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बुद्धत्त
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पच्छा

गुरुओं का ज्ञान अधूरा था। महल का सुख अधूरा था। अब केवल एक ही रास्ता बचा था—वह रास्ता जिससे साधारण मनुष्य थर्राता है।
सिद्धार्थ मगध के उरुवेला (वर्तमान बोधगया के पास) पहुँचे। नेरञ्जरा नदी का तट शांत था, लेकिन सिद्धार्थ के भीतर एक तूफ़ान उबल रहा था। यहाँ उन्होंने वह निर्णय लिया जो इतिहास में ‘दुष्कर चर्या’ के नाम से जाना गया।
उस युग में यह प्रबल (जैन) मान्यता थी कि शरीर को जितना कष्ट दिया जाएगा, मुक्ति उतनी ही समीप आती है। माना जाता था कि ‘तप’ की आग में ही पुराने कर्म संस्कार जलते हैं।
सिद्धार्थ ने इस सिद्धांत को उसकी चरम सीमा तक परखने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने शरीर को ही एक प्रयोगशाला बना दिया और अपने ही प्राणों को दांव पर लगा दिया। यह कोई पागलपन नहीं, बल्कि एक लौह-संकल्प था।
इस तरह, कुशलता की खोज में, अनुत्तर शांति की अद्वितीय अवस्था की खोज में, मगध देश में अनुक्रम से भ्रमण करते हुए—मैं उरुवेला सैन्य नगर में पहुँचा। वहाँ मुझे रमणीय क्षेत्र देखा, जहाँ एक प्रेरणादायी जंगली इलाका, रमणीय और स्वच्छ किनारों वाली (नेरञ्जरा) नदी बहती थी, और भिक्षाटन के लिए सभी ओर गाँव बसे थे।
तब मुझे लगा, ‘यहाँ, श्रीमान, अच्छा रमणीय क्षेत्र है, एक प्रेरणादायी जंगली इलाका, रमणीय और स्वच्छ किनारों वाली नदी बहती है, और भिक्षाटन के लिए सभी ओर गाँव बसे हैं। किसी कुलपुत्र के उद्यम करने के ध्येय से यह बिलकुल ठीक है।’
तब मैं बस वहीं बैठ गया—‘यहीं उद्यम करने के लिए ठीक है।’
मैंने अपने अनुभव से दो गुणों को जाना है:
- कुशलता को बढ़ाने में असंतुष्ट रहना,
- और अथक तपस्या करना।
मैंने अथक तपस्या किया, (सोचते हुए,) ‘मैं खुशी से अपना रक्त और माँस सूखा दूँगा! केवल नसें और कंकाल ही छोड़ुंगा! किन्तु जब तक वह न हासिल करूँ, जो पौरुष-दृढ़ता, पौरुष-ऊर्जा, और पौरुष-प्रयास से हासिल किया जाता है, तब तक अपनी ऊर्जा को राहत नहीं दूंगा!’
— अंगुत्तरनिकाय २:५ : उपञ्ञातसुत्तं
तब मुझे लगा, “क्यों न मैं दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, दबा कर, कुचल दूँ?”
तब, मैंने दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, इतना दबाया और कुचला कि मेरी बगल से पसीना बहने लगा।
जैसे कोई बलवान पुरुष किसी दुर्बल पुरुष को सिर से, गले से, या कंधे से खींच-पकड़ कर, दबा कर, कुचल देता है। उसी तरह, मैंने दाँत भींचकर, जीभ को तालु पर लगाकर, अपने मानस से चित्त को खींच-पकड़ कर, इतना दबाया और कुचला कि मेरी बगल से पसीना बहने लगा।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी उस तरह का उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
सबसे पहले उन्होंने अपनी साँसों को रोकने का प्रयोग किया। यह शरीर और मन के बीच का एक भयानक युद्ध था।
तब मुझे लगा, “क्यों न मैं साँस रोक कर ध्यान लगाऊँ?”
तब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया।
किन्तु जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो कान से वायु निकलकर गर्जना सी होने लगी। जैसे, लोहार की धौंकनी से वायु निकलते हुए गर्जना होती है। उसी तरह, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो कान से वायु निकलकर गर्जना सी होने लगी।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी उस तरह उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
तब मुझे लगा, “क्यों न मैं साँस रोक कर ही ध्यान लगाते रहूँ?”
तब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोके रखा। किन्तु जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोके रखा, तो—
- रुद्र ऊर्जाओं ने मेरा सिर चीरना शुरू किया। जैसे कोई बलवान पुरुष तीक्ष्ण तलवार से मेरा सिर चीर रहा हो…
- मेरे सिर में तेज दर्द होने लगा। जैसे कोई बलवान पुरुष कड़े चमड़े की पट्टी से मेरे सिर को कस रहा हो…
- रुद्र ऊर्जाओं ने मेरे पेट के उदर को चीरना शुरू किया। जैसे कोई कुशल कसाई तीक्ष्ण छुरी से गाय का पेट चीर रहा हो…
- मेरे शरीर में बहुत जलन होने लगी। जैसे दो बलवान पुरुष किसी दुर्बल पुरुष को बाहों से पकड़कर घसीटते हुए, उसे अंगारों के गड्ढे में डालकर भूनने लगे…
—उसी तरह, जब मैंने नाक और मुँह से आश्वास-प्रश्वास रोक दिया, तो मेरे शरीर में बहुत जलन होने लगी।
मेरी वीर्य जागृत और अथक थी मेरी स्मृति उपस्थित और स्पष्ट थी। किन्तु उस दर्दभरे उद्यम के कारण मेरी काया प्रताड़ित होते हुए उत्तेजित और अशांत हुई। तब भी उस तरह उत्पन्न हुई दुखद वेदना मेरे चित्त पर न हावी हुई, न ही बनी रही।
तब मुझे देखकर देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम मर गया!’ दूसरे देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम अभी मरा नहीं, किन्तु मर रहा है!’ तीसरे देवता कहने लगे, ‘श्रमण गौतम न मर गया, न ही मर रहा है, बल्कि श्रमण गौतम अरहंत हो गया! क्योंकि अरहंत इसी तरह जीते हैं!’

साँसों को जीतने के बाद, उन्होंने भूख को जीतने का प्रयास किया। उन्होंने भोजन को इतना कम कर दिया कि जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर मिट गया। यह विवरण इतना विस्तृत और वीभत्स है कि पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
तब मुझे लगा, “क्यों न मैं आहार को पूरी तरह त्याग देने की साधना करूँ?”
किन्तु तब देवतागण मेरे पास आकर कहने लगे, ‘महाशय, आहार को पूरी तरह न त्यागे। यदि आप आहार को पूरी तरह त्याग देंगे, तो हम आपके रोमछिद्रों से दिव्य ओज (=पोषण) को भीतर डालेंगे और उसी पर आप जीवित रहेंगे।’
तब मुझे लगा, ‘यदि मैं पूरी तरह उपवास करने का दावा करूँ, जबकि ये देवता मेरे रोमछिद्रों से दिव्य ओज को भीतर डाल रहे हो, तब मेरी ओर से झूठ होगा!’
तब मैंने उन देवताओं को भेज दिया, कहते हुए, ‘रहने दीजिए!’
तब मुझे लगा, ‘क्यों न मैं थोड़ा-थोड़ा आहार लेते रहूँ—एक बार में एक मुट्ठी दाल, या एक मुट्ठी दाल का पानी, या एक मुट्ठी मूँग दाल, या एक मुट्ठी मटर दाल?’
तब मैं थोड़ा-थोड़ा आहार लेने लगा—एक बार में एक मुट्ठी दाल, या एक मुट्ठी दाल का पानी, या एक मुट्ठी मूँग दाल, या एक मुट्ठी मटर दाल? तब थोड़ा-थोड़ा ही आहार लेने से मेरी काया कुपोषित हो गयी।
- जैसे बेल या बांस के जोड़ वाले खंड होते हैं, वैसे मेरे अंग-प्रत्यंग हो गए, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जैसे ऊँट की कूबड़ होती है, वैसी मेरी पीठ हो गई, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जैसे मोतियों की माला होती है, वैसे मेरी रीढ़ की हड्डी उभर कर आयी, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जैसे बहुत पुराना और जर्जर भण्डार का धरन होता है, वैसे मेरी पसलियाँ बाहर निकली, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जैसे कुएं में गहराई पर जाकर जल चमकता है, वैसे ही मेरी आंखों की चमक गड्ढों में गहराई तक धँस गयी, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जैसे सूखा सिकुड़ा हुआ करेला होता है, वैसा ही मेरा सिर सूखकर सिकुड़ गया, मात्र अल्प आहार लेने से।
- और मेरे पेट की त्वचा रीढ़ से इस तरह चिपक गई कि जब मैं अपने पेट को छूना चाहता, तो रीढ़ भी हाथ में आती। और जब रीढ़ को छूना चाहता, तो पेट की त्वचा हाथ में आती, मात्र अल्प आहार लेने से।
- जब मैं पेशाब या शौच करता, तो वहीं मुँह के बल गिर पड़ता, मात्र अल्प आहार लेने से।
- यदि मैं हाथों से अपने अंगों को मलता, तो मेरे रोम जड़ों से उखड़ कर गिरते, मात्र अल्प आहार लेने से।
तब मुझे देखकर मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम काला है!’ दूसरे मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम काला नहीं, गेहूँआं है!’ तीसरे मनुष्य कहने लगे, ‘श्रमण गौतम न काला है, न ही गेहूँआं, बल्कि श्रमण गौतम की छवि पीली है!’ इस स्तर तक मेरी परिशुद्ध त्वचा की चमक बर्बाद हो गयी थी, मात्र अल्प आहार लेने से।
छह साल।
छह साल तक उन्होंने अपने शरीर को जलाया, गलाया और तोड़ा। लेकिन परिणाम?
शून्य।
इतने कष्ट के बाद भी विमुक्तकारी ‘प्रज्ञा’ का उदय नहीं हुआ। शरीर टूट चुका था, और मन धुंधला हो रहा था। यह एक भयानक अहसास था—कि जिस रास्ते को पूरी दुनिया ‘मुक्ति का मार्ग’ कहती है, वह असल में एक ‘बंद गली’ है।
तब मुझे लगा, ‘अतीत में… भविष्य में… और वर्तमान में जितने भी श्रमण-ब्राह्मण खूब प्रयास करते हुए, दर्द और तीव्र, कटु, भेदक पीड़ाओं की वेदना कर रहे हो, उसमें यह परम है, इससे बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। किन्तु, इतनी कड़ी दुष्करचर्या से भी मैंने कोई अलौकिक अवस्था, कोई विशेष आर्य ज्ञान-दर्शन प्राप्त नहीं किया। तब क्या बोधि का कोई अन्य मार्ग हो सकता है?’
तब मुझे लगा, “मुझे याद है कि जब मेरे शाक्य पिता काम कर रहे थे, और मैं जामुन के पेड़ की शीतल छाया में बैठा हुआ था, तब मैं कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त — वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया था। क्या वह बोधि का मार्ग हो सकता है?”
तब उसी स्मृति के पीछे-पीछे विज्ञान हुआ—‘यही बोधि का मार्ग है!’
तब मुझे लगा, ‘मैं क्यों उस सुख से डरता हूँ, जब उसका कामुकता से कोई लेनदेन नहीं है, अकुशल-स्वभाव से कोई लेनदेन नहीं है?’
तब मुझे लगा, ‘मैं उस सुख से नहीं डरूँगा, जब उसका कामुकता से कोई लेनदेन नहीं है, अकुशल-स्वभाव से कोई लेनदेन नहीं है।’
तब मुझे लगा, ‘उस सुख को ऐसी कुपोषित काया से प्राप्त करना सरल नहीं है। क्यों न मैं कुछ ठोस आहार लूँ, कुछ दाल-भात?’
और तब मैंने कुछ ठोस आहार लिया, कुछ दाल-भात।
तब उस समय पाँच भिक्षु मेरी सेवा में थे, (सोचते हुए,) ‘श्रमण गौतम को धम्म प्राप्त हो जाए, तो वे हमें बताएँगे।’ जब मैंने कुछ ठोस आहार लिया, कुछ दाल-भात, तब वे निराश होकर चले गए, (सोचते हुए,) ‘श्रमण गौतम विलासी हो गए, तपस्या से भटक कर विलासी जीवन में लौट गए।’

सत्य की यह चिंगारी मिलते ही सिद्धार्थ ने शरीर को दंड देना बंद कर दिया। उन्होंने जीने के लिए, और साधना करने के लिए अन्न ग्रहण करने का निर्णय लिया। उन्होंने भोजन (खीर) स्वीकार किया।
लेकिन उनके साथ रह रहे पाँच तपस्वी (कौण्डिन्य आदि) इसे समझ नहीं पाए। उन्हें लगा कि सिद्धार्थ हार गए हैं, वे भ्रष्ट हो गए हैं।
यहाँ सिद्धार्थ गोतम का चरित्र असाधारण बनकर उभरता है।
कल्पना कीजिये—छह साल की कड़ी तपस्या, व्यर्थ गयी। शरीर बर्बाद हो गया। अनुयायी और प्रशंसा करने वाले छोड़कर चले गए।
कोई साधारण मनुष्य होता तो अहंकार में पड़कर उस गलत रास्ते को ही सही साबित करने में लगा रहता।
किन्तु सिद्धार्थ के लिए यह त्यागना ज़रा-सी बात थी। जिस पल उन्हें लगा कि यह रास्ता गलत है, उन्होंने उसे छोड़ने में एक पल भी नहीं गंवाया। अपनी गलती स्वीकारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है, वह शारीरिक तपस्या से कहीं अधिक बड़ा था।
अब सिद्धार्थ पूरी तरह अकेले थे। गुरु छूट गए थे। साथी छोड़ गए थे। पुरानी मान्यताएँ टूट चुकी थीं।
लेकिन उनके पास वह कुंजी आ गई थी जिसे दुनिया भूल चुकी थी—“वीणा के तार न इतने कसने हैं कि टूट जाएँ, और न इतने ढीले छोड़ने हैं कि स्वर न निकले।”
यही था मध्यम मार्ग।
आइए, देखते हैं कि कैसे इस मध्यम मार्ग ने उस रात अविद्या के अंधकार को चीर दिया।