✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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चौथा कदम

कर्तव्य

— सफल समाज की नींव —
✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ६ मिनट
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संसारिक जिम्मेदारियों का पालन करना धर्म का उतना ही आवश्यक हिस्सा है, जितना कि शील का पालन। हमारे हर कर्म की एक गूँज होती है। जब हम किसी अपने को कष्ट देते हैं, तो हमारी अपनी शांति भंग होती है; और जब हम उन्हें राहत देते हैं, तो हमारा अपना जीवन खिल उठता है। इसी आधार पर हमारा भविष्य तय होता है।

बुद्ध कहते हैं कि एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति वह नहीं जो सिर्फ एकांत में माला जपे, बल्कि वह है जिसके संपर्क में आकर उसके माता-पिता, पत्नी-बच्चे और मित्र सुख और सुरक्षा महसूस करें।

“बाहर देवता, घर में…”

अक्सर हम एक बड़ी भूल कर बैठते हैं। हम बाहरी दुनिया—दफ्तर या दोस्तों—के बीच तो बड़ी समझदारी और मिठास से पेश आते हैं, जिससे हमें वहां सम्मान भी मिलता है। लेकिन, घर की दहलीज पार करते ही हमारा मुखौटा उतर जाता है। हम अपने ही उन लोगों के साथ कटु, रूखे और आक्रामक हो जाते हैं, जो हम पर आश्रित हैं।

यह केवल ‘अधर्म’ नहीं, बल्कि जीवन का ही एक पतन है। अपनों को मानसिक तनाव देना और उनकी ज़रूरतों के प्रति उदासीन रहना—यह दर्शाता है कि हम भीतर से कितने रूठे हुए, आत्म-केन्द्रित और संवेदन-शून्य होकर रहते हैं।

बाहरी चमक-धमक व्यर्थ है यदि हमारे घर के भीतर अंधेरा है। एक सभ्य इंसान की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने घर की चारदीवारी के बाहर के साथ-साथ भीतर भी कैसा व्यवहार करता है। हमें ऐसे दोहरे जीवन से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा आचरण अंततः हमें इस जीवन में कड़वाहट और परलोक में दुर्गति का पात्र बनाता है।

सही आचरण का लाभ

इसके विपरीत, जब हम अपनों और दूसरों के प्रति दयालु और संवेदनशील होते हैं, तो हम केवल “फर्ज” नहीं निभाते, बल्कि हम अपने लिए एक सुरक्षित और प्रेमपूर्ण भविष्य का निर्माण करते हैं।

सत्कर्मों में संलग्न होकर—जैसे माता-पिता की सेवा, जीवनसाथी का सम्मान और मित्रों का साथ निभाना—हमें वह आत्म-संतोष मिलता है जो किसी भी बाहरी सफलता से बड़ा है। यही वह रास्ता है जो हमारे इहलोक (इस जीवन) और परलोक, दोनों को उज्ज्वल और समृद्ध बनाता है।


छह दिशाओं का रक्षण

भगवान बुद्ध ने हमारे मानवीय रिश्तों को ‘छह दिशाओं’ के रूप में पूजा है।

इसमें सबसे ऊंचा स्थान माता-पिता का है। वे हमारे पहले गुरु हैं। उनके हमारे व्यक्तित्व निर्माण में अमूल्य योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसी तरह, गुरुओं, परिवार और समाज के प्रति हमारे कर्तव्य ही हमारी असली पूजा हैं। भगवान इनमें से कुछ प्रमुख कर्तव्यों को रेखांकित करते हैं—

➤ कोई अपने माता-पिता की सेवा पाँच प्रकार से करता है, (सोचते हुए) —

  • “मैं पला, अब उनका भरण-पोषण करूँगा!”
  • “उनके प्रति कर्तव्य पूर्ण करूँगा!”
  • “कुलवंश चलाऊँगा!”
  • “विरासत की देखभाल करूँगा!”
  • “मरणोपरांत मृतपूर्वजों के नाम दानदक्षिणा करूँगा!”

➤ और, माता-पिता अपने संतान पर पाँच प्रकार से उपकार करते हैं—

  • उसे पाप से रोकते हैं।
  • कल्याण में समर्थन करते हैं।
  • (कमाने का) हुनर सिखाते हैं।
  • उपयुक्त पत्नी ढूंढ देते हैं।
  • तथा समय आने पर अपनी विरासत सौंपते हैं।

➤ कोई अपने गुरुजनों की सेवा पाँच प्रकार से करता है —

  • (उनके सम्मानार्थ) खड़ा होता है।
  • प्रतीक्षा करता है।
  • ध्यान रखता है।
  • सेवा करता है।
  • हुनर सीखकर पारंगत होता है।

➤ और, गुरुजन अपने शिष्य पर पाँच प्रकार से उपकार करते हैं—

  • उसे भलीभांति पढ़ाते हैं, अभ्यास कराते हैं।
  • समझानेवाली शिक्षाओं को समझाते हैं।
  • सभी कलाओं में भलीभांति स्थापित करते हैं।
  • मित्र-सहचारियों को सिफ़ारिश करते हैं।
  • तथा सभी-दिशाओं में सुरक्षा प्रदान करते हैं।

➤ कोई अपनी पत्नी की सेवा पाँच प्रकार से करता है—

  • उसे सम्मान देता है।
  • अपमानित नहीं करता है।
  • निष्ठाहीन (बेवफ़ा) नहीं होता।
  • उस पर ऐश्वर्य (प्रभुत्व स्वामित्व) छोड़ता है।
  • गहने-अलंकार प्रदान करता है।

➤ और पत्नी अपने पति पर पाँच प्रकार से उपकार करती है—

  • (कर्तव्य) कार्यों को सही अंजाम देती है।
  • परिजनों को साथ लेकर चलती है।
  • निष्ठाहीन नहीं होती।
  • भंडार सामग्री की देखभाल करती है।
  • सभी कार्यों में अनालसी हो (बिना आलस किए) निपुण बनती है।

➤ कोई कुलपुत्र अपने मित्र-सहचारियों की सेवा पाँच प्रकार से करता है—

  • दान उपहार से।
  • प्रिय वचनों से।
  • हितकारक देखभाल करने से।
  • समान बर्ताव से।
  • निष्ठा ईमानदारी (बिना छलकपट) से।

➤ और, मित्र-सहचारी कुलपुत्र पर पाँच प्रकार से उपकार करते हैं—

  • बेपरवाह (या मदहोश) हो तो देखभाल करते हैं।
  • बेपरवाह हो तो संपत्ति की देखभाल करते हैं।
  • भयभीत हो तो शरण (रक्षक) बनते हैं।
  • आपदा में छोड़ नहीं देते।
  • संतानों पर कृपादृष्टि रखते हैं।

➤ कोई स्वामी अपने नौकरों पर उपकार पाँच प्रकार से करता है—

  • सामर्थ्य देखकर कार्य देता है।
  • भोजन एवं वेतन देता है।
  • रोग में देखभाल करता है।
  • ख़ास व्यंजन बांटता है।
  • समय पर छुट्टी देता है।

➤ और, नौकर अपने स्वामी की सेवा पाँच प्रकार से करते हैं—

  • पहले उठते हैं।
  • पश्चात सोते हैं।
  • चुराते नहीं हैं।
  • भलीभांति कार्य करते हैं।
  • यशकीर्ति फैलाते हैं।

➤ कोई कुलपुत्र श्रमण-ब्राह्मणों की सेवा पाँच प्रकार से करता है—

  • उनके प्रति सद्भावपूर्ण कायाकर्म करता है।
  • उनके प्रति सद्भावपूर्ण वाणीकर्म करता है।
  • उनके प्रति सद्भावपूर्ण मनोकर्म करता है।
  • उनके लिए घर खुला करता है।
  • उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

➤ और, श्रमण-ब्राह्मण कुलपुत्र पर उपकार छह प्रकार से करते हैं—

  • उसे पाप से रोकते हैं।
  • कल्याण में समर्थन करते हैं।
  • मन से कल्याणकारी उपकार करते (कृपादृष्टि रखते) हैं।
  • अनसुना (धर्म) सुनाते हैं।
  • सुने (धर्म) को स्पष्ट करते हैं।
  • स्वर्गमार्ग दिखाते हैं।

— दीघनिकाय ३१ : सिंगालसुत्त

कर्तव्य ही असली पूजा है

यहाँ ध्यान दें कि यह सूची परिपूर्ण और अंतिम नहीं है। ये रिश्ते और कर्तव्य समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। एक जागरूक व्यक्ति वह है जो बिना कहे यह समझ ले कि “इस वक्त सामने वाले को मुझसे क्या चाहिए?”

जब हम अपनी जिम्मेदारियों से भागते नहीं, बल्कि उन्हें ‘सेवा’ मानकर निभाते हैं, तो हमारा घर ही मंदिर बन जाता है। यही वह पुण्य है जो लोक और परलोक, दोनों में हमारी रक्षा करता है।

(व्रत-कर्तव्यों के बारे में विस्तार से जानने के लिए पुण्य पुस्तक का यह 👉 व्रत अध्याय पढ़ें!)



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