
श्रोतापन्न
— धर्म के प्रवाह में प्रवेश —
धर्म की सच्चाई उसके ऊँचे दावों से नहीं, बल्कि उससे उपजने वाले परिणामों से सिद्ध होती है। बुद्ध कहते हैं कि इस धर्म की कसकर परीक्षा लेनी चाहिए और इसके दावों को अपनी कसौटी पर परखना चाहिए।
लेकिन इस परीक्षण की शुरुआत करने से पहले, धर्म को ठीक से समझना और धारण करना अनिवार्य है। बुद्ध के अनुसार, धर्म का प्रथम फल—‘श्रोतापन्न’—चखने के लिए इन चार घटकों को पूर्ण करना आवश्यक है।
जो इन चार अंगों को सिद्ध कर लेता है, वह ‘भवसागर’ से छूटकर ‘धर्म की धारा’ में आ जाता है, जो सीधे निर्वाण की ओर ले जाती है।
धर्म की धारा में बहने के लिए, सबसे पहले एक सच्चे धार्मिक व्यक्ति (कल्याण-मित्र) से जुड़ना आवश्यक है। बुद्ध के अनुसार, ऐसा सत्पुरुष श्रद्धा, शील, त्याग और प्रज्ञा (अन्तर्ज्ञान) से संपन्न होना चाहिए।
उसका चरित्र शुद्ध हो और वह धर्म के सिद्धांतों को केवल बोलता न हो, बल्कि जीता हो।
एक सच्चे सत्पुरुष की पहचान उसकी विनम्रता है। वह अपने दुर्गुणों को छिपाने के बजाय अपने सद्गुणों को छिपाता है। और दूसरों के दुर्गुणों को उजागर करने के बजाय उनके सद्गुणों को बताता है।
बुद्ध का सुझाव है कि ऐसा सत्पुरुष मिलने पर—चाहे वह उम्र में छोटा हो या बड़ा—उससे मित्रता करनी चाहिए। उससे प्रश्न पूछकर अपनी शंकाओं का समाधान करें और उसके गुणों (श्रद्धा, शील, त्याग, प्रज्ञा) को अपने भीतर उतारने का प्रयास करें।
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धर्म का परीक्षण करने के लिए, मिलावटी नहीं, बल्कि प्रामाणिक धर्म को सुनना अनिवार्य है। यदि हम धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वासों या सामाजिक रस्मों को ही ‘धर्म’ मान लेंगे, तो हम कभी सच्चाई तक नहीं पहुँच पाएंगे।
जैसे एक वैज्ञानिक प्रयोग करने से पहले सिद्धांत के सही पहलुओं को जानता है, वैसे ही हमें भी केवल बुद्ध द्वारा प्रतिपादित शुद्ध और अप्रदूषित धर्म को सुनना चाहिए। अफवाहों या निजी राय को नहीं, बल्कि मूल वचनों को आधार बनाएं।
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अक्सर हमारा मन ऐसी बाहरी या बेकार की बातों में उलझा रहता है जो हमारे चित्त को मैला कर देती हैं। इसे ‘अयोनिसो मनसिकार’ (अनुचित चिंतन) कहते हैं—जैसे कामुकता, भविष्य की चिंता, या अस्तित्व का डर।
बुद्ध हमें ‘योनिसो मनसिकार’ (उचित चिंतन) का अभ्यास करने की सलाह देते हैं। हमें बाहरी प्रपंचों के बजाय इन चार सत्यों (आर्यसत्य) पर चिंतन करना चाहिए:

जब हम व्यर्थ की चिंताओं को छोड़कर इन सत्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारी अंतर्दृष्टि गहरी होकर मुक्ति की आशंका बढ़ती है।
सिर्फ सुनना या जानना काफी नहीं है; सही दिशा में चलना भी ज़रूरी है।
कुछ लोग धर्म सुनने के बाद भी अपनी मनमानी करते हैं, या शॉर्टकट ढूँढते हैं। कुछ लोग अपनी पसंद की साधना को ही पकड़ कर बैठ जाते हैं, और जो साधना वास्तव में ज़रूरी है (जैसे अशुभ भावना), उसे छोड़ देते हैं।
सफलता की कुंजी है—‘धर्मानुसार धर्म का आचरण’। जो साधना आपके लिए बताई गई है, उसे बिना फेरबदल किए, बुद्ध के बताए सटीक तरीके से जीवन में उतारना। जब हम अपनी मनमर्जी छोड़कर विधि-विधान से चलते हैं, तभी फल मिलता है।
जब किसी व्यक्ति में ये चार घटक—सत्पुरुष की संगति, सद्धर्म का ज्ञान, सही चिंतन और धर्मानुसार आचरण—पूर्ण हो जाते हैं, तब वह व्यक्ति संसार की बाढ़ को पार कर ‘धर्म की धारा’, अर्थात श्रोतापन्न अवस्था में प्रवेश कर सकता है।
अब उसका भटकना समाप्त हुआ। उसका निर्वाण की ओर बहना तय है।