
भावना
— चित्त को साधना —
अब तक हमने जो कुछ भी सीखा—दान, शील, कर्तव्य—वह हमारे बाहरी व्यवहार को सुधारता है। लेकिन हमारे दुःखों की असली जड़ें चित्त की उस गहराई में छिपी होती हैं जहाँ हमारी पहुँच आसानी से नहीं होती—यानी हमारा अवचेतन मन।
अक्सर हम जानते हैं कि “गुस्सा करना बुरा है,” फिर भी गुस्सा आ जाता है। क्यों? क्योंकि केवल बुद्धि के स्तर पर जानना काफी नहीं है। हमें चित्त को भीतर से बदलना होगा।
बौद्ध धर्म में इसे ‘भावना’ कहते हैं। इसका अर्थ है—मन के भीतर अच्छे गुणों की खेती करना। ये गुण—जैसे सद्भावना, करुणा, शांति, एकाग्रता और अंतर्ज्ञान—हमारे भीतर की पुरानी, अकुशल प्रवृत्तियों को कम करते-करते अंततः उन्हें समाप्त तक कर देते हैं। जैसे हम बागीचे में से खरपतवार निकालकर सुंदर फूल लगाते हैं, वैसे ही ध्यान के जरिए हम चित्त से जलन और नफरत निकालकर उसमें मैत्री और शांति के पौधे लगाते हैं।
ध्यान साधना हमारे भीतर वह प्रज्ञा (अंतर्ज्ञान) जगाती है, जो अवचेतन मन में एक ऐसा सुरक्षा-तंत्र विकसित कर देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा होश और संतुलन बना रहे। जब हम इन कुशल भावनाओं को विकसित करने का संकल्प लेते हैं, तो सफलता निश्चित है।
आइये, एक तरह की मेत्ता भावना को आजमाते हैं।
भगवान बुद्ध ने मेत्ता (सद्भावना) के मार्ग को कई सूत्रों में विस्तार से समझाया है। यहाँ हम उन शिक्षाओं का सार प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि आप सहजता से उनका अनुसरण कर सकें।
सद्भावना विकसित करने से पहले, अपने मन की भूमि को तैयार करना आवश्यक है:
अब किसी एकांत स्थान पर जाकर, आरामदायक मुद्रा में पालथी मारकर बैठ जाएँ। अपनी काया को सीधा रखें। गहरी साँस लें और मन को शांत और स्थिर होने दें।

अब इस प्रकार अभ्यास प्रारंभ करें:
दूसरों को प्रेम देने से पहले, खुद को प्रेम से भरना ज़रूरी है।
मैं पूर्णतः निर्बैर हो जाऊँ।”
पहले इस वाक्य को मन में पूरी तल्लीनता और गहराई से दोहराएं। इसे केवल शब्दों तक सीमित न रखें; इसे अपनी वास्तविकता बनने दें। महसूस करें कि आपके भीतर से कड़वाहट पिघल रही है। जब यह भावना आपके हृदय में सजीव हो जाए, तो इसे अपने आचरण और दृष्टिकोण में उतरने दें।
मैं पूर्णतः निर्द्वेष हो जाऊँ।”
इस भावना की शुरुआत अपने प्रियजनों से करें, जिनके लिए प्रेम जगाना सहज है। फिर धीरे-धीरे, जैसे आग की गर्मी फैलती है, वैसे ही इस भाव को उन लोगों तक फैलाएं जिन्हें आप कम जानते हैं, और अंत में उन तक जिन्हें आप नापसंद करते हैं।
इसके बाद, इन संकल्पों को गहराई से अनुभव करें:
मैं पूर्णतः घृणारहित और पीड़ारहित हो जाऊँ।”
“मैं सभी को उनके द्वारा किए गए बुरे कर्मों के लिए क्षमा करता हूँ
—चाहे वे शारीरिक हों, वाणी से हों या मन से—
मैं सभी को मुक्त करता हूँ।”
“मैं अपने बुरे कर्मों के लिए सभी से क्षमा चाहता हूँ।
मुझे क्षमा मिले।”
अब अपने लिए और जगत के लिए मंगल कामना करें:
मैं सुखी होऊँ।
मैं शांत, स्वस्थ और सुरक्षित रहूँ।”
“सभी प्राणियों के कष्ट दूर हों।
सभी सुखी हों।
सभी शांत और स्वस्थ रहें।”
“इस ब्रह्मांड के सभी जीव
—चाहे वे दुर्बल हों या बलवान,
दृश्य हों या अदृश्य,
समीप हों या दूर,
जन्मे हों या जन्म लेने वाले हों—
सभी के कष्ट दूर हों।
सभी सुखी और सुरक्षित रहें।”
“कोई भी प्राणी किसी की हिंसा न करे।
न क्रोध हो, न घृणा, न लालच।
कोई किसी का अहित न चाहे।
सभी अपने दुःखों से मुक्ति पाएं और सद्गति प्राप्त करें।”
“सभी प्राणी पुण्य करें,
शांति प्राप्त करें,
और उज्जवल मार्ग की ओर बढ़ें।
सबका कल्याण हो।”
आपकी सद्भावना कितनी गहरी हो? बुद्ध कहते हैं:
जैसे एक माँ अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों के प्रति असीम और निष्काम सद्भावना उत्पन्न करें।"
जब आपकी सद्भावना गहरी हो जाए और शरीर में ऊर्जा की तरह प्रवाहित होने लगे, तब उसे विस्तार दें।
जैसे कोई बलशाली शंख-वादक बिना किसी प्रयास के चारों दिशाओं को अपनी गूँज से भर देता है, वैसे ही अपनी मैत्री की गूँज को फैलाएं—
सुखी हों, निर्बैर हों, स्वस्थ हों, सुरक्षित हों…”
“दक्षिण दिशा…
पश्चिम दिशा…
उत्तर दिशा…
ऊपर…
नीचे…
सभी दिशाओं के सभी मानव और अमानवीय प्राणी
सुखी हों, निर्बैर हों, स्वस्थ हों, सुरक्षित हों…”
“दुनिया में मित्रता, प्रेम और सहयोग की भावना प्रबल हो।
विश्व में शांति स्थापित हो।”

इसी तरह आप करुणा, मुदिता (दूसरों की खुशी में खुश होना) और उपेक्षा (तटस्थता) के भावों को भी सभी दिशाओं में फैला सकते हैं।
जब इन चारों भावों का सम्यक अभ्यास किया जाता है, तो ‘ब्रह्मविहार’ परिपूर्ण होता है और साधक असीम पुण्य का भागीदार बनता है।
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