✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

— गोतम बुद्ध —
जाति | गिही | नेक्खम्म | तप | मग्ग | बुद्धत्त | पच्छा

बुद्धत्व लाभ

✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ १२ मिनट
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उरुवेला की उस रात, नेरञ्जरा नदी के तट पर इतिहास बदलने वाला था। सिद्धार्थ गौतम ‘मध्यम मार्ग’ को पा चुके थे, शरीर में बल लौट आया था, और मन एक धारदार हथियार की तरह तैयार था।

लेकिन, उजाला होने से पहले अँधेरा अपना सबसे विकराल रूप दिखाता है।

जैसे ही सिद्धार्थ अंतिम सत्य को भेदने के लिए बैठे, मार उनके सामने आ खड़ा हुआ।

देवपुत्र मार वह महाऋद्धिमानी यक्ष है जो अपनी आस्रव ऊर्जा से सत्वों के चित्त को नियंत्रित कर उन्हें विराग धम्ममार्ग से विमुख करता है और संसार-बंधन में जकड़े रखता है। उस रात, मार (जिसे प्राचीन भाषा में ‘नमुची’ भी कहा गया) ने सिद्धार्थ के मन में संदेह और भय का बीज बोने की कोशिश की। उसने करुणा का नाटक करते हुए उन्हें मौत का डर दिखाया।

सुनिए, उस ऐतिहासिक संवाद को, जहाँ एक अकेले मनुष्य ने मृत्यु की आँखों में आँखें डालकर उसे ललकारा—

मुझे निरंजरा नदी के समीप
योगबन्धन से राहत पाने के लिए,
उद्यम में दृढ़-निश्चयी होकर,
झान में विशेष पराक्रम करते हुए
देख कर नमुची आया,
और करुणाभरे शब्द कहने लगा —

“आप तो दुवर्ण और पतले हो गए!
आपकी मौत पास आ गयी!
एक हज़ार अंश में मौत,
जीवन एक अंश में रह गया!
अरे, जीवित बचिए, श्रीमान!
जीवन बेहतर है!
जीवित बचे तो पुण्य करोगे!
ब्रह्मचर्य पालन कर,
अग्नियज्ञ कर पुण्य-संचय होगा!
भला ऐसे उद्यम से क्या लाभ?
दुर्गम है यह उद्यमपथ! दुष्कर है!
कठिन है टिकना!”

— ये गाथाएँ कहते हुए
मार खड़ा हुआ भगवान के आगे।

भगवान ने उत्तर दिया उस मार को—

“मदहोशों के रिश्तेदार ("पमत्तबन्धु") पापी!
जिस भी ध्येय से आए यहाँ।
पुण्यों की रत्ती-भर जरूरत मुझे नहीं।
पुण्यों की जरूरत जिन्हें,
मार-उपदेश के लायक वहीं।

मुझ में है श्रद्धा!
तप, ऊर्जा, और अन्तर्ज्ञान!
जब इतना दृढ़ हूँ,
क्यों करते हो जीने की याचना?
[घोर प्रयत्न से उठा] यह वायु
जला दे नदी की भी धारा,
तब मेरा लहू क्यों न सूखेगा?

लहू जब सूखेगा,
पित्त और कफ तब सूखेगा।
जब मांसपेशियां क्षीण होते,
चित्त स्पष्ट तब होगा।
स्मृति, अन्तर्ज्ञान, समाधि
अधिकाधिक स्थिर होते।
ऐसी परम अनुभूति पाकर रहने से
कामुकता के प्रति चित्त निरस हो जाता है!
देखो, सत्व की शुद्धि!

कामराग तुम्हारी सेना पहली!
नीरसता ("अरति")—दूसरी!
भूख-प्यास—तीसरी,
और तृष्णा—चौथी!
सुस्ती और तंद्रा—पाँचवी,
डर—छठी!
उलझन-शंका—सातवीं!
ढ़ोंग और अकड़ूपन—आठवी!
लाभ, सत्कार, और कीर्ति—नौवीं!
मिथ्या-प्राप्त प्रतिष्ठा—दसवीं!
आत्म-प्रशंसा करना,
दूसरों को तुच्छ दिखाना—ग्यारहवीं!
— बस यही नमुची, तुम्हारी सेना!
कान्हा की लड़ाकू-सेना!
कायर उन्हें हरा न पाये,
परंतु हराने पश्चात ही कोई सुख पाये!

क्यों लादू यह मुंजघास?
थूकता हूँ अपने जीवन पर!
संग्राम में होगी मौत बेहतर,
बजाय मैं बचूं जीवित, हारकर!
यही डूबकर अनेक श्रमण-ब्राह्मण
दिखाई नहीं देते आगे!
उस पथ को वे जानते नहीं,
जिसकी साधना करते चला जाता है!

वाहनसहित मार को सुसज्जित-सेना के साथ
घिरा देखकर मैं संग्राम में उतरता!
कहीं मुझे स्थान से च्युत न कर दे!
देव-मानव सहित संपूर्ण ब्रह्मांड
तुम्हारी जिस सेना से जीत न पाए,
मैं अन्तर्ज्ञान से उसे ऐसे तोड़ूंगा
— जैसे कच्चे घडे को पत्थर से!

अपने संकल्पों को वश में कर,
स्मृति सुप्रतिष्ठित कर
अनेक श्रावकों को सिखाता,
देश-देश घूमूँगा!
होशपूर्ण, दृढ़निश्चयी,
अनुशासन पूर्ण करनेवाले—
मेरे श्रावक, तुम्हारी इच्छा के बावजूद
वहाँ जाएंगे, जहाँ जाकर
दुबारा न होता शोक!”

(मार:)
“सात वर्षों तक भगवान का पीछा किया,
परंतु गौरवपूर्ण सम्बुद्ध का कोई
द्वार न खोल पाया!
चर्बी-वर्ण का देख पत्थर,
कौवा उसके चक्कर काटे—
[सोचते हुए] ‘मैंने ढूंढ लिया कुछ कोमल!
शायद है स्वादिष्ट!’
परंतु कोई स्वाद न पा, उड़ा कौवा!
टूट पड़ते उस पत्थर पर,
कौवे की तरह
थक गया मैं गोतम के साथ!

शोकग्रस्त होने पर बगल से उसकी वीणा गिर पड़ी। तब वह हताश यक्ष वहीं विलुप्त हो गया।

—सुत्तनिपात ३:२ : पधानसुत्त

रात्रि के तीन पहर: अविद्या का विनाश

मार परास्त होकर विलुप्त हो गया।

अब कोई बाधा नहीं थी। सिद्धार्थ का चित्त शांत सरोवर जैसा स्थिर हो गया। वे प्रथम ध्यान से चतुर्थ ध्यान तक की गहराइयों में उतरते चले गए। मन इतना निर्मल हो गया कि समय और स्थान की सीमाएँ टूटने लगीं।

फिर आई वह रात्रि, जिसे तीन पहरों में बांटा गया—

प्रथम पहर: समय की सीमा टूटी

सबसे पहले, सिद्धार्थ ने अपने अतीत को भेदा। उन्होंने अपने एक नहीं, दो नहीं, बल्कि लाखों पूर्व-जन्मों को देखा। “मैं वहां था, मेरा यह नाम था, मैंने यह सुख-दुःख भोगा…” यह स्मृति का एक विस्फोट था जिसने यह साबित कर दिया कि जीवन एक बार की घटना नहीं, बल्कि एक अंतहीन शृंखला है।

मध्यम पहर: ब्रह्मांड का नियम दिखा

इसके बाद, उन्होंने अपनी दृष्टि फैलाई। उन्हें ‘दिव्य-चक्षु’ प्राप्त हुए। उन्होंने देखा कि कैसे प्राणी अपने कर्मों के अनुसार मरते हैं और फिर जन्म लेते हैं। कोई संयोग नहीं, कोई पक्षपात नहीं—केवल कर्म का अटल सिद्धांत।

अंतिम पहर: ऑपरेशन सफल हुआ

अब अंतिम प्रहार की बारी थी। सूर्योदय से ठीक पहले, उन्होंने अपने मन के सबसे गहरे कोने में छिपे आसव को ढूंढ़ निकाला—कामुकता, भव (अस्तित्व की चाह), और अविद्या। उन्होंने ‘चार आर्य सत्यों’ का साक्षात्कार किया और अविद्या की जड़ काट दी।

अंततः मैंने कामुकता से निर्लिप्त, अकुशल स्वभाव से निर्लिप्त—वितर्क और विचार सहित, निर्लिप्तता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी…

वितर्क और विचार थमने पर भीतर आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर बिना-वितर्क बिना-विचार, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी…

प्रीति से विरक्ति ले, स्मृति और सचेतता के साथ उपेक्षा धारण कर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—मैं उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी…

सुख और दुःख के परित्याग से, तथा पूर्व के सौमनस्य और दौमनस्य के विलुप्त होने से—न सुख, न दुःख; उपेक्षा और स्मृति की परिशुद्धता के साथ चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश पाकर उसमें विहार किया। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी।

प्रथम पहर

जब मेरा चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो गया, तब मैंने उस चित्त को पूर्वजन्म स्मरण करने की ओर झुकाया।

तब मुझे अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण हुए—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त (=ब्रह्मांडिय सिकुड़न), कई कल्पों का लोक-विवर्त (=ब्रह्मांडिय विस्तार), कई कल्पों का संवर्त-विवर्त दिखा—

‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’

इस तरह मैंने अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण किए।

मुझे इस प्रथम-ज्ञान का साक्षात्कार रात के प्रथम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी।

द्वितीय पहर

तब मैंने अपने समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल चित्त को सत्वों की गति जानने की ओर झुकाया।

तब मुझे अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखा। और मुझे पता चला कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।

कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजे।’

किन्तु कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यकदृष्टि धारण की, और सम्यकदृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजे।

इस तरह, मैंने अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए देखा।

मुझे इस द्वितीय-ज्ञान का साक्षात्कार रात के मध्यम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी।

तृतीय पहर

तब मैंने अपने समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाया।

तब ‘दुःख’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘दुःख की उत्पत्ति’, मुझे यथास्वरूप पता चली। ‘दुःख का निरोध’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘दुःख का निरोधकर्ता मार्ग’, मुझे यथास्वरूप पता चला।

‘आस्रव’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘आस्रव की उत्पत्ति’, मुझे यथास्वरूप पता चली। ‘आस्रव का निरोध’, मुझे यथास्वरूप पता चला। ‘आस्रव का निरोधकर्ता मार्ग’, मुझे यथास्वरूप पता चला।

इस तरह जानने से, देखने से, मेरा चित्त कामुक-आस्रव से विमुक्त हुआ, भव-आस्रव से विमुक्त हुआ, अविद्या-आस्रव से विमुक्त हुआ। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न हुआ, ‘विमुक्त हुआ!’ मुझे पता चला, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’

मुझे इस तृतीय-ज्ञान का साक्षात्कार रात के अंतिम-पहर में हुआ। अविद्या नष्ट हुई, ज्ञान उत्पन्न हुआ! अँधेरा नष्ट हुआ, उजाला उत्पन्न हुआ! जैसे किसी अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी के साथ होता है। किन्तु, इस तरह उत्पन्न सुखद संवेदना मेरे मन को अभिभूत कर के नहीं रह सकी।

मज्झिमनिकाय ३६ : महासच्चक सुत्त

सूर्योदय: एक बुद्ध का जन्म

जैसे ही अविद्या का पर्दा गिरा, वह व्यक्ति जो ‘सिद्धार्थ’ के रूप में बैठा था, अब नहीं रहा। जो उठा, वह ‘बुद्ध’ (जागृत पुरुष) था।

सूत्र कहते हैं कि उस क्षण धरती कांप उठी। यह कम्पन केवल मिट्टी का नहीं था, यह उस चेतना का कम्पन था जिसने युगों पुरानी कैद को तोड़ दिया था।

और, जब तथागत को अनुत्तर ‘सम्यक-संबोधि’ प्राप्त होती है, तब पृथ्वी कंपित होती है, प्रकंपित होती है, थरथराती है।

महापरिनिब्बान सुत्त

और तब, उस परम सन्नाटे में, विजेता की पहली सिंह-गर्जना गूँजी। यह उद्घोष उस ‘कारीगर’ (तृष्णा) के लिए था, जो जन्म-जन्मांतर से दुख रूपी घर बना रहा था—

अनेक जन्म भटकता रहा,
बिना ईनाम के, न आराम के,
घर बनाने वाले की खोज में,
बार-बार दुःखों में जन्म हुआ!

घर बनाने वाले,
अब तुम्हें देख लिया गया!
अब तुम दुबारा घर
नहीं बना पाओगे!

सारी कड़ियाँ तोड़,
शिखर को ध्वस्त किया,
चित्त डुबाया विखंडन में,
तृष्णा का अन्त किया।

— खुद्दकनिकाय धम्मपद : जरावग्ग : १५३ + १५४

कार्य सिद्ध हुआ। खोज पूरी हुई। आइए, देखते हैं बुद्ध ने आगे क्या किया।


🌸 सम्बोधि के पश्चात