✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
मज्झिमनिकाय

१–५० | ५१–१०० | १०१–१५२

मध्यम निकाय

मध्यम निकाय पालि साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है, जिसमें मध्यम लंबाई के कुल १५२ सूत्र संकलित हैं। इसकी भाषा स्पष्ट, संक्षिप्त और विषय पर केंद्रित है, इसी कारण यह साधकों के बीच सबसे लोकप्रिय और व्यवहारिक निकाय माना जाता है। पाँच निकायों में इसे सबसे रोचक और ज्ञानवर्धक कहना अनुचित नहीं होगा।

इस निकाय में भगवान बुद्ध की विविध साधना-संबंधी शिक्षाएँ सरल और सीधे रूप में प्रस्तुत हैं। कुछ सूत्रों की देशना अग्र भिक्षुओं द्वारा दी गई है, जबकि कई सूत्रों में उनके बीच हुई गहन चर्चाएँ और संवाद सुरक्षित हैं। कहीं-कहीं जातक कथाओं का समावेश भी मिलता है, जो सूत्र को जीवन्त और स्मरणीय बना देता है।

मध्यम निकाय तीन भागों में विभाजित है— मूलपण्णास | मज्झिमपण्णास | उपरिपण्णास

मूलपण्णास

मूलपण्णास, जिसका अर्थ है “मूल पचास”, मज्झिम निकाय का आधारस्तंभ है। यह खंड साधक के लिए ‘रूट मैप’ जैसा है, जो अभ्यास की दिशा तय करता है। इसमें बुद्ध के गंभीर और बुनियादी उपदेशों का संग्रह है, जो धम्म की जड़ें स्थापित करता है। यहाँ बुद्ध प्रायः भिक्षुओं को संबोधित करते हैं और मुक्ति के लिए आवश्यक दार्शनिक दृष्टि और अभ्यास का ढांचा तैयार करते हैं।

📜 १. मूलपरियाय सुत्त

इस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!

📜 २. सब्बासव सुत्त

सभी आस्रवों को खत्म करने के कुल सात उपाय!

📜 ३. धम्मदायाद सुत्त

भगवान बुद्ध के सच्चे वारिस कौन हैं? भगवान के द्वारा बताने पर सारिपुत्त भन्ते भी उसे और उजागर करते हैं।

📜 ४. भयभेरव सुत्त

बोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?

📜 ५. अनङ्गण सुत्त

सारिपुत्त भन्ते यादगार उपमाओं के साथ चित्त के दाग-धब्बों का रहस्य खोलते हैं।

📜 ६. आकङ्खेय्य सुत्त

“अपनी इच्छा-आकांक्षाओं को पूरा कैसे करें?” भगवान बताते हैं।

📜 ७. वत्थ सुत्त

मैले चित्त को धोना किसी मैले वस्त्र को धोने के समान ही है। बस जान लें कि “मैल” क्या हैं।

📜 ८. सल्लेख सुत्त

भगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

📜 ९. सम्मादिट्ठी सुत्त

सारिपुत्त भन्ते सम्यक दृष्टि को अनोखे अंदाज में परिभाषित करते हैं।

📜 १०. महासतिपट्ठान सुत्त

इस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है।

📜 ११. चूळसीहनाद सुत्त

भगवान प्रेरित करते हैं कि उनके शिष्य जाकर दूसरे संन्यासियों के सामने दहाड़े।

📜 १२. महासीहनाद सुत्त

एक पूर्व शिष्य द्वारा निंदा होने पर, भगवान ऐसा उत्तर देते हैं कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए।

📜 १३. महादुक्खक्खन्ध सुत्त

परधम्मी घुमक्कड़ों को लगता हैं कि उनका और बुद्ध का धम्म एक जैसा ही है। तब, भगवान ऐसा धम्म बताते हैं, जो उनके लिए ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो।

📜 १४. चूळदुक्खक्खन्ध सुत्त

भगवान अपने चचेरे भाई को कामुकता के बारे में बताते हैं। साथ ही, जैन साधकों से हुए वार्तालाप का उल्लेख भी करते हैं।

📜 १५. अनुमान सुत्त

महामोग्गल्लान भन्ते अपने भिक्षु साथियों को दुर्वचो और सुवचो पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं।

📜 १६. चेतोखिल सुत्त

यहाँ भगवान चित्त की बंजरता और उसके जंजीरों के बारे में अवगत कराते हैं।

📜 १७. वनपत्थ सुत्त

यहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—हमें कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।

📜 १८. मधुपिण्डिक सुत्त

भगवान के मुख से निकला प्रपंच पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

📜 १९. द्वेधावितक्क सुत्त

अपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।

📜 २०. वितक्कसण्ठान सुत्त

अपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।

📜 २१. ककचूपम सुत्त

आलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।

📜 २२. अलगद्दूपम सुत्त

एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताते हैं।

📜 २३. वम्मिक सुत्त

एक देवता आकर भिक्षु को रहस्यमयी पहेलियाँ देता है, जिसका समाधान भगवान करते हैं।

📜 २४. रथविनीत सुत्त

दो प्रतिभाशाली अरहंत भिक्षु, आपस में धम्मचर्चा करते हुए, विशुद्धिमार्ग के चरणों को उजागर करते हैं।

📜 २५. निवाप सुत्त

मार के चारे से कौन-से साधक बच सकते हैं? हिरणों की उपमा से भगवान समझाते हैं।

📜 २६. पासरासि सुत्त

दुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।

📜 २७. चूळहत्थिपदोपम सुत्त

क्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

📜 २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

सारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

📜 २९. महासारोपम सुत्त

भगवान ब्रह्मचर्य का सार बताते हैं, साथ ही उसके बाहरी छिलकों को भी उजागर करते हैं।

📜 ३०. चूळसारोपम सुत्त

यह पिछले सूत्र की तरह ही ब्रह्मचर्य का सार बताता है, लेकिन अंतिम भाग में मिलावट नजर आती है।

📜 ३१. चूळगोसिङ्ग सुत्त

कलह के समय, भगवान उन तीन भिक्षुओं से मिलते हैं जो स्नेहपूर्वक वन में साधनारत हैं।

📜 ३२. महागोसिङ्ग सुत्त

‘किस तरह का भिक्षु शानदार गोसिङ्ग वन की शोभा होगा?’ प्रसिद्ध भिक्षुओं का अलग-अलग उत्तर।

📜 ३३. महागोपालक सुत्त

यहाँ भगवान एक चरवाहे के गुणों की उपमा देकर भिक्षुओं को सारगर्भित धम्म बताते हैं।

📜 ३४. चूळगोपालक सुत्त

यहाँ भगवान एक यादगार उपमा के साथ हमें पार आने के लिए पुकारते हैं।

📜 ३५. चूळसच्चक सुत्त

एक प्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज, भगवान से सरेआम वाद-विवाद में भिड़ता है।

📜 ३६. महासच्चक सुत्त

वही प्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज, इस बार अकेले में भगवान से वाद-विवाद करता है।

📜 ३७. चूळतण्हासङ्खय सुत्त

भगवान से धम्म सुनने पर भी देवराज इन्द्र मदहोश रहता है। तब महामोग्गल्लान भन्ते उसके रोंगटे खड़े कर उसे होश दिलाते हैं।

📜 ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

एक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतित्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

📜 ३९. महास्सपुर सुत्त

भगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।

📜 ४०. चूळस्सपुर सुत्त

श्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।

📜 ४१. सालेय्यक सुत्त

भगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

📜 ४२. वेरञ्जक सुत्त

यह सूत्र पिछले सूत्र के समान ही है। यहाँ भी भगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

📜 ४३. महावेदल्ल सुत्त

यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

📜 ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

यहाँ उपासक के गहरे सवालों का उत्तर एक प्रसिद्ध भिक्षुणी देती हैं। और क्या ही लाजवाब उत्तर देती हैं!

📜 ४५. चूळधम्मसमादान सुत्त

भगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।

📜 ४६. महाधम्मसमादान सुत्त

भगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

📜 ४७. वीमंसक सुत्त

साधक को गुरु की कड़ी छानबीन करनी चाहिए और श्रद्धा रखने से पहले आँख और कान खुले रखने चाहिए। भगवान बताते हैं कि यह कैसे करना है।

📜 ४८. कोसम्बिय सुत्त

कौशाम्बी के झगड़ालू भिक्षुओं को भगवान स्नेहभाव और एकता का महत्व समझाते हैं।

📜 ४९. ब्रह्मनिमन्तनिक सुत्त

एक हैरतअंगेज सूत्र, जिसमें भगवान जाकर ब्रह्मा की दृष्टि सुधारने का प्रयास करते हैं।

📜 ५०. मारतज्‍जनीय सुत्त

मार महामोग्गल्लान भन्ते को परेशान करता है। तब वे उसे अपनी पूर्वजन्म कथा सुनाते हैं, जिसमें वे स्वयं मार थे।

मज्झिमपण्णास

मज्झिमपण्णास, या “मध्य पचास”, बुद्ध के जीवन के सामाजिक पक्ष को उजागर करता है। यह खंड बुद्ध की करुणा और उनकी अद्भुत संवाद शैली का जीवंत दस्तावेज है। जहाँ पहला खंड दार्शनिक था, वहीं यह खंड ‘संवादात्मक’ है। इस खंड में भगवान बुद्ध का समाज के विभिन्न वर्गों—राजाओं (जैसे राजा पसेनदि), जैन तपस्वियों, ब्राह्मणों और परिब्राजकों—के साथ सबसे अधिक संपर्क दिखाई देता है। अंगुलिमाल जैसे प्रसिद्ध आख्यान इसी खंड का हिस्सा हैं। यह खंड दिखाता है कि बुद्ध ने अपने समय की सामाजिक और धार्मिक चुनौतियों का सामना कैसे किया।

📜 ५१. कन्दरक सुत्त

“मानव स्वभाव अनिश्चित है, जबकि पशु सीधे होते हैं।” इस पर भगवान चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं।

📜 ५२. अट्ठकनागर सुत्त

भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात एक गृहस्थ अमृतद्वार ढूँढ रहा था। आनन्द भन्ते ने उसे ग्यारह अमृतद्वार दिखा दिए।

📜 ५३. सेख सुत्त

जब भगवान को पीठ दर्द हुआ, तब भन्ते आनन्द ने उपदेश की जिम्मेदारी संभाली और शाक्यों को साधना मार्ग का वर्णन किया।

📜 ५४. पोतलिय सुत्त

एक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।

📜 ५५. जीवक सुत्त

क्या बुद्ध अपने लिए मारे गए प्राणी का मांस खाते हैं? भगवान का स्पष्ट उत्तर!

📜 ५६. उपालि सुत्त

एक निगण्ठ उपासक वादविवाद के लिए भगवान के पास जाता है, और भगवान के जादू से दीवाना होकर लौटता है।

📜 ५७. कुक्कुरवतिक सुत्त

प्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।

📜 ५८. अभयराजकुमार सुत्त

अभय राजकुमार को भगवान को दुविधा में डालकर उनका खण्डन करने भेजा जाता है।

📜 ५९. बहुवेदनीय सुत्त

दो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

📜 ६०. अपण्णक सुत्त

यदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

📜 ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त

भगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

📜 ६२. महाराहुलोवाद सुत्त

भगवान अपने युवा पुत्र राहुल को विविध प्रकार की साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं।

📜 ६३. चूळमालुक्य सुत्त

एक भिक्षु भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।

📜 ६४. महामालुक्य सुत्त

भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

📜 ६५. भद्दालि सुत्त

भगवान भिक्षुओं को एक नया नियम पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक भिक्षु साफ मना कर देता है।

📜 ६६. लटुकिकोपम सुत्त

भगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

📜 ६७. चातुम सुत्त

भगवान शोर मचाते भिक्षुओं को निकाल देते हैं, लेकिन उन्हें स्वीकारने पर चार खतरे बताते हैं।

📜 ६८. नळकपान सुत्त

भगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।

📜 ६९. गोलियानि सुत्त

जब एक असभ्य अरण्यवासी भिक्षु संघ में आया, तो सारिपुत्त भन्ते ने आचार और साधना का वास्तविक अर्थ समझाया।

📜 ७०. कीटागिरि सुत्त

एक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।

📜 ७१. तेविज्जवच्छ सुत्त

इस छोटे सूत्र में एक संन्यासी भगवान से उनके “सर्वज्ञ और सर्वदर्शी” होने के दावे के बारे में पूछता है।

📜 ७२. अग्गिवच्छ सुत्त

वह संन्यासी अब भगवान से दुनिया की दस प्रमुख दार्शनिक मान्यताओं के बारे में प्रश्न करता है।

📜 ७३. महावच्छ सुत्त

वह संन्यासी अब अपनी शंका का अंतिम समाधान पूछता है और भिक्षुत्व स्वीकार करता है।

📜 ७४. दीघनख सुत्त

इस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके घुमक्कड़ भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।

📜 ७५. मागण्डिय सुत्त

भगवान को ‘भ्रूण हत्यारा’ कहने वाला घुमक्कड़, भगवान से मिलकर भिक्षुत्व स्वीकार कर अरहंत बनता है।

📜 ७६. सन्दक सुत्त

{#76} आनन्द भन्ते घुमक्कड़ गुरु से चर्चा करते हैं, तो वह अपने सभी शिष्यों को भिक्षु बनने भेज देते हैं।

📜 ७७. महासकुलुदायि सुत्त

विभिन्न पंथों के बीच आपसी संवाद में सभी गुरुओं और उनके शिष्यों के असली चेहरे उजागर होते हैं। भगवान बुद्ध के भी।

📜 ७८. समणमुण्डिक सुत्त

एक घुमक्कड़ भगवान के उपासक को “अजेय श्रमण” के चार गुण बताता है, पर भगवान उसका खंडन कर दस गुण बताते हैं।

📜 ७९. चूळसकुलुदायि सुत्त

इस रोचक और मजेदार चर्चा से घुमक्कड़ों का गुरु भिक्षु बनने का मन बनाता है, लेकिन उसके शिष्य उसे रोक देते हैं।

📜 ८०. वेखनस सुत्त

पिछले सूत्र के घुमक्कड़ सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।

📜 ८१. घटिकार सुत्त

भगवान अपने पुराने मित्र घटिकार कुम्हार की प्रेरणादायी और भावनात्मक जातक कथा सुनाते हैं।

📜 ८२. रट्ठपाल सुत्त

एक नवयुवक, प्रव्रज्या की अनुमति पाने के लिए माता-पिता से संघर्ष करता है, और अरहंत बनकर लौटकर धूम मचाता है।

📜 ८३. मघदेव सुत्त

भगवान की जातक कथा, जिसमें वे ऐसी कल्याणकारी प्रथा स्थापित करते हैं, जो इसके अनुसरणकर्ताओं को ब्रह्मलोक में सद्गति प्रदान करती है।

📜 ८४. मधुर सुत्त

मथुरा का राजा ब्राह्मणों की स्व-घोषित श्रेष्ठता पर भन्ते की राय पूछते हैं, और भन्ते बेझिझक उत्तर देते हैं।

📜 ८५. बोधिराजकुमार सुत्त

राजकुमार मानता है कि परमसुख कठिन तप से मिलता है, सुखद मार्ग से नहीं! इसी पर भगवान का उत्तर।

📜 ८६. अङ्गुलिमाल सुत्त

बौद्ध परम्परा की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक—कुख्यात हत्यारे अँगुलिमाल की रोचक कथा।

📜 ८७. पियजातिक सुत्त

प्रियजनों से आखिर क्या मिलता है? भगवान के शब्द सहज बुद्धि के विपरीत जाते हैं, और समाज में हंगामा मचाते हैं।

📜 ८८. बाहितिक सुत्त

राजा प्रसेनजित आयुष्मान आनंद से भगवान के कर्मों पर प्रश्न पूछता है, और प्रसन्न होकर अपना विदेशी वस्त्र दान करता है।

📜 ८९. धम्मचेतिय सुत्त

भगवान की याद आने पर, राजा प्रसेनजित जाकर भगवान के चरणों को चूमता है और इसका कारण बताता है।

📜 ९०. कण्णकत्थल सुत्त

राजा प्रसेनजित, भगवान की ‘सर्वज्ञ-सर्वदर्शी’ बात की अफवाह सुनकर, सत्य जानने के लिए स्वयं भगवान के पास पहुँचता है।

📜 ९१. ब्रह्मायु सुत्त

१२० वर्ष का वृद्ध ब्राह्मण अपने शिष्य को भगवान के लक्षण देखने भेजता है, और गहन रिपोर्ट पाकर परम-समर्पण करता है।

📜 ९२. सेल सुत्त

एक जटाधारी, जो ब्राह्मण गुरु के प्रति समर्पित है, उसके यहाँ भोजन निमंत्रण पर भगवान उसी गुरु और उसके शिष्यों को भिक्षु बनाकर वहाँ जाते हैं।

📜 ९३. अस्सलायन सुत्त

ब्राह्मणों के प्रोत्साहन पर एक प्रतिभाशाली युवा ब्राह्मण जातिवाद पर भगवान से उलझने की भूल करता है।

📜 ९४. घोटमुख सुत्त

टहलते हुए आया एक अनजान ब्राह्मण भिक्षु से कह उठता है, “प्रव्रज्या अधार्मिक है!” तब भन्ते उसे धम्म बताते हैं।

📜 ९५. चङ्की सुत्त

जम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।

📜 ९६. एसुकारी सुत्त

एक ब्राह्मण भगवान से ब्राह्मण-व्यवस्था पर राय माँगता है, और भगवान खुलकर जवाब देते हैं।

📜 ९७. धनञ्जानि सुत्त

सारिपुत्त भन्ते एक मदहोश ब्राह्मण को पापकर्म से धम्म में लाते हैं और मृत्यु-क्षण में उसकी सद्गति सुनिश्चित करते हैं।

📜 ९८. वासेट्ठ सुत्त

“ब्राह्मण जन्म से होता है या कर्म से?”—इस प्रश्न पर उलझे दो युवा ब्राह्मण अपना मतभेद सुलझाने के लिए भगवान के पास पहुँचते हैं।

📜 ९९. सुभ सुत्त

एक विख्यात ब्राह्मण-पुत्र भगवान से मिलने आता है, और गाली-गलौच तक करने के बाद अंततः शरण ग्रहण करता है।

📜 १००. सङ्गारव सुत्त

एक ब्राह्मण स्त्री के भगवान को याद करते ही चिढ़ा युवा ब्राह्मण, भगवान से मिलकर स्वयं उपासक बन जाता है।

उपरिपण्णास

उपरिपण्णास, अर्थात “अंतिम पचास”, मज्झिम निकाय का समापन खंड है। यह खंड उच्च साधना और धम्म के सूक्ष्म तकनीकी विश्लेषण के लिए जाना जाता है। शैली की दृष्टि से यह पिछले दो खंडों से भिन्न है। इस खंड के सुत्त, विशेषकर ‘विभंग’ (विश्लेषण) वाले सुत्त, बाद के ‘अभिधम्म’ साहित्य के लिए आधार बने। इसमें ‘धातुओं’ और ‘आयतन’ का सूक्ष्म तकनीकी विश्लेषण है। यहाँ बुद्ध धर्म के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को अत्यंत गहराई से वर्गीकृत करते हैं।

📜 १०१. देवदह सुत्त

इस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।

📜 १०२. पञ्चत्तय सुत्त

यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

📜 १०३. किन्ति सुत्त

इस सूत्र में भगवान भिक्षुओं को आपसी असहमति होने पर उससे निपटने के सही तरीक़े बताते हैं।

📜 १०४. सामगाम सुत्त

निगण्ठ नाटपुत्त (महावीर जैन) के निधन पर जैन समुदाय में भारी कलह हुआ। इसी पर भगवान ने आनन्द को संघ में विवाद निपटाने के तरीके बताए।

📜 १०५. सुनक्खत्त सुत्त

जो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।

📜 १०६. आनेञ्जसप्पाय सुत्त

यहाँ भगवान कामुकता से परे जाने के ठोस साधना-मार्ग बताते हैं, और अंततः उन्हें भी लाँघने की प्रेरणा देते हैं।

📜 १०७. गणकमोग्गल्लान सुत्त

“जब निर्वाण, निर्वाण-मार्ग और मार्गदर्शक तथागत विद्यमान हैं, तो सभी शिष्य अरहंत क्यों नहीं होते?”—इस प्रश्न पर भगवान का प्रसिद्ध उत्तर!

📜 १०८. गोपकमोग्गल्लान सुत्त

“भगवान के परिनिर्वाण के बाद भिक्षुसंघ कैसे चलता है और उसका नेतृत्व कौन करता है?"—इस पर आनन्द भन्ते के उत्तर।

📜 १०९. महापुण्णम सुत्त

पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे भगवान भिक्षुओं से घिरे होते हैं। ऐसे रोमहर्षक अवसर को भाँपकर एक भिक्षु भगवान से प्रश्नोत्तर करता है।

📜 ११०. चूळपुण्णम सुत्त

पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे, भगवान स्वयं रोमहर्षक अवसर को भाँपकर, सत्पुरुष और असत्पुरुष की व्याख्या करते हैं।

📜 १११. अनुपद सुत्त

भगवान सारिपुत्त भन्ते की धम्म-विपश्यना की कथा बताते हैं, जो समाधि की सभी अवस्थाओं से गुजरते हुए निरोध अवस्था तक पहुँचती है।

📜 ११२. छब्बिसोधन सुत्त

यदि कोई भिक्षु अरहंत होने का दावा करें, तो न तो जश्न मनाएँ और न ही उसे नकार दें। बल्कि उससे ये पाँच प्रश्न पूछें।

📜 ११३. सप्पुरिस सुत्त

भगवान यहाँ विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से असत्पुरुष भिक्षु और सत्पुरुष भिक्षु के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।

📜 ११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त

भगवान यहाँ धम्म की जटिलता को हटाकर एक सीधा मापदंड सामने रखते हैं—कि कौन-सी बात अपनाने योग्य है और कौन-सी नहीं।

📜 ११५. बहुधातुक सुत्त

इस दुनिया को ख़तरा मूर्ख से है, ज्ञानी से नहीं—और विवेकशील ज्ञानी वही है जो धातुओं, आयामों, प्रतित्य-समुत्पाद और संभव–असंभव में कुशल हो।

📜 ११६. इसिगिलि सुत्त

ऋषियों को निगलने वाले “इसिगिलि” पर्वत पर निवास करते हुए, भगवान भिक्षुओं को पाँच सौ प्रत्येक-बुद्धों की नाम-कीर्ति बताते हैं।

📜 ११७. महाचत्तारीसक सुत्त

इस सूत्र में भगवान आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों की “लौकिक” और “आर्य” परिभाषाएँ देते हैं और उनके आपसी संबंध को स्पष्ट करते हैं।

📜 ११८. आनापानस्सति सुत्त

इस सूत्र में भगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।

📜 ११९. कायगतासति सुत्त

भगवान कायागत-स्मृति को अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली ढंग से, अनेक सटीक उपमाओं के सहारे प्रस्तुत करते हैं।

📜 १२०. सङ्खारुपपत्ति सुत्त

भगवान यहाँ भिक्षुओं को पुनर्जन्म चुनने की आजादी देते प्रतीत होते हैं—‘जिसे जहाँ जाना हो, यह उसका रास्ता है! जाओ!’

📜 १२१. चूळसुञ्ञत सुत्त

भगवान यहाँ आयुष्मान आनन्द को शून्यता की सुखद ध्यान-अवस्था में प्रवेश करने का एक अत्यंत सरल मार्ग बताते हैं।

📜 १२२. महासुञ्ञत सुत्त 📜 १२३. अच्छरियब्भुत सुत्त 📜 १२४. बाकुल सुत्त 📜 १२५. दन्तभूमि सुत्त 📜 १२६. भूमिज सुत्त 📜 १२७. अनुरुद्ध सुत्त 📜 १२८. उपक्किलेस सुत्त 📜 १२९. बालपण्डित सुत्त 📜 १३०. देवदूत सुत्त 📜 १३१. भद्देकरत्त सुत्त 📜 १३२. आनन्दभद्देकरत्त सुत्त 📜 १३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त 📜 १३४. लोमसकङ्गियभद्देकरत्त सुत्त 📜 १३५. चूळकम्मविभङ्ग सुत्त 📜 १३६. महाकम्मविभङ्ग सुत्त 📜 १३७. सळायतनविभङ्ग सुत्त 📜 १३८. उद्देसविभङ्ग सुत्त 📜 १३९. अरणविभङ्ग सुत्त 📜 १४०. धातुविभङ्ग सुत्त 📜 १४१. सच्चविभङ्ग सुत्त 📜 १४२. दक्खिणाविभङ्ग सुत्त 📜 १४३. अनाथपिण्डिकोवाद सुत्त 📜 १४४. छन्नोवाद सुत्त 📜 १४५. पुण्णोवाद सुत्त 📜 १४६. नन्दकोवाद सुत्त 📜 १४७. चूळराहुलोवाद सुत्त 📜 १४८. छछक्क सुत्त 📜 १४९. महासळायतनिक सुत्त 📜 १५०. नगरविन्देय्य सुत्त 📜 १५१. पिण्डपातपारिसुद्धि सुत्त 📜 १५२. इन्द्रियभावना सुत्त