
त्रिशरण
— आर्य सुरक्षा का घेरा —
जीवन की भागदौड़ में अक्सर हम खुद को अकेला, असहाय या उलझन में पाते हैं। बाहर दुनिया का शोर है और भीतर चिंताओं का। ऐसे समय में, हर इंसान एक ऐसी जगह तलाशता है जहाँ उसे गहरी सुरक्षा, शांति और सही दिशा मिल सके।
बौद्ध धर्म में उस सुरक्षित स्थान को ‘तिसरण’ (त्रिशरण) कहा गया है। यह धर्म के मार्ग पर हमारा पहला कदम है। यह कोई रस्म नहीं, बल्कि एक भरोसा है—कि अब हम अपनी मनमानी, ज़िद या अहंकार के सहारे नहीं, बल्कि बुद्ध की जागृति के सहारे जियेंगे।
जब हम सच्चे दिल से ‘शरण’ लेते हैं, तो एक भीतरी स्थिरता महसूस होती है। हमें एहसास होता है: “मैं अब अकेला नहीं हूँ।”
हम इन तीन रत्नों को अपना सच्चा मार्गदर्शक स्वीकार करते हैं:
बुद्धं सरणं गच्छामि।
धम्मं सरणं गच्छामि।
सङ्घं सरणं गच्छामि।
अर्थात—
मैं धम्म (सच्चाई/नियम) की शरण जाता हूँ।
मैं संघ (आर्य सत्पुरुषों) की शरण जाता हूँ।
जब हम त्रिशरण लेते हैं, तो यह प्रक्रिया किसी चमत्कार की तरह काम करती है:
जैसे बंद कमरे की खिड़कियाँ खोलने पर ताजी हवा भीतर आती है, वैसे ही शरण लेने पर हमारा हृदय नए विचारों और सत्य के लिए खुल जाता है। यह समर्पण हमें विनम्र बनाता है। हमारी पुरानी अकड़ पिघलने लगती है और हम धर्म को सोखने के लिए तैयार हो जाते हैं।
अब तक हम अपने ‘मन’ या ‘अहंकार’ की आवाज़ सुनकर फैसले लेते थे, जो अक्सर हमें भटकाती थी। शरण लेने के बाद हमारा उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। अब हमारा मार्गदर्शक बुद्ध का धर्म है—न कि हमारे अहंकार की डरी हुई आवाज़।
बुद्ध हमें उस अज्ञान के दलदल से बाहर निकालते हैं जहाँ हम फँसे हुए हैं। उनका ज्ञान केवल ऊपरी नहीं है; वे हमें ऐसे सिद्धांतों से अवगत कराते हैं जो हमारे मन की उन गहरी, अवचेतन आदतों को उजागर कर देते हैं, जो हमारे दुःखों की असली जड़ हैं।
जब हम अपनी पुरानी अज्ञानता का बोझ उतार फेंकते हैं और जीवन को बुद्ध की दृष्टि (आर्यसत्य) से देखना शुरू करते हैं, तो जीवन की दिशा बदल जाती है। वही दुःख-चक्र, जो पहले हमें पीड़ा और अंधकार की ओर धकेल रहा था, अब धर्म-चक्र बनकर विपरीत दिशा में घूमने लगता है—और हमें दुःख मुक्ति की ओर ले जाता है।
आइये, इस अहंकार के बोझ को उतारकर बुद्ध की शरण में हल्का महसूस करें।