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बौद्ध साधना जगत में ‘पारमि’ शब्द अत्यंत प्रचलित है। यह शब्द “परम” से बना है, जिसका अर्थ है किसी गुण को उसकी “सर्वोच्च अवस्था” तक ले जाना। इसे ‘पूर्णता’ या ‘गुण-संचय’ के रूप में समझा जाता है। मान्यता है कि इन गुणों को जमा करके ही साधक बुद्धत्व या अर्हत्व प्राप्त कर सकता है।
आज थेरवादी परंपरा में दस पारमिताएँ—दान, शील, नेक्खम्म (निष्कामता), प्रज्ञा, वीर्य, क्षांति, सच्चाई, अधिष्ठान, मैत्री, और उपेक्षा—धर्म का आधार स्तंभ मानी जाती हैं।
किंतु एक मूल प्रश्न यहाँ अनिवार्य रूप से उठता है: क्या बुद्ध के प्रारंभिक उपदेशों में इनका वास्तव में कोई स्थान था?
प्रारंभिक सूत्रों की कसौटी पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पारमि की यह पूरी अवधारणा बुद्ध के मूल वचनों से एक ऐतिहासिक भटकाव है। आइए, इसकी विकास-यात्रा और इसके प्रभावों की पड़ताल करें।
बुद्ध के मूल निकाय—दीघ, मज्झिम, संयुक्त, और अंगुत्तर—में “पारमि” शब्द का मिलना तो दूर, उसकी छाया भी दुर्लभ है। केवल तीन-चार सूत्रों ( मज्झिमनिकाय ७७ , मज्झिमनिकाय १०० , मज्झिमनिकाय १११ , और अंगुत्तरनिकाय ५.११) में यह शब्द आता है, लेकिन वहां इसका अर्थ “किनारे तक पहुँचाना” या “दक्षता” है, न कि गुण संचय का कोई सिद्धांत।
प्रारंभिक सूत्रों में दर्जनों सिद्धांतों पर सूचियाँ उपलब्ध हैं, लेकिन “दस पारमियों” की कोई सूची नहीं। यहाँ तक कि जब भगवान अपने पूर्वजन्मों की चर्चा करते हैं (जैसे दीघनिकाय १९ और मज्झिमनिकाय ८३ ), तो वे स्पष्ट करते हैं कि उन जन्मों के अभ्यासों ने उन्हें निर्वाण नहीं दिया, केवल ब्रह्मलोक तक पहुँचाया।
भिक्खु बोधि, भिक्खु अनालयो और प्रो. रिचर्ड गोम्ब्रिच जैसे शीर्ष आधुनिक विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि प्रारंभिक पालि सुत्तों में “पारमि संचय” जैसी कोई अवधारणा अस्तित्व में नहीं थी। उस समय धर्म का लक्ष्य “भविष्य का बुद्धत्व” नहीं, बल्कि “तत्काल निर्वाण” था।
यदि पारमि नहीं, तो बुद्ध ने क्या सिखाया?
बुद्ध का साधना-पथ बिल्कुल स्पष्ट और सीधा था, जिसे बोधिपक्खिय धम्म (बोधि के पक्ष में सहायक धर्म) कहा जाता है। निर्वाण के लिए केवल यही ३७ कारक अनिवार्य थे:
यही वह पूर्ण ‘प्रक्रिया’ थी जिसे बुद्ध ने स्वयं मुक्ति के लिए निर्धारित किया। यदि पारमि जैसी कोई अतिरिक्त शर्त आवश्यक होती, तो क्या बुद्ध जैसा कुशल शिक्षक उसे इस सूची से बाहर रखता? यह मानना कठिन है। बुद्ध का आदर्श ‘जन्म-जन्मांतर तक गुण जमा करना’ नहीं, बल्कि ‘इसी वर्तमान जीवन में दुःखों का अंत करना’ था।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग पाँच सौ वर्षों बाद, बौद्ध जगत में एक नया मोड़ आया। महायान परंपरा का उदय हुआ, जिसने अरहंत के बजाय ‘बोधिसत्त्व’ के आदर्श को ऊंचा उठाया। जातक कथाओं और अवदान साहित्य की लोकप्रियता ने “छह पारमिताओं” के अभ्यास को जन्म दिया।
इस महायानी प्रभाव की लहर थेरवाद तक भी पहुँची। धार्मिक प्रतिस्पर्धा के उस दौर में, थेरवाद ने भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए “दस पारमियों” का ढांचा विकसित किया। बुद्धवंस और चरियापिटक जैसे बाद के ग्रंथों में हम पहली बार सुमेध तपस्वी को दस पारमियों का संकल्प लेते हुए देखते हैं। यह परिवर्तन केवल साज़िश नहीं, बल्कि भक्ति, करुणा और लोकधर्म के दबावों से भी उपजा।
यह केवल एक साहित्यिक बदलाव नहीं था, यह एक वैचारिक बदलाव था। अब साधक के लिए एक ऐसे “नायक” की छवि गढ़ दी गई जो अनंत काल तक कष्ट सहकर गुण जमा करता है।
पाँचवीं शताब्दी में आचार्य बुद्धघोष ने इस बदलाव को संस्थागत रूप दे दिया। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध टीकाओं और “विशुद्धिमग्ग” में पारमि के सिद्धांत को इतनी मजबूती से पिरोया कि वह मूल शिक्षा जैसा लगने लगा।
उन्होंने पारमियों को तीन स्तरों (पारमि, उप-पारमि, परमत्थ पारमि) में बांटा। इसका परिणाम गहरा हुआ—साधना का लक्ष्य “इसी वर्तमान जीवन में” (“दिट्ठधम्म”) से खिसक कर “भविष्य के किसी जन्म” पर चला गया।
परिणामस्वरूप, मूल समाधि ( झान ) का अभ्यास कठिन और दुर्लभ माना जाने लगा, और “सूखी विपस्सना” जैसी नई विधियाँ, जो सूत्रों में वर्णित अभ्यास से भिन्न प्रतीत होती हैं, प्रचलन में आ गईं। यह मान लिया गया कि इस युग में निर्वाण संभव नहीं है, इसलिए पारमि जमा करो और अगले बुद्ध का इंतजार करो।
आइए, ऐतिहासिकता से परे हटकर, शुद्ध तर्क और बुद्ध के वचनों के आधार पर पारमि सिद्धांत की परीक्षा करें। यहाँ कई विरोधाभास उभरते हैं:
पारमी सिद्धांत कहता है कि बुद्धत्व या अरहत्व के लिए ‘दान पारमि’ का संचय अनिवार्य है। यदि ऐसा होता, तो सभी अरहंतों को पूर्वजन्मों के पुण्य से इस जन्म में अत्यंत धनवान होना चाहिए था। लेकिन इतिहास कुछ और ही कहता है। बुद्ध के समय में और आज भी, अनेक अरहंत अत्यंत निर्धन परिवारों से आए। पिछली सदी के महान थाई अरण्य-परंपरा के अरहंत (जैसे अजाह्न मुन, अजाह्न छा) अत्यंत गरीब किसान परिवारों में जन्मे थे। इसके विपरीत, धनवान राजाओं और सेठों में अरहत्व के उदाहरण नगण्य हैं। यह सिद्ध करता है कि मुक्ति का संबंध पिछले जन्म के बैंक-बैलेंस से नहीं है।
आजकल यह धारणा प्रचलित है कि “मेरी पारमि कम हैं, इसलिए मैं घर नहीं छोड़ पा रहा।” यह एक बहाना है। भगवान बुद्ध ने अपने चचेरे भाई महानाम शाक्य से ( चूळदुक्खक्खन्ध सुत्त ) स्पष्ट कहा था: “तुम्हारे अंदर लोभ, द्वेष और मोह हैं, इसलिए तुम घर में रह रहे हो।” उन्होंने यह नहीं कहा कि “तुम्हारी पारमि अपरिपक्व हैं।” घर छोड़ने में बाधा ‘क्लेश’ हैं, न कि कल्पों के संचित गुणों की कमी।
क्या बुद्ध ने कभी अरहंत बनने के लिए गुणों की लंबी चेकलिस्ट मांगी? नहीं। भगवान ने धर्मोपदेश के समय स्पष्ट किया कि सत्य को समझने के लिए केवल दो न्यूनतम गुण आवश्यक हैं:
बस! यदि व्यक्ति ईमानदार और समझदार है, तो वह ‘बोधिपक्खिय धम्म’ का अभ्यास कर इसी वर्तमान जीवन में सात वर्षों में मुक्त हो सकता है। यहाँ ‘पारमि’ की कोई शर्त नहीं रखी गई।
कुछ साधक जल्दी मुक्त होते हैं और कुछ देर से—पारमी सिद्धांत इसे “पिछले जन्मों के संचय” से जोड़ता है। लेकिन बुद्ध ने इसका कारण अलग बताया है। उन्होंने इसे “इन्द्रिय परोपरियत्त” कहा है। यदि साधक की पाँच इन्द्रियाँ (श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा) तीक्ष्ण हैं, तो वह तुरंत मुक्त होगा। यदि मंद हैं, तो समय लगेगा। यह ‘वर्तमान क्षमता’ और ‘स्वभाव’ की बात है, न कि अतीत के किसी उधार की। इन इन्द्रियों को इसी जन्म में विकसित किया जा सकता है।
यदि जन्म-जन्मांतर का पुण्य संचय ही आधार होता, तो सैकड़ों हत्याएं करने वाला अंगुलिमाल या समाज द्वारा तिरस्कृत सुनीत उसी जीवन में अरहंत कैसे बनते? उनका पिछला कर्म (जो पापमय था) बाधा क्यों नहीं बना? सत्य यह है कि उनका वर्तमान तीक्ष्ण पुरुषार्थ और सही विधि उनके अतीत पर भारी पड़ी। यह सिद्ध करता है कि ‘वर्तमान क्षण’ की जाग्रति, ‘अतीत के कल्पों’ के संचय से अधिक शक्तिशाली है।
थेरवाद में पारमि का सिद्धांत निस्संदेह प्रेरणादायक है। उसने सामाजिक नैतिकता और धैर्य को सुदृढ़ किया है। किंतु उसे बुद्ध की मूल “विमुक्ति-प्रणाली” मान लेना, ऐतिहासिक और तार्किक, दोनों दृष्टियों से संदिग्ध प्रतीत होता है। यह एक सांस्कृतिक आवरण है जो समय की धूल के साथ जम गया है।
आज जब हम धर्म को उसकी गहराई में समझना चाहते हैं, तो हमें उस धूल को झाड़ना होगा। बुद्ध का मार्ग किसी रहस्यमयी संचय का मार्ग नहीं है। वह एक सीधा प्रयोगात्मक मार्ग है—स्मृति, समाधि और प्रज्ञा का। वह मार्ग, जो लोभ, द्वेष और मोह को भविष्य में नहीं, बल्कि अभी नष्ट करने की बात करता है।
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