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पच्छा

युवावस्था में प्रवेश करते ही राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह हुआ। प्राथमिक सूत्र उनकी पत्नी को अक्सर ‘राहुलमाता’ (राहुल की माँ) कहकर संबोधित करते हैं, जिन्हें बाद की परम्पराओं में हम यशोधरा के नाम से जानते हैं। यह कोलिय वंश की राजकुमारी थीं, जो शाक्य वंश के ही समान प्रभावशाली था।
शीघ्र ही उनके जीवन में एक पुत्र का आगमन हुआ—राहुल।
जीवन पूर्ण था। पिता शुद्धोधन ने अपने पुत्र को सुखों के ऐसे घेरे में रखा था जहाँ ‘अभाव’ शब्द का कोई अर्थ नहीं था। किन्तु, क्या मखमल की सेज उस आध्यात्मिक बेचैनी को सुला सकती थी?
प्रचलित कहानियाँ कहती हैं कि सिद्धार्थ एक दिन रथ पर शहर घूमने निकले और उन्होंने एक बूढ़े, एक बीमार और एक शव को देखा (चार निमित्त), जिससे वे विचलित हो गए।
वहीं, कुछ आधुनिक विचारक, जैसे डॉ. आंबेडकर, ने यह अनुमान लगाया कि यह कथा असंभव लगती है। उनका मानना है कि शायद रोहिणी नदी के जल-विवाद को लेकर हुए युद्ध के कारण उन्होंने गृहत्याग किया।
यहाँ एक गहरे ऐतिहासिक सत्य को समझना आवश्यक है। ‘महापदान सुत्त’ में यह घटना पूर्व-बुद्ध भगवान विपस्सी के जीवन में घटती है। वह उनका सत्य था। किन्तु, बाद की अट्ठकथाओं ने श्रद्धा-अतिरेक में इसे सभी बुद्धों के लिए ‘सामान्य’ मान लिया और सिद्धार्थ के जीवन पर भी इसे ज्यों-का-त्यों आरोपित कर दिया।
जब हम स्वयं बुद्ध के शब्दों को सुनते हैं, तो हमें न किसी रथ-यात्रा की, और न ही किसी नदी-विवाद की, बल्कि एक गहरे और नितांत व्यक्तिगत आत्म-चिंतन की झलक मिलती है।
सुनिए, उस मनोवैज्ञानिक क्रांति को, जिसने एक राजकुमार को भिक्षु बनने पर विवश कर दिया—
मैं सुखों में पलता था; परमसुखों में पलता था; अत्यंत सुखों में पलता था। पिता ने मेरे महलों के आगे तीन पुष्करणीयाँ (=कमलपुष्पों से भरे तालाब) बनवाई थी — एक में रक्तकमल, एक में श्वेतकमल, और एक में नीलकमल ख़िलते थे।
मैं ऐसा चंदन (गन्धस्वरूप) उपयोग न करता, जो बनारसी न हो। मेरी पगड़ी व कुर्ता बनारसी होता; बल्कि मेरा अंतर्वस्त्र व बाह्यवस्त्र भी बनारस से लाया जाता। मेरे ऊपर एक सफ़ेद राजसी-छाता दिन-रात ताना जाता, ताकि मुझे ठंडी, धूप, धूल, मल, या ओस न लगे।
मेरे लिए तीन महल बने थे — एक शीतकाल के लिए; एक ग्रीष्मकाल के लिए; और एक वर्षाकाल के लिए। वर्षाकाल के चारों महीने वर्षामहल में रहते हुए, मुझे गायकी-नर्तकियों द्वारा बहलाया जाता, बिना अन्य पुरुष की उपस्थिति के। मुझे महल से नीचे एक बार भी उतरना न पड़ता।
जहाँ अन्य घरों में श्रमिक और नौकरों को टूटा-चावल और दाल परोसी जाती, वही मेरे पिता के महल में उन्हें गेंहू, चावल, और मांस खिलाया जाता।

इस तरह भाग्यशाली, अत्यंत सुखसंपन्न होने पर भी, मैंने सोचा, ‘कभी धर्म न सुना आम आदमी, स्वयं जीर्ण-धर्म से घिरा, जीर्ण-धर्म न लाँघा—जब किसी बूढ़े को देखें, तो खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करता है, भूलते हुए कि वह स्वयं बुढ़ापे से नहीं छूटा, बुढ़ापे के परे नही गया। यदि मैं भी जीर्ण-धर्म से घिरा, जीर्ण-धर्म न लाँघा, किसी बूढ़े को देख खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करूँ, तो मेरे लिए उचित नही होगा।’
— जैसे ही मैंने यह समीक्षा की, मेरा ‘यौवन’ का सारा नशा उतर गया।
इस तरह भाग्यशाली, अत्यंत सुखसंपन्न होने पर भी, मैंने सोचा, ‘कभी धर्म न सुना आम आदमी, स्वयं रोग-धर्म से घिरा, रोग-धर्म न लाँघा—जब किसी रोगी को देखें, तो खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करता है, भूलते हुए कि वह स्वयं रोग से नहीं छूटा, रोग के परे नही गया। यदि मैं भी रोग-धर्म से घिरा, रोग-धर्म न लाँघा, किसी रोगी को देख खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करूँ, तो मेरे लिए उचित नही होगा।’
— जैसे ही मैंने यह समीक्षा की, मेरा ‘आरोग्य’ का सारा नशा उतर गया।
इस तरह भाग्यशाली, अत्यंत सुखसंपन्न होने पर भी, मैंने सोचा, ‘कभी धर्म न सुना आम आदमी, स्वयं मरण-धर्म से घिरा, मरण-धर्म न लाँघा—जब किसी मृत को देखें तो खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करता है, भूलते हुए कि वह स्वयं मौत से नहीं छूटा, मौत के परे नही गया। यदि मैं भी मरण-धर्म से घिरा, मरण-धर्म न लाँघा, किसी मृत को देख खौफ़, लज्जा, और घिन महसूस करूँ, तो मेरे लिए उचित नही होगा।’
— जैसे ही मैंने यह समीक्षा की, मेरा ‘जीवन’ का सारा नशा उतर गया।
— अंगुत्तरनिकाय ३:३६ : देवदूत सुत्त
यह केवल उदासी नहीं थी; यह ‘संवेग’ था। संवेग—अर्थात एक ऐसा आध्यात्मिक भय जो आपको हिलाकर रख देता है।
जैसे सूखते हुए गड्ढे में मछलियाँ अपनी जान बचाने के लिए तड़पती हैं, सिद्धार्थ को यह पूरी दुनिया वैसी ही दिखाई देने लगी। हर कोई भाग रहा है, लड़ रहा है, जमा कर रहा है—मानो जलते हुए घर के भीतर कोई अपनी सेज सजा रहा हो।

मैं बताता हूँ कैसे,
जागा संवेग मुझे।
छटपटाती दिखी जनता,
गड्ढे में मछलियों जैसे।
— विरुद्ध एक-दूसरे के,
देख भय लगा मुझे।
सारहीन पूर्णतः दुनिया,
दिशाएँ बिखरी ऐसे-तैसे।
इच्छा करते भवन की,
न मिला कुछ बिना पूर्वदावेदारी के।
न दिखा कुछ, बजाय स्पर्धा,
असंतुष्टि महसूस की मैंने।
अंततः दिखा मुझे—एक तीर,
जिसके दर्शन दुर्लभ बड़े।
हृदय बसते उस तीर से वशीभूत,
सभी दिशाएँ आप भागते।
किंतु खिंच तीर बाहर,
आप न भागते, न ही डूबते।
— सुत्तनिपात ४:१५ : अत्तदण्डसुत्त
संसार का यह खोखलापन देखने के बाद, राजमहल की दीवारें अब सुरक्षा नहीं, बल्कि कैद लगने लगी थीं।
सूत्रों के अनुसार प्रश्न स्पष्ट था:
मैं उस चीज़ (संसार) के पीछे क्यों भागूँ जो स्वयं जल रही है? क्यों न मैं उस ‘अमृत’ की खोज करूँ जो कभी नहीं मरता?
और तब, २९ वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ ने वह कदम उठाया जो इतिहास में ‘महाभिनिष्क्रमण’ के नाम से जाना गया।
यह कोई आसान विदाई नहीं थी। कहानियाँ कहती हैं कि वे चुपचाप चले गए, लेकिन बुद्ध स्वयं बताते हैं कि यह क्षण कितना वेदनापूर्ण था। माता-पिता के आंसू बह रहे थे, वे विलाप कर रहे थे, रोकने की गुहार लगा रहे थे। लेकिन जिसका चित्त ‘सत्य’ के लिए तड़प रहा हो, उसे स्नेह की जंजीरें भी नहीं रोक सकतीं।
मुझे लगने लगा, ‘गृहस्थी-जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु संन्यास, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्यता का पालन करना सरल नहीं है, जो चमचमाते शँख जैसा हो! क्यों न मैं सिर-दाढ़ी मुंडवा, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रवज्यित हो जाऊँ?’
तत्पश्चात मैं युवा ही था—काले केशवाला, जीवन के प्रथम चरण में, यौवन वरदान से युक्त—तब मैंने माता-पिता के इच्छाविरुद्ध, उन्हें आँसूभरे चेहरे से बिलखते छोड़, सिर-दाढ़ी मुंडवा, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो संन्यास लिया।
राजकुमार अब ‘श्रमण’ बन चुका था। मखमल छूट गया था, और सामने थी अनजानी राह। न कोई गुरु, न कोई नक्शा, केवल एक धधकती हुई जिज्ञासा।
आइए, देखते हैं उस महात्याग के बाद के पहले कदम।