
दान
— उदार जीवन की शुरुवात —
सांसारिक जीवन में हम सभी दिन-रात मेहनत करके कमाते हैं, ताकि हमारा और हमारे परिवार का भविष्य सुरक्षित रहे। लेकिन कभी-कभी यह सुरक्षा की चाहत, अनजाने में हमें लालच और स्वार्थ की ओर धकेल देती है। हम जितना जोड़ते हैं, उसे खोने का डर उतना ही बढ़ता जाता है। यह डर हमारे मन को सिकोड़ देता है।
इस डर और संकीर्णता को काटने के लिए भगवान बुद्ध एक बहुत ही सरल और प्रभावशाली उपाय बताते हैं — त्याग।
भगवान एक गृहस्थ के लिए कहते हैं:>वह घर रहते हुए दानी होता है—कंजूसी के मल से छूटा, साफ़ चित्त का, मुक्त त्यागी, खुले हृदय का, उदारता में रत होता, याचनाओं को पूरा करने वाला, दान और संविभाग करने में रत।"
जीवन में अपनी कमाई हुई वस्तु का उपभोग करने का एक सुख है, लेकिन उसे स्वेच्छा से त्याग देने का सुख, भोगने से कहीं गहरा होता है।
जब हम देते हैं, तो हम केवल वस्तु नहीं देते, बल्कि अपने भीतर की ‘पकड़’ को ढीला करते हैं। इससे हमारा हृदय विशाल हो जाता है। हमारा ध्यान ‘मैं’ और ‘मेरा’ से हटकर दूसरों की जरूरतों पर जाने लगता है। यह प्रक्रिया हमें भीतर से हल्का और चिंतामुक्त महसूस कराती है।
बौद्ध धर्म में देने के दो सुंदर पहलू बताए गए हैं:
दान के कुछ पुरस्कार हमें इसी जीवन में तुरंत दिखाई देते हैं:
और सबसे महत्वपूर्ण, दान के गहरे संस्कार हमारे चित्त को इतना कोमल बना देते हैं कि भविष्य में ध्यान और प्रज्ञा के बीज आसानी से अंकुरित हो सकें।
दान अनेक रूपों में किया जा सकता है:
जब दान शुद्ध और जागरूक मन से किया जाए—बिना किसी दिखावे या अहंकार के—तो उसके फलों की मिठास और भव्यता कई गुना बढ़ जाती है। आइये, अपने हाथों को खोलने की कला सीखें और विश्व में खुशियाँ फैलाएँ।
(अधिक जानने के लिए पुण्य पुस्तक का यह 👉 दान अध्याय पढ़ें! और दान के फल को महाफल बनाने के लिए यह 👉 कर्म की गहरी समझ बढ़ाएँ!)