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पच्छा

शरीर के दमन का मार्ग व्यर्थ सिद्ध हो चुका था। अब सिद्धार्थ ने एक नई दिशा पकड़ी।
यह दिशा थी—चित्त की साधना। उन्होंने अन्न ग्रहण करना शुरू किया ताकि ध्यान के लिए शरीर में प्राण बचे रहें। अब उनका संघर्ष ‘शरीर’ से नहीं, बल्कि ‘मन’ की गहराइयों से था।
यह इतिहास का वह क्षण था जब धर्म, ‘कर्मकांड’ से निकलकर ‘मनोविज्ञान’ में बदल रहा था। सिद्धार्थ ने अपने मन को एक वैज्ञानिक की तरह देखना शुरू किया।
उन्होंने अपने विचारों को बहने नहीं दिया, बल्कि उनका विश्लेषण किया। उन्होंने विचारों को दो श्रेणियों में बांटा—एक वे जो विनाश की ओर ले जाते हैं (अकुशल), और दूसरे वे जो विकास की ओर ले जाते हैं (कुशल)।
जो व्यक्ति जिस तरह सोचता है, वही उसके चित्त का झुकाव बनता है… और वह कुशल अथवा अकुशल दिशा में झुकते चले जाता है।
जब भी कामुक या हिंसक विचार आते, वे उन्हें दबाते नहीं, बल्कि उनके खतरनाक परिणामों को देखकर उन्हें त्याग देते। और जब करुणा या त्याग के विचार आते, तो उन्हें हवा देते। धीरे-धीरे, जंगल का वह खूंखार जानवर जिसे ‘मन’ कहते हैं, पालतू और शांत होने लगा।
जब मन पूरी तरह एकाग्र हो गया, तो उसके भीतर छिपी असीम शक्तियाँ जाग उठीं।
आज के तर्कप्रधान युग में ये बातें अतिशयोक्ति लग सकती हैं, लेकिन प्राचीन भारत के योग-विज्ञान में यह माना जाता था कि चेतना जब लेजर की तरह एक बिंदु पर टिक जाती है, तो वह भौतिक नियमों को भी भेद सकती है।
सिद्धार्थ ने उन मानसिक शक्तियों (ऋद्धियों) का अनुभव किया जो सामान्य मानवीय सीमाओं से परे थीं।
तब, मैंने पाँच धर्मों को विकसित किया, जो ऋद्धिबलों के द्योतक हैं। कौन-से पाँच?
- चाह और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल,
- वीर्य और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल,
- चित्त और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल,
- विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल,
- और पाँचवा, केवल अतिउत्साह।
ऋद्धियाँ
जब मैंने इन चार धर्मों की ‘अतिउत्साह’ के साथ साधना की, उन्हें भीतर विकसित किया, तब जिस भी ऊँचे ज्ञान को जानने और साक्षात्कार करने के लिए मैंने अपना चित्त झुकाया, आयाम खुलते ही मैंने उनका साक्षात्कार किया।
मैं जब चाहता, विविध ऋद्धियों का उपयोग करता—
- एक होकर अनेक बनता, अनेक होकर एक बनता।
- प्रकट होता, विलुप्त होता।
- दीवार, रक्षार्थ-दीवार और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता, मानो आकाश में हो।
- ज़मीन पर गोते लगाता, मानो जल में हो।
- जल-सतह पर बिना डूबे चलता, मानो ज़मीन पर हो।
- पालथी मारकर आकाश में उड़ता, मानो पक्षी हो।
- महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता।
- अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता ।
दिव्य श्रोत
मैं जब चाहता, अपने विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुन लेता — चाहे दिव्य हो या मानवी, दूर की हो या पास की।
परचित्त ज्ञान
मैं जब चाहता, अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता।
मुझे रागपूर्ण चित्त पता चलता कि ‘रागपूर्ण चित्त है।’ वीतराग चित्त पता चलता कि ‘वीतराग चित्त है।’
- (उसी तरह मुझे) द्वेषपूर्ण चित्त… या द्वेषविहीन चित्त…
- मोहपूर्ण चित्त… मोहविहीन चित्त…
- संकुचित चित्त… बिखरा चित्त…
- बढ़ा हुआ चित्त… न बढ़ा चित्त…
- बेहतर चित्त… सर्वोत्तर चित्त…
- समाहित चित्त… असमाहित चित्त…
- विमुक्त चित्त… अविमुक्त चित्त भी पता चलता…
— अंगुत्तरनिकाय ५ : ६८ दुतिय इद्धिपाद सुत्त
शक्तियाँ मिल गयीं, लेकिन ‘दुःख’ का हल अभी भी नहीं मिला था। सिद्धार्थ का लक्ष्य ‘ऋद्धिमानी’ होना नहीं, ‘मुक्त’ होना था।
तब उन्होंने अपने ध्यान की सुई को जीवन के सबसे गहरे प्रश्न पर घुमाया: “हम दुखी क्यों होते हैं?”
उन्होंने दुःख को एक डॉक्टर की तरह ‘रिवर्स-इंजीनियर’ करना शुरू किया।
इस खोज को उन्होंने एक अद्भुत रूपक से समझाया—जैसे कोई जंगल में भटकते हुए एक ‘खोये हुए प्राचीन नगर’ को खोज ले।
दुःख उत्पत्ति
तब मुझे लगा, “उफ़! यह दुनिया कितनी मुश्किलों में फँस गई है! यह जन्म लेती है, जीर्ण होती है, मरती है, च्युत होती है, फिर पुनरुत्पन्न होती है। किन्तु, जीर्णता और मौत के इस दुःख से निकलने का मार्ग नहीं समझ पाती।
उफ़! वह जीर्णता और मौत से बचने का मार्ग कब समझ पाएगी?”
तब मैंने सोचा, “किन्तु, क्या होने से ‘जीर्णता और मौत’ आती है? किस आवश्यक कारण से ‘जीर्णता और मौत’ होती है?”
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “जीर्णता और मौत तब होती है, जब जन्म हो। जन्म होने के आवश्यक कारण से ही जीर्णता और मौत आती हैं।”
तब सोचा, “किन्तु, क्या होने से ‘जन्म’ होता है? किस आवश्यक कारण से ‘जन्म’ होता है?”
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “जन्म तब होता है, जब भव (अस्तित्व बनाना) हो। भव के आवश्यक कारण से ही जन्म होता है।”
तब सोचा, “किन्तु, क्या होने से ‘भव’ बनता है? किस आवश्यक कारण से ‘भव’ होता है?”
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “अस्तित्व तब बनता है, जब उपादान (आसक्ति) हो। उपादान के आवश्यक कारण से ही भव बनता है।”
तब सोचा, “किन्तु, क्या होने से… किस आवश्यक कारण से उपादान होता है… तृष्णा होती है… वेदना होती है… संस्पर्श होता है… छह आयाम होते हैं… नाम-रूप होता है… विज्ञान होता है?”
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “विज्ञान तब होता है, जब नाम-रूप हो। नाम-रूप के आवश्यक कारण से ही विज्ञान होता है।”
तब मुझे लगा, “विज्ञान ‘नाम-रूप’ पर वापस लौटता है, उसके आगे नहीं जाता। इसी सीमा तक कोई जन्म लेता है, जीर्ण होता है, मरता है, च्युत होता है, फिर पुनरुत्पन्न होता है। बस इसी ‘नाम-रूप’ के कारण विज्ञान के होने से।
विज्ञान के कारण नाम-रूप होता है, और नाम-रूप के कारण छह आयाम होते हैं… संस्पर्श होता है… वेदना होती है… तृष्णा होती है… उपादान होती है… अस्तित्व बनता है… जन्म होता है… जीर्णता, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा होती हैं। इस तरह, इस दु:खों की गठरी की उत्पत्ति होती है।
“उत्पत्ति… उत्पत्ति…” ये पहले कभी न सुने धर्म के प्रति मेरी आँखें खुली, मुझे बोध हुआ, प्रज्ञा उपजी, विद्या प्रकट हुई, उजाला हुआ।
दुःख निरोध
तब मैंने सोचा, “किन्तु, क्या होने से ‘जीर्णता और मौत’ नहीं होती है? किस आवश्यक कारण से ‘जीर्णता और मौत’ नहीं होती है?”
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “जीर्णता और मौत तब नहीं होती, जब ‘जन्म’ न हो। जन्म न होने के आवश्यक कारण से ही जीर्णता और मौत भी नहीं होती हैं।”
तब सोचा, “किन्तु, क्या होने से… किस आवश्यक कारण से जन्म नहीं होता… भव नहीं बनता… उपादान नहीं होती… तृष्णा नहीं होती… वेदना नहीं होती… संस्पर्श नहीं होता… छह आयाम नहीं होते… नाम-रूप नहीं होता… विज्ञान नहीं होता है?
तब उचित चिंतन कर प्रज्ञा से मुझे समझ आया, “विज्ञान तब नहीं होता, जब नाम-रूप न हो। नाम-रूप के न होने के आवश्यक कारण से ही विज्ञान भी नहीं होता है।”
तब मुझे लगा, “मुझे बोधि-मार्ग मिल गया!
क्योंकि ‘नाम-रूप’ के न होने से विज्ञान नहीं होता। और विज्ञान के न होने से नाम-रूप नहीं होता। फिर नाम-रूप के न होने से छह आयाम नहीं होते… संस्पर्श नहीं होता… वेदना नहीं होती… तृष्णा नहीं होती… उपादान नहीं होती… भव नहीं बनता… जन्म नहीं होता… जीर्णता, मौत, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, निराशा इत्यादि नहीं होते हैं। इस तरह, इस दु:खों की गठरी का निरोध होता है।”
“निरोध… निरोध…” ये पहले कभी न सुने धर्म के प्रति मेरी आँखें खुली, मुझे बोध हुआ, प्रज्ञा उपजा, विद्या प्रकट हुई, उजाला हुआ।
पुरातन धर्म
जैसे कोई पुरुष किसी जंगल से गुजर रहा हो। उसे एक पुरातन मार्ग, प्राचीन पगडंडी दिखायी दे, जिस पर अतीतकाल में लोग चला करते थे। तब वह उस मार्ग का पीछा करे, और पीछा करते हुए उसे एक पुरातन नगर, प्राचीन राजधानी दिखे, जहाँ अतीतकाल में लोग रहते थे, जो बाग, बगीचे, उपवन और तालाब से भरा हुआ था, रक्षार्थ दीवारों से घिरा हुआ था, बहुत रमणीय था।
तब वह लौटकर राजा या राजमंत्री जाकर सूचित करता है, “महाराज, आपको पता होना चाहिए कि मैं जंगल से गुजर रहा था। तो मुझे एक पुरातन मार्ग, प्राचीन पगडंडी दिखायी दी। मैंने उस मार्ग का पीछा किया तो एक पुरातन नगर, प्राचीन राजधानी दिखायी दी, जहाँ अतीतकाल में लोग रहते थे, जो बाग, बगीचे, उपवन और तालाब से भरा हुआ है, रक्षार्थ दीवारों से घिरा हुआ है, बहुत रमणीय है! महामहिम, उस नगर का पुनर्निर्माण करें!”
तब राजा या राजमंत्री उस नगर का पुनर्निर्माण करते हैं, ताकि बाद में वह नगर शक्तिशाली, समृद्ध, घनी आबादी वाला, पूर्णतः विकसित बन जाए।
उसी तरह, मैंने भी एक प्राचीन मार्ग, प्राचीन पगडंडी देखी, जिस पर अतीतकाल के सम्यक-सम्बुद्ध चला करते थे। और वह प्राचीन मार्ग, प्राचीन पगडंडी क्या है?
बस, यही आर्य अष्टांगिक मार्ग। अर्थात, अर्थात, सम्यक-दृष्टि, सम्यक-संकल्प, सम्यक-वचन, सम्यक-कर्मांत, सम्यक-जीविका, सम्यक-प्रयास, सम्यक-स्मृति, और सम्यक-समाधि।
यही वह प्राचीन मार्ग, प्राचीन पगडंडी है, जिस पर अतीतकाल के सम्यक-सम्बुद्ध चला करते थे।
मैंने उस मार्ग का पीछा किया तो मुझे जीर्णता और मौत का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, जीर्णता और मौत की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, जीर्णता और मौत के निरोध का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, जीर्णता और मौत के निरोधकर्ता मार्ग का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ।
उसका पीछा किया तो मुझे जन्म… भव… उपादान… तृष्णा… वेदना… संस्पर्श… छह आयाम… नाम-रूप… विज्ञान… संस्कार का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, संस्कार की उत्पत्ति का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, संस्कार के निरोध का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ, संस्कार के निरोधकर्ता मार्ग का प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ।
— संयुत्तनिकाय १२ : ६५ : नगर सुत्त
सत्य अब बस एक कदम दूर था।
उस अंतिम छलांग से ठीक पहले, सिद्धार्थ के अवचेतन मन ने उन्हें संकेतों की भाषा में बात की। उन्हें पाँच ऐसे स्वप्न दिखाई दिए, जो यह घोषणा कर रहे थे कि कल का सूरज एक ‘बुद्ध’ को देखेगा।

जम्बूद्वीप की विराट धरती उनका बिस्तर थी। पर्वतराज हिमालय उनका तकिया था। उनका बायाँ हाथ पूर्वी-समुद्र में, दायाँ हाथ पश्चिमी-समुद्र में और दोनों पैर दक्षिणी-समुद्र में थे।
यह महास्वप्न उन्हें यह बताने के लिए प्रकट हुआ कि वह अनुत्तर सम्यक-संबोधि प्राप्त करने के अत्यंत करीब पहुँच चुके हैं, और उसे पाना अटल है।

उनकी नाभि से एक बेल निकली और आकाश तक पहुँच गयी ।
यह दूसरा महास्वप्न उन्हें यह बताने के लिए दिखाई दिया कि जब वे आर्य अष्टांगिक-मार्ग के लिए जागृत हो गए थे, तो वे इसे देवताओं और मनुष्यों तक अच्छी तरह से घोषित करेंगे।

भूमि पर रेंगने वाले काले सिर वाले सफेद कीड़े उनके पैरों पर चढ़कर घुटनों तक फैल गए।
यह तीसरा महास्वप्न उन्हें यह बताने के लिए दिखाई दिया कि कई सफेद कपड़े पहने गृहस्थ लोग आजीवन तथागत की शरण में जाएंगे।

चार दिशाओं से आने वाले अलग-अलग रंग के चार पक्षी उनके पैरों पर गिरे और पूरी तरह से सफेद हो गए।
यह चौथा महास्वप्न उन्हें यह बताने के लिए दिखाई दिया कि चार जातियों के लोग - क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र - उनके द्वारा सिखाए गए धम्मविनय में घर से बेघर हो, काषायवस्त्र धारण कर, अप्रतिम मुक्ति का अनुभव करेंगे।

वे मल के एक विशाल पर्वत पर चक्रमण करते रहे, लेकिन उनके पैर मल से गंदे नहीं हुए।
यह पाँचवा महास्वप्न उन्हें यह बताने के लिए दिखाई दिया कि तथागत को वस्त्र, भिक्षा, आवास और आवश्यक औषधियों का उपहार बहुत प्राप्त होगा, लेकिन वे उनका उपयोग उनसे अनासक्त, मोहरहित, अपराध बोध से रहित होकर करेंगे, उनके प्रति आसक्ति में ख़ामी को देखेंगे, और उनसे बचने का उपाय समझेंगे।
— अंगुत्तरनिकाय ५:१९६ : महासुपिन सुत्त
स्वप्न पूरे हो चुके थे। प्राचीन नगर का मार्ग मिल चुका था। अब केवल अंतिम द्वार खोलना बाकी था। आईए, चलते हैं उस ऐतिहासिक रात की ओर, जब उरुवेला के पीपल वृक्ष के नीचे, एक मनुष्य ने अविद्या के अन्धकार को हमेशा के लिए मिटा दिया।