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यह वह क्षण था जब राजकुमार सिद्धार्थ ‘बोधिसत्व’ बनने की राह पर अग्रसर हुए।
सदियों बाद लिखी गई कहानियों (अट्ठकथाओं) ने इस घटना को एक नाटकीय रूप दे दिया—कि सिद्धार्थ रात के अंधेरे में, अपनी पत्नी और पुत्र को सोता हुआ छोड़कर, बिना किसी को बताए चुपचाप महल से निकल गए।
किन्तु, प्रारंभिक सूत्र एक अलग और अधिक कठोर सत्य बयां करते हैं।
यह कोई ‘गुप्त पलायन’ नहीं था। यह एक ‘खुली घोषणा’ थी। बुद्ध स्वयं बताते हैं कि उन्होंने अपने माता-पिता को रोते-बिलखते और अश्रुपूरित नेत्रों के बीच छोड़ा। यह एक सार्वजनिक और सचेत निर्णय था। उन्होंने अपने परिवार के मोह को कायरता से नहीं, बल्कि एक भारी हृदय और दृढ़ संकल्प के साथ त्यागा था।
सिर-दाढ़ी मुंडवाकर और काषाय वस्त्र धारण कर, उन्होंने ‘गोतम’ नाम से संन्यास ग्रहण किया। काया, वाणी और मन से बुरे कर्मों का त्याग कर, उन्होंने अपनी आजीविका को पूर्णतः शुद्ध कर लिया।
शाक्य जनपद की राजधानी कपिलवस्तु को त्यागकर वे दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। गंडक नदी के किनारे-किनारे, मल्ल, वज्जि और लिच्छवियों के गणराज्यों से गुजरते हुए वे अंततः मगध की राजधानी राजगृह पहुँचे।
इतिहास का एक अद्भुत संयोग देखिये—जिस रास्ते पर चलकर २९ वर्ष का यह युवक ‘सत्य’ खोजने निकला था, ठीक ५२ वर्षों बाद, ८० वर्ष की आयु में, वे उसी रास्ते पर विपरीत दिशा में चलकर अपनी अंतिम यात्रा (महापरिनिर्वाण) के लिए कुशीनगर लौटे। मानो जीवन का चक्र पूर्ण हुआ हो।
राजगृह में जब वे भिक्षाटन कर रहे थे, तो मगध नरेश सेनिय बिम्बिसार की दृष्टि उन पर पड़ी। एक भिखारी, जिसके चेहरे पर चक्रवर्ती राजा का तेज हो! बिम्बिसार हतप्रभ रह गए। उन्होंने अपने गुप्तचरों को भेजा और बाद में स्वयं पाण्डव गुफा जाकर उनसे भेंट की। राजा ने उन्हें अपना आधा राज्य देने की पेशकश की, किन्तु जिसका लक्ष्य ‘अनंत’ हो, उसे ‘राज्य’ कैसे लुभा सकता था? सिद्धार्थ आगे बढ़ गए।
सिद्धार्थ एक अन्वेषक थे। उनकी खोजशैली पूरी तरह वैज्ञानिक और प्रयोगात्मक थी। वे किसी भी विधि को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं करते थे। वे उसे आजमाते, परिणामों का मूल्यांकन करते, और यदि वह परिणाम ‘दुःख-मुक्ति’ की कसौटी पर खरा न उतरता, तो उसे त्याग देते।
उस समय के दो सबसे महान आध्यात्मिक गुरु थे—आळार कालाम और उद्दक रामपुत्त। सिद्धार्थ ने उनकी शरण ली।

प्रथम गुरु: आळार कालाम
इस तरह प्रवज्ज्यित होकर—कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में—मैं आळार कालाम के पास गया, और जाकर कहा, ‘मित्र कालाम, मुझे इस धम्म-विनय में ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा है।’
ऐसा कहे जाने पर आळार कालाम ने कहा, ‘यहीं रहिए, आयुष्मान। यह ऐसा धम्म है कि कोई समझदार पुरुष जल्द ही अपने आचार्य के ज्ञान का स्वयं प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर विहार कर सकता है।’
तब बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का अध्ययन कर लिया। जहाँ तक होठों से पठन और रटकर दोहराने की बात थी, मैं और दूसरे भी ऐसे ज्ञान के सिद्धान्त, और वरिष्ठों के सिद्धान्त को ‘जानता हूँ, देखता हूँ’ का दावा करते थे।
किन्तु तब मुझे लगा, ‘यह आळार कालाम इस धम्म के प्रति केवल श्रद्धा मात्र से ही प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा नहीं करता। अवश्य ही वह वाकई इस धम्म को जानते हुए और देखते हुए विहार करता है।’
तब मैं आळार कालाम के पास गया, और जाकर कहा, ‘मित्र कालाम, तुम इस धम्म में कहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार कर घोषणा करते हो?’
ऐसा कहे जाने पर आळार कालाम ने सूने आयाम (“आकिञ्चञ्ञायतन”) की घोषणा की।
तब मुझे लगा, ‘केवल आळार कालाम में ही श्रद्धा नहीं, मुझमें भी श्रद्धा है। केवल उस में ही वीर्य नहीं, मुझमें भी वीर्य है। केवल उस में ही स्मृति नहीं, मुझमें भी स्मृति है। केवल उस में ही समाधि नहीं, मुझमें भी समाधि है। केवल उस में ही प्रज्ञा नहीं, मुझमें भी प्रज्ञा है। क्यों न मैं भी उस धम्म का साक्षात्कार करने का प्रयास करूँ, जिस धम्म को आळार कालाम प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता है।’
और बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने लगा। तब मैं आळार कालाम के पास गया, और जाकर कहा, ‘मित्र कालाम, क्या तुम इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो? मैं भी, मित्र कालाम, इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ।’
(तो वह कह पड़ा:) ‘हम भाग्यशाली हैं, मित्र! हम सौभाग्यशाली हैं, मित्र! जो मैंने तुम जैसे आयुष्मान सब्रह्मचारी को देखा! जिस तरह मैं इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ, उसी तरह तुम भी इस धम्म में प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो। मैं इस धम्म को जिस तरह जानता हूँ, तुम भी उस धम्म को उसी तरह जानते हो। तुम इस धम्म को जिस तरह जानते हो, मैं भी उस धम्म को उसी तरह जानता हूँ। जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम हो। और जैसे तुम हो, वैसा ही मैं हूँ। आओ, मेरे मित्र, हम दोनों अब इस समुदाय को चलाएँ।’
इस तरह मेरे आचार्य आळार कालाम ने मुझे, अपने शिष्य को, अपने स्वयं के स्तर पर रखा और अत्याधिक सम्मानित करते हुए पूजा।
किन्तु मुझे लगा, ‘यह धम्म न मोहभंग, न विराग, न निरोध, न प्रशांति, न प्रत्यक्ष ज्ञान, न संबोधि, और न ही निर्वाण की ओर ले जाता है। बल्कि वह केवल ‘सूने आयाम में पुनरुत्पत्ति’ की ओर ले जाता है।’ इस तरह उस धम्म को अनुपयुक्त पाकर, उस धम्म से मोहभंग होने पर, मैं चला गया।
द्वितीय गुरु: उदक रामपुत्त
इस तरह, कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में—मैं उदक रामपुत्त के पास गया। और जाकर कहा, ‘मित्र राम, मुझे इस धम्म-विनय में ब्रह्मचर्य पालन करने की इच्छा है।’
…ऐसा कहे जाने पर उदक रामपुत्त ने न-संज्ञा न-असंज्ञा आयाम (“नेवसञ्ञानासञ्ञायतन”) की घोषणा की…
…और वहाँ भी बहुत समय नहीं बीता, जल्द ही मैंने उस धम्म का प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने लगा…
तब मैं उदक रामपुत्त के पास गया, और जाकर कहा, ‘मित्र राम, क्या तुम इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करते हो? मैं भी, मित्र राम, इस धम्म में यहाँ-यहाँ तक प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कर विहार करने की घोषणा करता हूँ।’
(तो वह भी कह पड़ा:) ‘हम भाग्यशाली हैं, मित्र! हम सौभाग्यशाली हैं, मित्र! जो मैंने तुम जैसे आयुष्मान सब्रह्मचारी को देखा… जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम हो। और जैसे तुम हो, वैसा ही मैं हूँ। आओ, मेरे मित्र, हम दोनों अब इस समुदाय को चलाएँ।’
इस तरह मेरे आचार्य उदक रामपुत्त ने मुझे, अपने शिष्य को, अपने स्वयं के स्तर पर रखा और अत्याधिक सम्मानित करते हुए पूजा।
किन्तु मुझे लगा, ‘यह धम्म न मोहभंग, न विराग, न निरोध, न प्रशांति, न प्रत्यक्ष ज्ञान, न संबोधि, और न ही निर्वाण की ओर ले जाता है। बल्कि वह केवल ‘न संज्ञा न ही असंज्ञा आयाम में पुनरुत्पत्ति’ की ओर ले जाता है।’ इस तरह उस धम्म को अनुपयुक्त पाकर, उस धम्म से मोहभंग होने पर, मैं चला गया।
यह एक क्रांतिकारी क्षण था। उस समय दुनिया जिसे ‘मोक्ष’ मानती थी (उच्च समाधि अवस्थाएँ), सिद्धार्थ ने उसे ‘अपर्याप्त’ कहकर खारिज कर दिया।
उन्होंने देखा कि ये ध्यान की अवस्थाएँ मन को शांति तो देती हैं, लेकिन पुनर्जन्म के चक्र को नहीं तोड़तीं। व्यक्ति समाधि में तो शांत रहता है, लेकिन बाहर आते ही विकार वापस आ जाते हैं।
उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए था; उन्हें ‘मुक्ति’ चाहिए थी।
सिद्धार्थ ने सभी गुरुओं को छोड़ दिया। अब वे अकेले थे। न कोई नक्शा, न कोई साथी। केवल एक संकल्प कि उन्हें ऐसा आयाम खोजना है जो अजन्मा हो, अजर हो, और अमर हो।
और इस प्रकार शुरू हुआ इतिहास का सबसे कठिन अध्याय—जहाँ एक मनुष्य ने अपने शरीर को मिटा देने की हद तक जाकर सत्य को ललकारा।