✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
— शुरुवात कैसे करें? —
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तीसरा कदम

पंचशील

— मन का सुरक्षा कवच —
✍️ लेखक: भिक्खु कश्यप | ⏱️ ६ मिनट
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भगवान बुद्ध के अनुसार, जीवन में ये पाँच-शील अत्यावश्यक हैं। इनका पालन हर समय और हर परिस्थिति में करना हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा है।

ये शील केवल कोई सामाजिक रिवाज या नैतिक मान्यता नहीं, बल्कि प्रकृति के नियम हैं। इसे धारण करने से हम किसी और पर उपकार नहीं करते, बल्कि स्वयं पर करते हैं। क्योंकि जब हम आग छूते हैं, तो हाथ हमारा ही जलता है। उसी तरह, हमारे दुष्कर्मों से दूसरे आहत हों या न हों, हम स्वयं भीतर से अवश्य घायल होते हैं। पंचशील हमें इसी ‘आहत होने’ की प्रक्रिया से बचाते हैं।

यह हमारी आत्मरक्षा का सबसे प्रबल साधन है।

अक्सर हम न चाहते हुए भी गलतियां कर बैठते हैं। इसका कारण है कि जब किसी को भीतर से लोभ, द्वेष या मोह जकड़ लेता है, तो वह बेकाबू हो जाता है। इसी बेहोशी में वह कई प्रकार के पाप करता है।

वही पाप आगे चलकर हमारे दीर्घकालिक दुःख और असुरक्षा का कारण बनते हैं। इसके विपरीत, जब हम इन पाँच शीलों का पालन करते हैं, तो हमारे भीतर तीन बड़े बदलाव आते हैं:

  • आत्म-सम्मान: हम अपनी नज़रों में ऊँचे उठते हैं।
  • निर्भयता: हमें किसी के सामने सिर झुकाने या डरने की ज़रूरत नहीं रहती।
  • समाधि की नींव: एक साफ़ और पश्चाताप-मुक्त मन ही गहरे ध्यान में उतर सकता है।

एक सुखी जीवन के लिए बुद्ध हमें इन पाँच बातों को जीवन में उतारने की सलाह देते हैं:

१. जीवहत्या से विरत>कोई व्यक्ति हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहता है—डंडा एवं शस्त्र फेंक चुका, लज्जावान और दयावान, समस्त जीवों के हित के प्रति करुणामयी।"

हम केवल किसी को मारने से ही नहीं बचते, बल्कि हम समस्त जीवों के प्रति दयालु और संवेदनशील बनते हैं। जब हम दूसरों को अभयदान (जीवन का दान) देते हैं, तो हम खुद भी निडर होकर जीते हैं।


२. चोरी से विरत>वह ‘न सौंपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहता है। गांव या जंगल से न दी गई, न सौंपी, पराई वस्तु चोरी की इच्छा से नहीं उठाता, नहीं लेता है। बल्कि मात्र सौंपी चीज़ें ही उठाता, स्वीकारता है। पावन जीवन जीता है, चोरी-छिपे नहीं।"

हम मेहनत की कमाई पर भरोसा करते हैं। पराई वस्तु या हक़ को हड़पने की इच्छा छोड़ने से हमारे भीतर एक राजा जैसी संतुष्टि और बेफिक्री आती है। हमें कुछ भी छिपाने की ज़रूरत नहीं रहती।


३. व्यभिचार से विरत>वह कामुक मिथ्याचार त्यागकर व्यभिचार से विरत रहता है। वह उनसे संबन्ध नहीं बनाता है—जो माता से संरक्षित हो, पिता से संरक्षित हो, भाई से संरक्षित हो, बहन से संरक्षित हो, रिश्तेदार से संरक्षित हो, गोत्र से संरक्षित हो, धर्म से संरक्षित हो, जिसका पति (या पत्नी) हो, जिससे संबन्ध दण्डनिय हो, अथवा जिसे अन्य पुरुष ने फूल से नवाजा (=मंगेतर या प्रेमसंबन्ध) हो।"

यह शील हमारे रिश्तों की पवित्रता और भरोसे की नींव है। हम उन रिश्तों का सम्मान करते हैं जो सामाजिक या नैतिक रूप से वर्जित हैं (जैसे परस्त्री/परपुरुष गमन)। वफादारी और संयम से परिवार में गहरा विश्वास और सुख पनपता है।


४. असत्य से विरत>वह झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ व भरोसेमंद बनता है; दुनिया को ठगता नहीं। जब उसे नगरबैठक, गुटबैठक, रिश्तेदारों की सभा, अथवा किसी संघ या न्यायालय में बुलाकर गवाही देने कहा जाए, “आईये! बताएँ श्रीमान! आप क्या जानते है?”

तब यदि वह न जानता हो तो कहता है “मैं नहीं जानता!” यदि जानता हो तो कहता है “मैं जानता हूँ!” यदि उसने न देखा हो तो कहता है “मैंने नहीं देखा!” यदि देखा हो तो कहता है “मैंने ऐसा देखा!” इस तरह वह आत्महित में, परहित में, अथवा ईनाम की चाह में झूठ नहीं बोलता है।"

झूठ हमें कमज़ोर करता है क्योंकि उसे याद रखना पड़ता है। आज के दौर में, जहाँ सोशल मीडिया पर ‘फिल्टर’ वाली छवि दिखाने का चलन है, सत्य बोलना एक साहस है। सच बोलने वाला व्यक्ति मज़बूत, भरोसेमंद और निडर होता है।


५. नशे से विरत>वह शराब मद्य आदि त्यागकर, मदहोश करने वाले नशेपते से विरत रहता है।"

अक्सर लोग तनाव या गम भुलाने के लिए नशे का सहारा लेते हैं, लेकिन नशा हमारी सोचने-समझने की शक्ति को कुंद कर देता है। नशा केवल शराब का नहीं, बल्कि घंटों तक रील देखने या स्क्रीन में खोए रहने का भी हो सकता है, जो हमारे होश को छीन लेता है। बुद्ध हमें समस्याओं से भागने का नहीं, बल्कि पूरे होश और जागरूकता के साथ उनका सामना करने का रास्ता दिखाते हैं।


शील: एक महादान

बुद्ध के अनुसार पंचशील एक महादान है। उसका पालन करके हम अपने आसपास के असंख्य जीवों को एक बहुत बड़ा दान (अभयदान) देते हैं—यह भरोसा दिलाते हैं कि “तुम्हें मुझसे कोई खतरा नहीं है।”

जब हम असंख्य सत्वों को खतरे, शत्रुता, और पीड़ा से मुक्ति (अभयदान) प्रदान करते हैं, तो कुदरत का नियम हमें भी खतरे, शत्रुता और पीड़ा से असीम मुक्ति में भागीदार बनाता है।

किसी भी कर्म को करने से पहले, करते समय, और करने के बाद खुद से यह प्रश्न पूछें:

  • “क्या यह कर्म पीड़ादायक है/था?”
  • “क्या इससे मुझे या किसी और को कष्ट होगा/हुआ?”

इस तरह अपनी चेतना और उसके परिणाम पर लगातार ध्यान देते रहें।

आदर्श नैतिकता

एक अभ्यासी का शील ऐसा होना चाहिए, जैसा बुद्ध ने वर्णित किया है:>वह आर्यपसंद शील से संपन्न होता है — जो अखंडित रहें, अछिद्रित रहें, बेदाग रहें, बेधब्बा रहें, निष्कलंक रहें, विद्वानों द्वारा प्रशंसित हो, छुटकारा दिलाते हो, और समाधि की ओर बढ़ाते हो।"

लेकिन, यदि पुरानी बुरी आदत हावी हो जाए, तो निराश न हों।

  • पुनः शुरुआत करें: फिर से त्रिशरण और पंचशील लें।
  • सहयोग लें: अगर अकेले शील पालन में कठिनाई हो, तो संघ (सत्पुरुषों) की सहायता लें।
  • मार्गदर्शन: किसी सच्चे व्यक्ति (कल्याण-मित्र) का आधार लें। संघ के सामूहिक अनुभव और ज्ञान से आपको ऐसे रचनात्मक उपाय मिलेंगे, जो आपकी आदतों को बदलने में मददगार होंगे।

(अधिक जानने के लिए पुण्य पुस्तक का यह 👉 शील अध्याय पढ़ें!)


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