सहम्पति ब्रह्मा ब्रह्मलोक से विलुप्त हुआ और भगवान के समक्ष प्रकट हुआ। उस सहम्पति ब्रह्मा ने बाहरी वस्त्र को एक कंधे पर कर, दाएँ घुटने को भूमि पर टिकाकर, हाथ जोड़कर भगवान से कहा—

“ऐसा ही होता है, भगवान! ऐसा ही होता है, सुगत!

जितने ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ अतीतकाल में हुए, वे भी उसी धर्म का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसका निश्रय लेकर रहें, जिससे उन्हें संबोधि मिली थी।

जितने ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ भविष्यकाल में होंगे, वे भी उसी धर्म का आदर-सम्मान और सत्कार करते हुए, उसका निश्रय लेकर रहेंगे, जिससे उन्हें संबोधि मिलेगी।

और भगवान, जो अभी वर्तमान में ‘अर्हंत सम्यक-सम्बुद्ध’ है, वे भी उसी धर्म का आदर-सम्मान और सत्कार कर, उसका निश्रय लेकर रहे, जिससे उन्हें संबोधि मिली है।”

ऐसा सहम्पति ब्रह्मा ने कहा। ऐसा कहकर उसने आगे कहा,

अतीत के सम्बुद्ध हो,
या भविष्यकाल के बुद्ध,
या हो बहुजन के शोक-नाशक,
वर्तमान के बुद्ध,
सब गौरव करते सद्धर्म का
— यही बुद्धों की धर्मता!

अतः जो स्वयं की भलाई चाहे,
रखता लक्ष्य महान,
वह भी गौरव करें सद्धर्म का,
याद रख बुद्ध शासन।

— संयुत्तनिकाय ६:२ : गारव सुत्त

इसी ‘धम्म-गौरव’ के साथ, भगवान ने बोधिवृक्ष के आसपास सात सप्ताह (४९ दिन) तक केवल विमुक्ति-सुख का निरंतर अनुभव किया। उन ४९ दिनों का मौन विश्राम भी था, और उस अमृत-वर्षा की तैयारी भी, जो जल्द ही पूरी दुनिया को भिगोने वाली थी।

बुद्ध ‘कौन’ या ‘क्या’ थे?

इतिहास अक्सर पूछता है—“बुद्ध कौन थे?” हम रटा-रटाया उत्तर देते हैं—शुद्धोधन के पुत्र, शाक्य कुल के श्रमण, सिद्धार्थ गोतम।

लेकिन एक गहरे तल पर, असली प्रश्न ‘कौन’ का नहीं, बल्कि ‘क्या’ का है।

संबोधि के उस ब्रह्मांड को कंपा देने वाले विस्फोट के बाद, क्या पुराने सिद्धार्थ की रत्ती भर भी राख बची थी? नहीं। वह ‘व्यक्ति’ पूरी तरह मिट चुका था। अब जो उस देह में शेष था, वह अस्तित्व की किसी भी ज्ञात श्रेणी में नहीं आता था।

अतः जिज्ञासा उठना स्वाभाविक है—क्या वे भगवान थे? क्या वे देवता बन चुके थे? क्या वे ब्रह्मा बन चुके थे? अथवा केवल एक ज्ञानी मनुष्य?

एक बार दोण नामक ब्राह्मण ने बुद्ध के पदचिह्नों में ‘चक्र’ और अन्य महापुरुष लक्षण देखे। वह विस्मित होकर उनके पास गया। उसका यही प्रश्न और बुद्ध का गहरा उत्तर, इस रहस्य पर से पर्दा हटाता है।

एक समय द्रोण नामक ब्राह्मण उक्कट्ठ से सेतब्य के बीच यात्रा कर रहा था। तब उसे मार्ग पर किसी के पदचिह्न दिखे, जिसमें चक्र मौजूद थे — हजार तीली के साथ, नेमी के साथ, नाभी के साथ, अपने सम्पूर्ण आकार की परिपूर्णता के साथ!

उसे लगा, “आश्चर्य हैं! अद्भुत हैं! ये पदचिन्ह मानव के नहीं हैं!”

तब उसने उन पदचिन्हों का पीछा किया, जो रास्ते से होकर उपवन की ओर गए। उनका अनुसरण करते हुए, वह एक पेड़ के तले जा पहुँचा, जहाँ कोई पालथी मार, काया सीधी रख, स्मृतिमान बैठा था — प्रसन्न मुद्रा, विस्मयकारी रूप, श्रद्धाजनक, प्रशान्त इंद्रिय, प्रशान्त चित्त, संपूर्ण आत्मवश, असीम निश्चलता, संरक्षित इंद्रिय, उन पर परम नियंत्रण और संयम, सर्वश्रेष्ठ!

ब्राह्मण द्रोण उनके पास गया और पूछा, “महाशय, क्या आप देवता है?”

“नहीं, ब्राह्मण, मैं देवता नहीं हूँ!”

“तब, क्या आप गंधर्व है?”

“नहीं, ब्राह्मण, मैं गंधर्व नहीं हूँ!”

“तब, क्या आप यक्ष है?”

“नहीं, ब्राह्मण, मैं यक्ष नहीं हूँ!”

“तब, क्या आप मनुष्य है?”

“नहीं, ब्राह्मण, मैं मनुष्य नहीं हूँ!”

“जब आप देवता नहीं है, गंधर्व नहीं है, यक्ष नहीं है, मनुष्य नहीं है, तब भला आप किस तरह के सत्व है?”

“ब्राह्मण! जिस आस्रव का त्याग न करने से मैं देवता बनता, उसे मैंने त्याग दिया है, जड़ से उखाड़ दिया है, जिसकी पुनरुत्पत्ति संभव नहीं है।

जिस आस्रव का त्याग न करने से मैं गंधर्व बनता… यक्ष बनता… मनुष्य बनता, उसे मैंने त्याग दिया है, जड़ से उखाड़ दिया है, जिसकी पुनरुत्पत्ति संभव नहीं है।

जैसे कोई नीलकमल या श्वेतकमल जल में पैदा होता है, जल में बढ़ता है, और जल से ऊपर उठकर जल से अलिप्त रहता है। उसी तरह, मैं इस लोक में पैदा हुआ, इस लोक में पला-बढ़ा, और इस लोक को हराकर लोक से अलिप्त रहता हूँ।”

ब्राह्मण, मुझे ‘बुद्ध’ कर के स्मरण रखो।

जिस आस्रव से दैवत्व पाता,
या अंतरिक्षगामि गन्धब्ब बनता,
यक्षावस्था या मनुष्यत्व पाता,
आस्रव वे सभी,
नष्ट हुए मुझसे,
पूरी तरह विनष्ट कर,
मूल से काटे गए।
जैसे उगता नीलकमल,
जल से अलिप्त रहे,
अलिप्त हूँ इस लोक में,
अतः ब्राह्मण, मैं बुद्ध हूँ!

— अंगुत्तरनिकाय ४:३६ : दोण सुत्त

उस जागृत महामानव बुद्ध को, उस भगवान अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध को हमारा शत-शत नमन!

महायात्रा का आरंभ

कमल खिल चुका था। अब उस सुगंध को हवाओं के विपरीत भी फैलना था।

यहाँ से शुरू हुआ ४५ वर्षों का एक ऐसा महाअभियान, जिसने केवल भारतवर्ष ही नहीं, बल्कि मानव-चेतना के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।

उन्होंने किसी को अपना ‘भक्त’ नहीं बनाया, बल्कि हर व्यक्ति को ‘अत्त दीपो भव’ (अपना प्रकाश/द्वीप स्वयं बनो) का मंत्र देकर स्वतंत्र किया। उन्होंने कोई नया ‘पंथ’ नहीं रचा, बल्कि उस सनातन नियम (धम्म) से धूल हटाई जो सदा से यहीं था।

उन्होंने जीवन पर्यंत संसार के कोलाहल के बीच अमृत का नगाड़ा (अमतदुन्दुभि) बजाया, ताकि जो जागने को तैयार हैं, वे जाग सकें।

आगे क्या पढ़ें?

उस महान यात्रा और अद्भुत घटनाओं का विस्तृत विवरण आप यहाँ इस अलग अध्याय में पढ़ सकते हैं:

📽️ संघ कथा - भाग एक

भगवान धम्म को किस प्रकार उजागर करते थे, इसका सजीव चित्रण आप उनके ही शब्दों में यहाँ पढ़ सकते हैं:

📽️ 🪔 बुद्ध का धर्म प्रवचन

भगवान को निकटता से जानने के लिए, उनके जीवन के अंतिम चरण और अंतिम उपदेशों को सुनना आवश्यक है। यह सूत्र त्रिपिटक का सबसे लंबा अवश्य है, लेकिन यह आपको सीधे बुद्ध के अंतिम क्षणों के साक्षी होने का अवसर देता है।

🪔 महापरिनिर्वाण सूत्र