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पच्छा

भारत के इतिहास ने हमें कई राजा दिए, कई योद्धा दिए, और कई दार्शनिक दिए। किन्तु ‘तथागत’ केवल एक ही दिया।
आज, हमने उन्हें सोने के मंदिरों में सजा दिया है। हम उनकी पत्थर की मूरतों के आगे अगरबत्तियाँ जलाते हैं और उनके शांत चेहरे में शांति ढूँढते हैं। लेकिन इस पूजा-पाठ के शोर में, हम उस मनुष्य को भूल गए हैं जिसने कभी इसी धरती की धूल पर नंगे पाँव चलकर इतिहास का रुख मोड़ दिया था।
हमें बचपन से कहानियाँ सुनाई गईं—कि राजकुमार सिद्धार्थ एक रात चुपचाप अपनी पत्नी और नवजात शिशु को सोता हुआ छोड़कर ‘भाग’ गए थे। हमें बताया गया कि वे दुनिया के दुःखों से घबरा गए थे।
लेकिन क्या यह सच है?
क्या एक कायर, जो अपने परिवार से भाग रहा हो, वह अकेले ही मृत्यु की आँखों में आँखें डालकर ‘अमृत’ छीन सकता है? क्या एक पलायनवादी व्यक्ति उस धम्म की नींव रख सकता है जो २६०० वर्षों तक करोड़ों लोगों को जीने का सहारा दे?
नहीं। यह पलायन नहीं था। यह एक महायुद्ध की तैयारी थी।
सत्य तो यह है कि सदियों की धूल ने उस असली चेहरे को ढक दिया है। कवियों और कलाकारों ने उन्हें इतना ‘अलौकिक’ बना दिया कि वे हमारे लिए ‘पराए’ हो गए। लेकिन प्रारंभिक सूत्र हमें एक अलग ही कहानी सुनाते हैं।
वहाँ कोई जादू नहीं है। वहाँ कोई सोती हुई पत्नी से छुपकर भागने वाला डरपोक राजकुमार नहीं है।
वहाँ एक योद्धा है। एक ऐसा संवेदनशील युवा, जिसने देखा कि जिस महल में वह रह रहा है, वह जल रहा है—बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु की आग में। और उसने निर्णय लिया कि वह तब तक नहीं रुकेगा, जब तक इस आग को बुझाने का पानी—‘निर्वाण’—न खोज ले।
यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने हमारे लिए ‘मनुष्य’ होने की सीमाओं को तोड़ दिया। और सबसे सौभाग्य की बात यह है कि यह कहानी किसी और की जुबानी नहीं, बल्कि स्वयं उनके अपने शब्दों में है।
आइए, किंवदंतियों को पीछे छोड़ें। और, उस धूल भरे रास्ते पर चलें जहाँ लुम्बिनी के शाल वृक्षों के नीचे एक नए युग का सूर्योदय होने वाला है।